ब्राह्मण-ग्रन्थ वैदिक वाङ्मय के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाग हैं। आपस्तम्ब परिभाषा (31)- "मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्" तो इसे मन्त्र की ही भाँति वेद की संज्ञा प्रदान करती है। स्पष्ट यह है कि ब्राह्मण-ग्रन्थ भी अन्यून महिमा के संवाहक हैं। अस्तु, ब्राह्मण ग्रन्थों का उल्लेख होते ही यज्ञीय कर्म-काण्ड का स्मरण हो जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि 'ब्राह्मण' शब्द के अवयवभूत 'ब्रह्म' शब्द का व्यपदेश्य यज्ञ इन ग्रन्थों का मुख्य प्रतिपाद्य है। परन्तु, इसका यह अभिप्राय कथमपि नहीं है कि इसमें अन्य विषय प्राप्त नहीं होते हैं।
सत्य तो यह है कि ब्राह्मण-साहित्य में आध्यात्मिक, दार्शनिक आदि विषयों के साथ-साथ अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, भौतिकशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, गणितशास्त्र, रसायन-शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र आदि अनेकानेक ऐहिक एवं आमुष्मिक विषयों से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है। यह बात और है कि इस साहित्य पर यज्ञ की दृष्टि से ही अधिक विचार-विमर्श किया गया है।
वस्तुतः यह स्वीकार करना ही होगा कि 'ब्राह्मण' सर्वसुलभ साहित्य नहीं है। इनकी भाषा एवं प्रतिपादन-शैली की दुरुहता के कारण भी जिज्ञासुजन इनके यज्ञ रूप प्रसिद्ध विषय से इतर विषयों का उस प्रकार से अवगाहन नहीं कर पाते।
पिछले दशकों में अनेक अध्येताओं ने ब्राह्मण ग्रन्थों के अप्रथित विषयों पर अपनी गवेषणामयी दृष्टि डाली है। उनकी मनीषा के प्रकाश में ही ब्राह्मण-ग्रन्थों के अनेक गूढ़-स्थल भी अब सम्मुख आना प्रारम्भ हो गये हैं। उनकी सारस्वत साधनाओं ने ही मुझ जैसे अकिञ्चन को भी उस दिशा में यत्-किञ्चित् यत्न करने को प्रेरित किया है। उस प्रेरणा का ही एक परिणाम यह पुस्तक है।
मुझे बाल्यकाल से ही वनस्पतियों में अत्यधिक रुचि रही है। अतः मैंने ब्राह्मण-ग्रन्थों में वनस्पतियों का अनुसंधान प्रारम्भ किया। श्री विश्वनाथ जी की कृपा से यज्ञों के अनुषङ्ग रूप में ही मुझे शताधिक वनस्पतियाँ और उनके याज्ञिक उपयोग ब्राह्मण-ग्रन्थों में उपलब्ध हुए। तदनन्तर मैंने अन्य शास्त्रों से तत-तद् वनस्पतियों की उत्पत्ति और उनके आयुर्वेदिक महत्त्व पर भी विचार किया। इस सबका ही समन्वित रूप इस पुस्तक के रूप में आकार ले रहा है।
यह ग्रन्थ वास्तव में और कुछ न छन होकर मेरे लिए शिव-प्रसाद-स्वरूप ही है। इस पुस्तक का प्रकाशन एक प्रकार से उस प्रसाद के वितरण का ही विनम्र प्रयास है। मैं अत्यन्त विनम्रता से यह कहना चाहता हूँ कि इसमें विद्वान् पाठकों को जो कुछ भी उचित लगे, वह सब माहेश्वर महिमा ही है तथा जो अनुचित प्रतीत हो, वह श्री गौरीशंकर के श्री चरणों में मेरा कोई प्रमाद ही है।
इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम प्रभु के श्री पाद-पद्मों में स्वयम् को सर्वात्मना समर्पित करता हूँ और उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे अपने 'शंकर' इस नाम के अनुरूप प्रस्तुत पुस्तक के द्वारा भी सर्वजन का 'शं' (अर्थात् मंगल) करें।
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