लेखक परिचय
पांडेय जी ने नागरी लिपि को हिंदी की आत्मा माना। उन्होंने कहा, 'विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। उनके अनुसार, नागरी लिपि वैज्ञानिक, सरल और प्राचीन है, जो हिंदी को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। उन्होंने हिंदी-उर्दू विवाद में नागरी लिपि को उर्दू की फारसी-अरबी लिपि से अधिक उपयुक्त बताया। उनके तर्क थे कि नागरी लिपि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी है और यह हिंदी के ध्वनियों को सटीक रूप से व्यक्त करने में सक्षम है। पांडेय जी ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा हिंदी के दमन की आलोचना की। उन्होंने लिखा, 'मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।' उनके अनुसार, ब्रिटिश शासकों ने अंग्रेजी को प्रशासनिक भाषा बनाकर हिंदी को हाशिए पर धकेल दिया। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद हिंदी को प्रशासनिक और शैक्षिक कार्यों में पुनर्स्थापित करने की मांग की, ताकि यह जनता की भाषा के रूप में अपनी जगह बना सके। उस समय हिंदी और उर्दू के बीच का विवाद केवल भाषा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान का भी था। पांडेय जी ने अपने लेखों जैसे उर्दू का रहस्य, उर्दू की जुबान और उर्दू की हकीकत क्या है में तर्कसंगत ढंग से उर्दू के दावों का खंडन किया। उनका कहना था कि उर्दू, जो फारसी और अरबी शब्दों से प्रभावित है, भारत की मूल सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। इसके विपरीत, हिंदी संस्कृत और प्राकृत से विकसित हुई है और भारत की मिट्टी से जुड़ी है। उन्होंने 'हिंदुस्तानी' के नाम पर हिंदी-उर्दू के मिश्रित रूप को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयासों का विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि यह हिंदी की शुद्धता और सांस्कृतिक महत्व को कमजोर करेगा।
डॉ. अलका यादव चिताः श्री नरेंद्र कुमार गौपाल माता: श्रीमती अविका गोपाल पतिः श्री पद पाएव जाब: 19 जनवरी 1975 शिक्षाः भी. एसभी., श्री.एड., एम. ए. (हिंदी साहित्य), पी-एच.डी. संपादित पुस्तकें।।. साहित्य संस्कृति एवं भाषा को विविध आयाम, 2. यदुवंशी संस्कृत, 3.21ची सरी में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता, 4. छत्तीसगड़ी का लगूदित साहित्य, 5. लोकोक्तियों का लोक 6. नदी संवाद 7. छत्तीसगढ़ के दशहरा (छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग से पुस्तक प्रकाशित) सह संपादक: 1. प्रथामी साहित्य भाषा और समाज, 2. नेपाल भारत के साहित्य एवं संस्कृति का अंतर्संबंध शोध पत्र प्रकाशन : राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में 50 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित है। कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, कार्यशाला, सम्मेलन में रुचि: धार्मिक स्थल पर्यटन, लोक संस्कृति, साहित्य लेखन, जनजाति समुदाय साहित्य एवं संस्कृति पर शोध करना। सम्मानः - अवगत अवार्ड-2021 (अक्षर बार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका, उज्जैन, मध्य प्रदेश) राष्ट्रीय साहित्य श्री सम्मान-2021 (हिंदू वेलफेयर फाउंडेशन शिक्षा प्रकोष्ठ) साहित्य शिरोमणि सम्मान-2022 (द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, कुंभलगढ़) भारत रान अटल सम्मान-2022 (अटल जयंती सम्मान समारोह, बिलासपुर) - समाजसेवी रत्न सम्मान - 2022 (गोरख शक्ति धाम सेवा फाउंडेशन) - छत्तीसगढ़ नारी भूषण सम्मान-2022 - हिंदी रत्न विशिष्ट सम्मान-2022 (विश्व हिंदी रचनाकार मंच) के अंतरराष्ट्रीय हिंदी गौरव सम्मान-2022 (लघु कथा समाज काठमांडू, शोध संस्थान, नेपाल) - चाणक्य सम्मान - 2023 (शिमला शोध संस्थान) - कल्पना चावला मेमोरियल अवार्ड 2023 (अंतरराष्ट्रीय महिला मंच) गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर सम्मान-2023 (ऋषि वैदिक साहित्य पुस्तकालय ब्रज लोकतंत्र ट्रस्ट) - महादेवी वर्मा सम्मान-2023 (विश्व रचनाकार हिंदी) - प्रेमचंद सम्मान - 2023 (महानदी की धारा पब्लिकेशन (धमतरी) - सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान-2024 (काशी विश्वविद्यालय) - हिंदी साहित्य श्री सम्मान-2024 (काशी विश्वविद्यालय) - सर्जना साहित्य सम्मान-2024 (कांकेर, छत्तीसगढ़) - कलमकार साहित्य समता सम्मान-2024 (छत्तीसगढ़ कलमकार मंच, मस्तूरी, बिलासपुर, छ.ग.) - उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान - 2024 (त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमान्डौ, नेपाल) पर्यावरण और जल संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान हेतु सम्मानित 2024 (जीवनधारा गामि गंगे संस्था) संपर्क: डॉ. अलका यतींद्र यादव, राजेंद्र नगर, यादव गली, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
भूमिका
भारतवर्ष अनेक भाषाओं का विशाल देश है भारत की प्रत्येक भाषा का अपना स्वतंत्र और प्रखर विशिष्टय है जो अपने प्रदेश के व्यक्तित्व से मुद्रांकित है इन सभी भाषाओं में अपनी-अपनी विशेषता और महत्व है जिस प्रकार अनेक धर्म विचारधाराओं और जीवन प्रणालियों के रहते हुए भी भारतीय संस्कृति की एकता संदिग्ध है इसी कारण से अनेक भाषा और अभिव्यंजना पद्धतियों के रहते हुए भी भारतीय भाषा का मूलभूत एकता का अनुसंधान भी सहज सम्भव है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 नप 2020 शिक्षा के क्षेत्र में एक व्यापक सुधार का प्रयास है जिसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी लचीला और रोजगार उन्मुख बनाना है इस नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू भाषा नीति है जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और बहु भाषा बाद को सशक्त बनाने का प्रयास करती है नई शिक्षा नीति के तहत प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई को प्रोत्साहित किया गया है। भाषा नीति का उद्देश्य ने केवल शिक्षा के माध्यम को सरल बनाना है बल्कि भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को भी सुनिश्चित करना है। यह नीति भारतीय भाषाओं के साहित्य कला और संस्कृति को प्रोत्साहन देती है, हालांकि इस नीति पर कुछ आलोचना भी हुई है, कुछ लोग इसे व्यवहारिकता के बजाय आदर्शवादी मानते है क्योंकि कई विद्यालयों मे शिक्षकों की कमी और भाषाओं के संशाधन उपलब्ध नहीं है। भाषा अंतर संसार से उपजी अनमोल संपदा है, जिसके बिना समूचा देश समाज गंगा है हमारे भाव और विचारों की सुनवाई का भाषा ही होती है। किसी भी देश की पहचान उनकी भाषा से होती है। एमर्शन के शब्दों में 'भाषा एक नगर है इसके निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति एक पत्थर लाया है। किताब के शोध आलेख मे संस्कृत भाषा के वर्तमान पर भी प्रकाश डाला गया है इस आधुनिक युग में संस्कृत को विश्व की वैज्ञानिक भाषा में से एक माना जा रहा है इसकी लिपि अर्थात देवनागरी भी कंप्यूटर के विभिन्न कार्यक्रमों में आसानी से उपलब्ध है। विभिन्न प्रांतों से आए शोध आलेखों में वहां की मातृभाषा वह बोली को समाहित किया गया है छत्तीसगढ़ी बोली, कन्नड़ भाषा, मलयालम भाषा, श्रीलंका से सुगंधी ने भाषा के प्रकार पर विशेष ध्यान देने का कार्य किया है। वर्तमान समय में भाषा के साथ-साथ बोली का भी महत्व बढ़ता जा रहा है। यह पुस्तक भाषा और बोली के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध होगी भाषा विज्ञान के शोध छात्रों के लिए उपयोगी ग्रंथ के रूप मे कारगर है। पुस्तक में संबंधित आलेख लेखकों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूं।
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