पुस्तक परिचय
यों तो अरुण कमल ने लिखना सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से ही शुरू कर दिया था किन्तु उनकी पहचान मुकम्मल रूप से आठवें दशक के कवि के रूप में बनी, बल्कि यह भी कि समकालीन कविता को दूर तक प्रभावित करने वाले कवियों में उन्हें शुमार किया जाता है। किसी कवि को उसकी कुछ चुनिंदा उद्धरणीय उक्तियों के माध्यम से समझे जाने की जो परिपाटी प्रचलित है, उसका शिकार हमारे समय के बहुतेरे कवि हुए हैं। यह अवश्य है कि ऐसी पंक्तियाँ, सूक्तियाँ आगे चलकर उस कवि की एक सिग्नेचर ट्यून जैसी बन जाती हैं। अरुण कमल के पहले कविता संग्रह 'अपनी केवल धार' की आखिरी कविता के रूप में धार उस प्रगीतात्मक संरचना का ठोस उदाहरण है जिसमें अपार उद्धरणीयता ही नहीं, हमारे समय की अटूट सचाई भी दर्ज है। हो न हो कवि ने अपने सरोकारों को जिन चंद पंक्तियों में रखना चाहा है, वे यही हैं। किन्तु इसके पीछे जो ताकत रची-बसी है वह है इसकी उद्धरणीयता। वे सूक्ष्म चिंतन और उद्धरणीयता दोनों के संजीदा कवि हैं। जिस अभावग्रस्त क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अरुण कमल करते हैं, पिछले दो दशकों से वह राजनीतिक जटिलताओं और दैवीय आपदाओं, बाढ़, सूखा और दैन्य का मारा है। विचारधारा किसी कवि में किस तरह कूट-कूट कर भरी होती है, यह अरुण कमल की कविताएँ बताती हैं। वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक हैं तो गांधी और लोहिया ने भी उन्हें आकर्षित किया। यही कारण है कि सोवियत विघटन के बाद भी उन्हें यही लगता रहा, विषमता और अन्याय को समाप्त करने की कुंजी अभी भी मार्क्सवाद में है। उनका कहना है, जब देश में पूँजी का कोई वास्तविक विपक्ष नहीं बचे, कविता जीवन का अंतिम मोर्चा, अंतिम चौकी है। वे धन की तरफ ले जाने वाली सफलता के हामी नहीं, चेतना के स्तर पर उत्कर्ष और उदात्तता के हिमायती रहे हैं।
कविता का अरुण कमल आठवें दशक के आरंभ में कविता के क्षितिज पर अरुण कमल का आगमन कई दृष्ठियों से कविता के लिए मंगल सूचक रहा है। राजनीतिक प्रभावों और आंदोलनों के बीच गुजरते समय के संकट को पहचान लेने और उसे कविता में पिरोने का जो सलीका उनके पास है वह अचूक और अनिंद्य है। वे अद्वितीयता के सर्जक होने के नाते अपने 'स्व-भाव', 'वाक्संधि' और 'वाक्मुद्राओं' के कबि तो हैं ही, पुरा और अधुनातन में रमते विचरते हुए वे पुनः पुनः 'स्व-भाव' में लौटते और अपनी कविता का छेद पुनराविष्कृत करते हैं। कविता का यह अरुण कमल हिंदी ही नहीं, अन्य भाषाओं में भी न मिलेगा। अपनी ध्वन्यात्मकता से मोहाविष्ट करने वाले, समय की देह के साथ पीड़ित अंतरात्मा के अतल में उतरने वाले अरुण कमल को पढ़ना, उन्हें समझना कविता की कोख से उपजे जीवन-सारांश को समझना है।
लेखक परिचय
हिंदी के सुधी कवि, समीक्षक, भाषाविद ओम निश्चल ने दशकों से कविता की काया और अंतःकरण में रमते हुए अरुण कमल के कवि वैशिष्ट्य का जैसा सुपाठ यहाँ किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। 'चर्चा की गोलमेज पर अरुण कमल' एक ऐसी कृति है जो एक साथ आलोचना और काव्यास्वाद दोनों रसों से परिपूर्ण है। जिस तरह कविता के नाप की भाषा अरुण कमल के पास है, वैसी ही सुपठनीय हलोरी-पछोरी हुई भाषा में ओम जी ने अरुण कमल की कविता के विवेचन को एक उदात्त भाष्य में बदल दिया है।
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