वाक्यपदीय के इस खण्ड में तृतीय काण्ड के क्रियासमुद्देश से लिङ्गसमुद्देश तक कारिका और उस पर हेलाराजकृत प्रकीर्णप्रकाश का हिन्दी अनुवाद पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। प्रस्तुत अंश पर टीका में हेलाराज ने अपने अन्य ग्रन्थों क्रियाविवेक एवं वार्तिकोन्मेष का भी सन्दर्भ दिया है और वाक्यपदीय के अन्य काण्डों पर अपनी टीका का भी। इस टीका के अवलोकन से स्पष्ट है कि भर्तृहरि के ग्रन्थ को समझने के लिए यह टीका कितनी अपरिहार्य है। भर्तृहरि के आशय को स्पष्ट करने के साथ-साथ हेलाराज महाभाष्य के उन अंशों को भी उद्धृत करते चलते हैं जिन पर भर्तृहरि का ग्रन्थ आधारित है।
यहाँ अनूदित समुद्देशों में से कालसमुद्देश और उस पर हेलाराज की टीका का अंग्रेज़ी अनुवाद इससे पूर्व प्रकाशित हो चुका है। पेरी सर्वेश्वर शर्मा का यह अनुवाद मेरे लिए उपयोगी रहा है। हिन्दी में मेरी जानकारी के अनुसार यह प्रथम अनुवाद ही है। साथ ही मैंने यथावसर कारिका और टीका पर विस्तृत टिप्पणियाँ भी दी हैं। जातिसमुद्देश और द्रव्यसमुद्देश पर मेरे पूर्वप्रकाशित अनुवाद की भाँति ही यहाँ भी मैंने के०ए० सुब्रह्मण्य अय्यर के संस्करण को आधार बनाया है किन्तु अर्थसंगति की दृष्टि से कुछ परिवर्तन भी किये हैं और यत्र-तत्र इसके लिए अन्य संस्करणों से भी सहायता ली है जिनका उल्लेख यथास्थान कर दिया गया है।
पूर्वप्रकाशित खण्ड की ही शैली का अनुसरण प्रस्तुत खण्ड में भी किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए उसे दुहराना आवश्यक है। अनुवाद को यथासम्भव मूलानुसारी रखने के लिए जहाँ-जहाँ उसे बोधगम्य बनाने की दृष्टि से अपनी ओर से कुछ शब्द जोड़े गए हैं वहाँ उन्हें वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में रखा गया है। जहाँ शब्दों को अन्य शब्दों के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास हुआ है वहाँ उनके लिए लघु कोष्ठकों का प्रयोग किया है। किन्तु अनुवाद को सर्वथा शाब्दिक होने से बचाने के लिए कहीं कहीं-वाक्य-विन्यास में अनुवाद की भाषा की प्रकृति के अनुरूप परिवर्तन किया है। कतिपय स्थलों पर लम्बे वाक्यों को छोटे वाक्यों में बाँटकर अनुवाद किया गया है। जहाँ व्याख्या की आवश्यकता अनुभव हुई वहाँ मैंने टिप्पणियाँ पृथक् से दी हैं। हेलाराज की टीका में मूल कारिका के जिन अंशों को दुहराया गया है वे अय्यर के संस्करण में मोटे अक्षरों में दिये गए हैं। मैंने भी इसी पद्धति का अनुसरण किया है। किन्तु हिन्दी अनुवाद में ऐसे अंशों को मैंने इटैलिक्स में रखा है।
अनुवाद में मुझे अपने मित्रों से सहायता और बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हुए हैं। इनमें मेरे युवा सहयोगी प्रो० सत्यमूर्ति इस खण्ड को पूर्ण देखने से पहले ही महामारी के कारण स्मृतिशेष हो गए। विभिन्न दर्शनों पर उनका अद्भुत अधिकार था। इस खण्ड में अनेक स्थलों को समझने में उनसे मिली सहायता को मैं कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता हूँ।
मेरे मित्रों डॉ० कांशीराम और प्रो० ओमनाथ बिमली के सुझावों ने इस अनुवाद को समृद्धि प्रदान की है। प्रो० रामसलाही द्विवेदी, प्रो० मीरा द्विवेदी, प्रो० भारतेन्दु पाण्डेय, डॉ. बलराम शुक्ल और डॉ. जगमोहन ने भी अनेक प्रश्नों पर अपने मन्तव्य देकर मेरी सहायता की है। श्री तरुणचन्द्र चतुर्वेदी और श्रीमती रीना चतुर्वेदी ने प्रेस कापी तैयार करने में महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया है। मैं इन सभी के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।
इस खण्ड के प्रकाशन में सक्रिय रुचि लेने के लिए मैं डी०के० प्रिण्टवर्ल्ड के श्री सुशील मित्तल का आभारी हूँ।
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