भूमिका
भूमिका विभिन्न परम्परा और प्रगति एक दूसरे पर आश्रित हैं। परम्परा का मूल्यांकन व निर्वहन किए बिना प्रगति सम्भव नहीं है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के विभिन्न कालों-आन्दोलनों में परम्परा और प्रगति के इसी अन्योन्याश्रय सम्बन्ध को विभिन्न आलोचकों और साहित्येतिहासकारों की दृष्टि से समझने समझाने का प्रयास इस संगोष्ठी का ध्येय है जिसके निमित्त यह पुस्तक अपने स्वरूप में आयी। निसंदेह साहित्य के इतिहासकार का दायित्व परम्परा और प्रगति के आपसी सम्बन्ध की पहचान करना है। साहित्य का इतिहास किसी एक परम्परा की निरन्तरता का इतिहास नहीं होता। परम्परा के विकास में बराबर निरन्तरता ही नहीं होती, कई बार अन्तराल की स्थितियाँ भी आती हैं और परम्पराओं की विकास की प्रक्रिया में सामंजस्य के अतिरिक्त अन्तर्विरोध भी होते हैं। साहित्य के इतिहास में परम्पराओं के विकास पर विचार करते समय निरन्तरता और अन्तराल तथा सामंजस्य और संघर्ष के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध की पहचान आवश्यक है। परम्परा की सार्थकता वर्तमान रचनाशीलता को गति देने में होती है। परम्परा का मूल्यांकन वर्तमान रचनाशीलता के सन्दर्भ में होना चाहिए, समकालीन रचनाशीलता के ऊपर परम्परा को प्रतिष्ठित करने के लिए नहीं। किसी भी समाज का साहित्य वहाँ के जन साधारण की चित्तवृत्ति का सार्थक प्रतिबिम्ब होता है, और यह भी उल्लेखनीय है कि जनमानस की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य सृजन में परम्परा और आधुनिकता के साथ इस सृजन का सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। यहां एक तथ्य उभरता है कि 'जनता की चित्तवृत्ति' साहित्य में परिवर्तन के लिए आवश्यक है और यहाँ 'परिवर्तन' प्रगति का सूचक है और प्रगति 'जनता की चित्तवृत्तियों' की परम्परा के साथ-साथ साहित्य की अपनी परम्पराओं के सामंजस्य का परिणाम। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी सही अर्थों में हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार थे जिन्होंने 'परम्परा' और 'प्रगति' के आपसी सम्बन्ध से साहित्य के साथ-साथ समाज के परिवर्तन की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसी प्रक्रिया में उन्होंने न सिर्फ साहित्य और समाज के आपसी सम्बन्धों की पड़ताल की बल्कि साहित्यिक परम्पराओं के उद्भव, विकास, पतन, उनके आपसी संघर्ष और इन सबके बावजूद परम्पराओं की निरन्तरता का भी लेखा जोखा प्रस्तुत किया। परम्पराओं की बहुवचनात्मकता की खोज और उनके आपसी सामंजस्य से विकसित साहित्यिक निरन्तरताओं की भी पड़ताल की। आज शिक्षण, विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, कहने का तात्पर्य है कि किसी भी राष्ट्र की सांगोपांग प्रगति के लिए अनिवार्य प्रत्येक ज्ञानानुशासन भारतीय ज्ञान परम्परा का ही एक विकसित होता हुआ प्रारूप है जो राष्ट्र के भविष्य की रचनात्मकता को आधार प्रदान करता है। यह आधारभूत रूप से किसी समय और समाज में मौजूद जीवन्त रहीं आस्था, संस्कृति, चिंतन और परम्परा को क्षरणशील होने नहीं देता । ऐसी परम्पराएँ ऐतिहासिक विकास में, एक युग से दूसरे में संक्रमण के समय मौजूद जरूर रहती है, पर उनका नष्ट होना अवश्यम्भावी है किन्तु समाज के बुध्दिजीवी वर्ग द्वारा अपने सूजन के माध्यम से इसे संरक्षण दिया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक इसी भाव के अंतर्गत संपादित है। पूरे भारत में से अलग अलग प्रांतों के लेखकों ने आपने शोध आलेखों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्परा और चिंतन के प्रभाव का समाजशास्त्रीय विवेचन किया है। वेदांत, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा जैसे पारम्परिक दार्शनिक विमर्श के साथ भारतीय ज्ञान परम्परा के स्रोत, पंजाब के हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य, संवाद, प्रासंगिकता भारतीय ज्ञान परम्परा के सन्दर्भ में, शोध तंत्र/ युक्ति तंत्र और भारतीय चिंतन, भारतीय चिंतन प्रणाली की अनवरत यात्रा, वृद्ध विमर्श प्राचीन बनाम वर्तमान, भारतीय महाकाव्यात्मक परम्परा काभारतीयचिंतन पर प्रभाव, वृत्त विद्या, बाल विमर्श, किन्नर विमर्श कहने का भाव कि धार्मिक, आध्यात्मिक, वाणिज्यिक, दार्शनिक, शैक्षणिक, साँस्कृतिक, नैतिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सभी विषयों पर विमर्श प्रस्तुत शोध आलेखों में प्राप्त होता है। मैं डी.ए.वी. कॉलेज अमृतसर के प्राचार्य, प्रबंधन और स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग को इस पुस्तक के प्रकाशन पर हार्दिक शुभकामनाएं और साधुवाद देता हूं। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा के अनुदानित सौजन्य से सार्थक और सटीक विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजन के लिए भी समस्त आयोजन समिति को बधाई|
पुस्तक परिचय
डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर, उत्तर भारत के एक प्रमुख सहशिक्षण संस्थान के रूप में उच्च शैक्षिणक स्तर व उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध संस्थान है। डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर की स्थापना। जून 1955 को महर्षि दयानंद जी की पावन स्मृति में डी.ए, वी. कालेज प्रबंधक समिति, नई दिल्ली DAV College Managing Committee, New Delhi द्वारा की गई। यह आज भारत में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है। डॉ.ए.वी. कालेज अमृतसर गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से संबद्ध है और इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) द्वारा धारा 2 (एफ) और 12 (बी) के तहत । जनवरी 1958 को अधिनियम 195 के तहत मान्यता प्राप्त है। स्नात्तक और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के लिए यह एक ख्याति प्राप्त उत्कृष्ट शैक्षिणक संस्थान है जो अपने विविध प्रशिक्षित संकार्यों के माध्यम से अकादमिक और उच्च शिक्षा के लिए अध्ययनरत विद्यार्थियों को नित्य नई से नई तकनीक और प्रणाली से शिक्षित करता है। डी.ए.वी. कॉलेज अमृतसर में बैचलर ऑफ आर्ट्स, साइंस, तकनीक, कामर्स एंड मैनेजमेंट स्ट्रॉम में स्नातक (तीन वर्षीय) और ऑनर्स (चार वर्षीय] पाठ्यक्रम उपलब्ध है। इसके साथ ही चार वर्षीय बैचलर ऑफ डिजाइन मल्टीमीडिया (गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर के अंतर्गत] पाठ्यक्रम भी उपलब्ध है। कॉलेज में 11 स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम साइंस, तकनीक, कामर्स और आर्ट्स में उपलब्ध हैं। डी.ए.वी. कॉलेज अमृतसर का मुख्य उद्देश्य सदैव उच्च शिक्षा और अनुसंधान को क्षेत्र में नवाचार और उच्च गुणवत्ता युक्त ज्ञान प्रदान करना रहा है। कॉलेज भारतीय जान परम्परा INDIAN KNOWLEDGE SYSTEM] के नवीनतम प्रतिमानों तथा INSTITUTION INNOVATION COUNCIL [IC 3-5 STARS GRADED] के नवाचारी विचार युक्त, MOU [MEMORANDUM OF UNDERSTANDING] संपोषित नवीनतम पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को उपलब्ध करवाता है जिस से विद्यार्थियों का उज्जवल भविष्य सुनिश्चित हो। कॉलेज का Placements Cell हर साल प्रतिष्ठित Multinational companies को कॉलेज कैम्पस में आमंत्रित कर अपने छात्रों को Intermabips और रोजगार उपलब्ध करवाता है। डी.ए.वी. कॉलिज अमृतसर लगभग सात दशकों से वैश्विक स्तर पर अपनी उत्कृष्ट उपलब्धियों के बल पर श्रेष्ठ गुणवत्ता प्राप्त उच्य शिक्षण संस्थान के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की है।
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