छत्तीसगढ़, कोसल, दक्षिण कोसल, महाकोसल, गोंडवाना, दंडकारण्य आदि विविध नामों से चर्चित प्रतिष्ठित रहा है। यापि इस क्षेत्र की सीमाएं घटती बक्ती रही है तथापि फलबुरिकाल से इसका नाम छत्तीसगढ़ चला आ रहा है। छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक काल से लेकर रामायण, महाभारत, युग के प्रमाण मिलते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि यहां का इतिहास समृध्य एवं संस्कृति अत्यंत प्राचीन है।
आर्य और अनार्य संस्कृतियों का समन्दय स्थल छत्तीसगढ़ अनेक प्रकार की कलाओं से सुसज्जित है। कबरा एवं सिंघनपुर के भित्ती वित्र अनार्य सभ्यता के घोतक है। सिपुर का हरिमंदिर भारतीय आर्थ वस्तुकला का एक अतुलनीय प्रतीक है। संगीत और नृत्य के संबंध में भी यह प्रवेश उतना ही धनी है जितना कि वास्तुकला के संबंध में रहा है। यहां के संगीत और नृत्य का उल्लेखनीय स्थान रहा है। यहां के मुख्य नृत्य डंडा नृत्य, चांवर नृत्य, रावत नाच महई, युवानृत्य, करमा नृत्य, पंथी नृत्य आदि प्रसिध्य है।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति एक और जहां भारतीय संस्कृति का अंग होने के कारण उसकी विशिष्टताओं को सहन ही अंगीकार करती है वहीं दुसरी और इसकी कुछ ऐसी आंचलिक विशिष्टता भी है, जो जीवन आदर्श और प्रेरणा का पुंज प्रमाणित होती है क्योंकि छत्तीसगढ़ की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है अतः इसके समृध्य लोकसाहित्य में उसका स्पंदन और आधुनिक लोक जीवन में उसकी छटा स्पष्ट परिलक्षित होती है।
छत्तीसगढ़ का लोकसाहित्य संपन्न है जिसमें प्राचीन से लेकर नवीन संस्कृति और सभ्यता के वर्शन होते है। इससे प्रभावित होकर छत्तीसगढ़ी शिष्ट साहित्य भी एक शताब्दि की यात्रा के इतिहास को प्रस्तुत करता है। छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य छत्तीसगढ़ी जन की भावनाओं और विचारों के स्त्रोत का वह आदिम स्वरूप है जो मनुज के मन व अंतर्मन के तरंग बनने से प्रारंभ होकर संस्कृति सदृश परिवर्धन परिमार्जन की प्रक्रिया में जीवन मुल्यों के प्रवाह को समाहत करता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य में लोक अनुभव का प्रारुप ही लोकद्वार प्रदत्त एक सूत्र है जो प्रगति तत्वों से मिलकर लोकगीत तथा कवि से जुड़कर बनती है। इसके बावजूद यह भावनाओं व विचारों के प्रवाह में एक दूसरी लोकविधाओं को स्पर्श करती है यही संपादन में वदरिया, विप्रलंब की स्थिति में युवा, युध्व के दृश्यों में पंडवानी आदि अन्याय गीतों व लोक छंदो का आगमन होता है । लोकसाहित्य का लोक अभिप्राय ही उसे शिष्ट साहित्य से पृथक करता है जो आंतरिक आत्मा है जिसका तुलनात्मक अध्ययन लोकसाहित्य के मूल स्वरुप को उद्घाटित करने के साथ उसके युगानुरुप परिवर्तन के इतिहास को प्रस्तुत करती है।
यादव नाति का उल्लेख वेदों में मिलने के कारण इसे वैदिक जाति भी कहा जा सकता है। पुराणों में इनका उल्लेख मिलता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अत्रि ऋषि के पुत्र चंद्रमा हुए। इनके नाम से इस वंश का नाम चंद्रवंश पड़ा। चंद्रवंशी राजाओं की वंश परंपरा में सातवें राजा यदु के नाम पर इस वंश का नाम यदुवंश प्रसिद्ध है। चंद्र के पश्चात चंद्र के पुत्र युद्ध, बुद्ध का पुत्र पुरूरवा और पुरूरवा के आठ पुत्र हुए। इनके नाम है-वायु, दृकायु, अश्वासु, नामालूम, घृतिमान, बसु, शुचिविद्य एवं शतायु। इनमें से ज्येष्ठ वायु के पुत्र नहुस हुए। नहुस के पुत्र रति, ययाति, संयाति, उद्भवाचि श्याति, मेघनाति। नहुस के पश्चात ययाति शक्तिशाली सम्राट बने। ययाति की दो रानियों में से एक असुर गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी थी। देवयानी के दो पुत्र यदु और तुर्वसु हुए। यदु के चार पुत्र हुए कोष्ठ, नील, अंतिम, लघु यदु की अड़तीसवीं पीढ़ी में सम्राट सायस्वत हुए। सारस्वत के दो पुत्र थे- अंधक और वृष्ठि । इन दोनों भाईयों के नाम से यह वंश दो धाराओं में विभक्त हुआ प्रथम, अंधक वंशी और द्वितीय वृष्ठि वंशीय। अंधक की दसवीं पीढ़ी में महाराज आवुक हुए। आदुक के दो पुत्र उग्रसेन तथा देयक हुए। उग्रसेन का पुत्र कंस हुआ। देवक की पुत्री देवकी थी। कंस और देवकी अंधक वंशीय यादव क्षत्रिय थे। और दूसरी धारा वृष्णि वंशीय यादव क्षत्रिय थे। तृष्ठि के पुत्र भजमान, भजमान के पुत्र विदुरय, विदुरथ के सुर के शिवी, शिवी के पुत्र स्वयं भोज, स्वयंभोन के हृदक, हृदक के देवबाहु, देवबाहु के विदुरथ, विदुरथ के देवभीढ़ हुए। देवीभीक के दो रानियां थी मरिष्ठा और गुणवती । देवभीढ़ के पुत्र सुरसेन के दस पुत्र हुए। इनके नाम है वसुदेव, देवभाग, देवाश्रवा, कानक, संजय, श्यामक, करूं, समोक, शत्सक तथा वृक हुए। वसुदेव के दो पुत्र हुए कृष्ण और बलराम । यदुकुल वंशीय भगवान श्रीकृष्ण की महिमा पंडित छवि ने इस वंश को दैदीप्यमान किया है। विधाता भगवान ब्रह्मासे जिस वंश का उद्भव हुआ, कर्मवीर श्रीकृष्ण ने जिस परंपरा को आगे बढ़ाया और आधुनिक परिवेश में जिन्होंने अपनी समृद्धशाली परिवेश में भी जिन्होंने अपनी समृद्धशाली परंपराओं को अक्षुण्ण बताएं रखा है।
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