विष्णु-पुराण के अनुसार-सागर के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो विशाल भू-खण्ड अवस्थित है, वही भारत है। यदि हम विगत शदियों या दशकों में झाँके तो लगेगा कि यही बृहद भारत है। प्रश्न यह भी उद्धृत किया जाता है कि इस भू-खण्ड का नामकरण कैसे हुआ?
कहा जाता है कि सतयुग में महाराजा दुष्यन्त और उनकी प्रेयसी बाद में जो महारानी बनी, शकुन्तला से एक महा प्रतापी परम साहसी वीर पुत्र हुआ जिसका नाम भरत था, जो अपने अतितेज और बाहुबल से महान साम्राज्य स्थापित किया और इन्हीं के नाम पर इस विशाल भू-भाग का नाम भारत-राष्ट्र पड़ा।
भारतीय दर्शन की यह अभिव्यक्ति है कि जिस भूमि में हम जन्म लेते हैं, उसे यहाँ के निवासी 'भू-माता' की संज्ञा से विभूषित किये हैं। यदि हम रामायण के लघु प्राता विभीषण श्रीराम के निकट आते हैं और कहते हैं कि हे प्रभु राम ! मैं आप को लंका समर्पित करता हूँ एवं आप यहाँ के राजा बने, साथ ही कहा कि श्री लक्ष्मण की भी यही राय है। इस पर श्रीराम लक्ष्मण से सस्नेह मनोभाव व्यक्त करते हैं कि-
"अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।"
(अर्थात भले ही लंका सोने की है किन्तु यह मुझको नहीं मनभाती। कारण-जन्म भूमि माता है जो स्वर्ग से भी बढ़कर पूजनीय है।)
अतः प्रस्तुत पुस्तक का नामकरण करते समय यह तथ्य ध्यातव्य रहा है कि आदिकाल से भारत-भूमि की महत्ता, इतिहास एवं वर्तमान की परिस्थितियों पर जो स्व-विचार मानस-पटल पर उभरे उन पर काव्य सृजित कर उकेरने का कार्य किया गया है, जो आगे भी जारी रहेगा।
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