यह ग्रन्थ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का अनूठा, प्रेरणाप्रद, रोमांचक और यथार्थ की भूमि पर लिखा गया स्वर्णिम अध्याय है।
पचपन अध्यायों में विभक्त इस ग्रन्थ की समूची गाथा नई पीढ़ी में वस्तुस्थिति का परिज्ञान कराने वाला इतिहासबोध जाग्रत करेगी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनेक ऐसे अनछुए, अनकहे प्रसंग हैं, जिनको बड़े बेबाक ढंग से पहली बार इस ग्रन्थ में कहा गया है। अनेक भ्रमों से पर्दा हटाया गया है और अनगिन सचाइयों को बड़े यथार्थवादी और सत्यकथन द्वारा प्रकाशित किया गया है।
भाई परमानंद और उनका युग भाई जी का जीवन-चरित्र माल नहीं है, बलिदानी वीरों की शौर्य गाथा है। हिन्दू दृष्टि का यह एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है, तथ्यमूलक जीवंत इतिहास है। 'भारतीय स्वतंत्रता की कहानी इस ग्रन्थ के बिना अधूरी है।
प्रो. धर्मवीर सुप्रसिद्ध आर्य विद्वान और अजमेर स्थित स्वामी दयानंद द्वारा बनाई गई अपनी उत्तराधिकारिणी परोपकारी सभा के सफल प्रधान रहे। ज्योत्सना आर्य उनकी धर्मपत्नी हैं, जो उनके लेखन कार्य में हमेशा उनका साथ देती रहीं। प्रो. धर्मवीर ने दर्जनों ग्रंथों की रचना की और स्वामी दयानंद सरस्वती के मूल ग्रंथों का पुनः प्रकाशन कराया। उन्होंने जीवन का अधिकांश समय अध्यापन, समाजसेवा और लेखन में व्यतीत किया।
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