सन् 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर में भिण्ड जिले का गौरवशाली इतिहास रहा है, इस समर में यहाँ के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। भिण्ड के कछवाहघार ने सन् 1857 से लगभग दस वर्ष पूर्व ही 'कछवाह स्वराज मंडल' बनाकर अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया था। ग्वालियर राज्य के अधीन भिण्ड का इतिहास, घारों का इतिहास रहा हैं यहाँ का संग्राम-कछवाहघार, भदावरघार, तंवरघार और चौहानघार आदि के शासकों द्वारा ही लड़ा गया।
भिण्ड के स्वतंत्रता संग्राम में भिण्ड क्षेत्र के किलों और गढ़ियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस क्षेत्र में तीन बड़े किले भिण्ड, गोहद और अटेर में थे तथा इंदुरखी, मछण्ड, बिलाव, बाराकलां, जैतपुरा, अमायन, बोहारा, पावई, सिकरौदा, गोरमी, मेहगांव आदि स्थानों सहित लगभग 350 स्थानों पर गढ़ियाँ स्थित थीं। इनमें युद्ध लड़े गये और स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा यहाँ अपनी सभाएँ करते थे तथा रणनीतियाँ बनाते थे। चिमनाजी के नेतत्व में गठित 'स्वराज मंडल' की सभाएँ भी होती थीं ऐसी ही एक सभा अमायन की गढ़ी में हुई थी, जिसमें चौहानधार के शासक निरंजन सिंह जूदेव, गोपालपुरा के शासक रामचन्द्र जूदेव, चिमनाजी बोहारा, अमायन के भगत सिंह और बावनी के शासकों ने भाग लिया था और उस सभा में उरई की रेजीमेंट पर हमला करने की योजना बनाई गई थी।
चिमनाजी और दौलत सिंह की तरह चकरनगर के राजा खुशाल सिंह तथा उनके पुत्र युवराज निरंजन सिंह ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। दौलत सिंह ने दबोह में बिलाया के बरजोर सिंह पवार के साथ मिलकर भिण्ड जिले के पूर्वी हिस्से पर क्रांति की ज्वाला जलाने का प्रयास किया था। इसी प्रकार सुढ़ार गढ़ी के मंगद राव अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे।
क्रांति के पश्चात, वर्षों बाद स्वाधीनता आंदोलन का दौर जब शुरू हुआ तो भिण्ड में भी आंदोलन की गतिविधियाँ प्रारंभ हुई। और यहाँ के स्वाधीनता सेनानियों ने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले विभिन्न अधिवेशनों में भाग लेना प्रारंभ किया। इस कार्य में बटेश्वरी दयाल शर्मा, श्रीनाथ शर्मा, हरिकिशन दास भूता, झम्मनलाल शर्मा, फूलचन्द्र लोहिया, बेनीशंकर दीक्षित, सूर्यनारायण सेठ आदि अग्रणी रहे। सन 1931 से 1935 तक भिण्ड जिले में कोई राजनैतिक संगठन न होने से यहाँ के कार्यकर्ता अपने पड़ोसी जिले इटावा के क्रांतिकारियों से संपर्क रखते थे और इटावा के राजनैतिक कार्यकर्ताओं से मिलकर उनके सहयोग से कार्य करते थे। सन 1935 में यशवंत सिंह कुशवाह ने झम्मनलाल शर्मा के सहयोग से 'इच्छुक मंडल' नामक संस्था की स्थापना की तथा नगर में श्रीनाथ शर्मा, बटेश्वरी दयाल शर्मा, श्री फूलचंद लोहिया के सहयोग से राजनैतिक व सामाजिक कार्य प्रारंभ किया।
नमक सत्याग्रह और सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का भी भिण्ड जिले पर बहुत असर पड़ा। सन 1942 तक भिण्ड में राष्ट्रीय भावना अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। भिण्ड की राजनैतिक चेतना का दमन करने के लिये सरकार ने भिण्ड के कार्यकर्ताओं हरिकिशन दास भूता, यशवंत सिंह कुशवाह तथा हरिसेवक मिश्रा सहित अनेक लोगों को गिरफ्तार करा लिया था। किन्तु स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियाँ लगातार संचालित होती रहीं।
यह पुस्तक 'मध्यप्रदेश में स्वाधीनता संग्राम भिण्ड' जिले के लगभग सभी ज्ञात एवं अज्ञात अमर बलिदानियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। मैं स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश का आभारी हूँ तथा इस पुस्तक में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग के लिए सभी का धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
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