भूमिका
हिन्दू-प्रासाद, भारतीय वास्तु-शास्त्र और भारतीय वास्तु-कला का केवल मुकुटमणि नहीं, अपितु उसका प्राण और सर्वस्व है। भारतीय स्थापत्य कला का उद्गम यज्ञ वेदी के पवित्र निर्माण से होता है, और उसकी पराकाष्ठा मंदिर की गगनचुंबी शिखर-शिखा पर जाकर होती है। 'प्रासाद' शब्द अपने भीतर 'प्रकर्षेण सादनम्' (अत्यंत कुशलता और उत्कृष्टता के साथ स्थापित करना या व्यवस्थित करना) की गहन परंपरा को समेटे हुए है। यह परंपरा सर्वप्रथम वैदिक चिति (यज्ञ की पवित्र अग्नि के लिए ईटों का सुव्यवस्थित ढेर) के कलेवर-निर्माण में परिलक्षित हुई, और कालांतर में यहीं हिन्दू मंदिरों के भव्य और आध्यात्मिक निर्माण की अदम्य पृष्ठ-भूमि बना। यह दर्शाता है कि किस प्रकार भारतीय स्थापत्य कला की जड़ें अत्यंत प्राचीन वैदिक परंपराओं में गहराई तक निहित हैं, जो पवित्रता, संरचना और दिव्य संयोजन के सिद्धांतों पर आधारित हैं। सदियों से सौंधी-सौंधी मिट्टी की सुगंध से महकता छत्तीसगढ़, अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ की मिट्टी के कणों में निहित निर्माण परंपरा भारतीय वास्तुकला के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती है। भारतीय मंदिर वास्तुकला में ईट से बने मंदिरों को प्रारंभिक मंदिर वास्तुकला का अंग माना गया है। छत्तीसगढ़ में इंटे से निर्मित मंदिरों का विकास न केवल मंदिर वास्तुकला की प्राचीनता को दर्शाता है, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता और शिल्प-कौशल की परंपरा को भी उजागर करता है। किसी भी राज्य की भौगोलिक परिस्थितियाँ उसकी सांस्कृतिक संरचना को प्रभावित करती हैं। छत्तीसगढ़ का भू-भाग मैदानी है और यहाँ की जलवायु तथा प्राकृतिक संसाधन निर्माण परंपराओं के अनुकूल हैं। इस क्षेत्र का भूगोल अनेक नदियों से सिंचित और जीवनदायिनी प्रवाह से संपन्न है, जिसने यहाँ की सभ्यता और स्थापत्य दोनों को पोषित किया है। छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा महानदी है, जिसे पुराणों में 'चित्रोत्पला' कहा गया है। यह न केवल सिंचाई और जीवनोपयोगी संसाधनों का स्रोत है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त अंचल की अन्य प्रमुख नदियाँ शिवनाथ, इंद्रावती, पैरी, जोंक, खारून, अरपा, सुर्ण, हसदेव, केलो, कोसल, मांड, खोंघा, सोंबूर, और सकरी राज्य के विभिन्न भागों से प्रवाहित होकर अंततः ओड़िशा प्रांत में प्रवेश करती हैं। ये नदियाँ रायपुर, महासमुंद, बिलासपुर और रायगढ़ जैसे जिलों को जोड़ते हुए क्षेत्रीय सांस्कृतिक एकता का भी निर्माण करती हैं। छत्तीसगढ़ की इस प्राचीन भूमि पर ईट मंदिर वास्तुकला का क्रमिक विकास स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यहाँ ईटों से निर्मित मंदिर न केवल तकनीकी दक्षता और स्थापत्य सौंदर्य का परिचय देते हैं, बल्कि यह भी प्रमाणित करते हैं कि इस अंचल में प्राचीन काल से ही एक निरंतर और महत्त्वपूर्ण शिल्प-परंपरा विद्यमान रही है। ईट मंदिरों की यह स्थापत्य श्रृंखला आज भी सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगोचर होती है, जो अतीत और वर्तमान के बीच एक जीवंत सेतु का कार्य करती है। छत्तीसगढ़ के ईट मंदिरों का सबसे प्रारंभिक उल्लेख जे.डी. बेगलर की यात्रा रिपोर्ट में मिलता है, जो "रिपोर्ट ऑफ ए दूर इन बुंदेलखंड एंड मालवा, 1871-72: एंड इन द सेंट्रल प्रोविंसेज, 1873-74" शीर्षक से प्रकाशित हुई है। कालांतर में सर्वेक्षण के क्षेत्र का विस्तार किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा "रिपोर्ट ऑफ ए टूर इन द सेंट्रल प्रोविंसेज एंड लोअर-गैंगेटिक दोआब इन 1881-82" नामक एक और रिपोर्ट का प्रकाशन हुआ है। इन दोनों रिपोटों में सर अलेक्जेंडर कनिंघम और जे.डी. बेगलर ने अपने क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान खोजे गए कई ईट मंदिरों पर विस्तृत चर्चा की है। बाद में, हेनरी कजिन्स ने अपने ग्रंथ "लिस्ट्स ऑफ एंटीक्वेरियन रिमेंस इन द सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बेरार" (1892-94) में इस क्षेत्र के स्थापत्य अवशेषों और शिलालेखों को दस्तावेजित करने का एक समान प्रयास किया। उन्होंने इस क्षेत्र का गहन सर्वेक्षण किया और इस महत्वपूर्ण विषय को पुरातत्वविदों तथा कला इतिहासकारों के समक्ष प्रस्तुत किया। ए. एच. लॉन्गहर्स्ट वह प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने ईट मंदिरों के सामूहिक अध्ययन के विषय को गंभीरतापूर्वक उठाया। उनका महत्त्वपूर्ण कार्य "एन्शियेंट ब्रिक टेम्पल्स इन सेंट्रल प्रोविंसेज" शीर्षक से ए.एस. आई. की वार्षिक रिपोर्ट 1909-10 में प्रकाशित हुआ है। अपने इस विस्तृत कार्य में, उन्होंने उस क्षेत्र (तत्कालीन मध्य प्रांत) के सभी संभव ईट मंदिरों को समाहित करने का प्रयास किया। पर्सी ब्राउन, ए. कुमारस्वामी और पी. के. आचार्य जैसे प्रतिष्ठित कला इतिहासकारों ने भी अपने लेखन में इस क्षेत्र के कुछ ईट मंदिरों का विवरण प्रस्तुत किया।
लेखक परिचय
विनय कुमार (जन्म 1976) प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र के प्रतिष्ठित विद्वान हैं। वर्तमान में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में में सह-प्राध्यापक सह-प्राध्यापक के के रूप रूप में में कार्यरत व हैं। उन्होंने पीएच. डी.. एम.ए. (प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व), एम.ए. (पुरातत्त्व एवं विरासत प्रबंधन) तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरातत्त्व संस्थान से पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया है। उन्होंने लहुरादेवा, भिरड़ाना, बारोर, हांसी, भानपुरा आदि उत्खननों में योगदान दिया और गम्भीरवाटोला में सह-निर्देशन तथा चन्दौली जिले के माटीगाँव पुरास्थल पर प्रमुख उत्खनन सत्रों का निर्देशन किया। उन्हें भारत के पूर्व राष्ट्रपति से स्वर्ण पदक, यूजीसी की जे. आर. एफ-एस. आर. एफ तथा कोरिया के राष्ट्रीय संग्रहालय की म्यूजियम नेटवर्क फेलोशिप सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उन्होंने अब तक आठ पुस्तकों का प्रकाशन किया है और अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं। देश-विदेश में वे ४५ से अधिक व्याख्यान दे चुके हैं और छः शोधार्थियों का पीएच.डी. मार्गदर्शन कर चुके हैं। भारतीय पुरातत्त्व परिषद्, इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर एशियन हेरिटेज, वर्ल्ड आर्कियोलॉजिकल कांग्रेस सहित कई प्रतिष्ठित समितियों के स्थायी सदस्य हैं। डॉ० कुमार फ़ारसी, जर्मन, संस्कृत, उड़िया, बांग्ला एवं मैथिली सहित अनेक भाषाओं में प्रवीण हैं।
कृत्ति कुशवाहा का जन्म 30 जुलाई 1999 में देवरिया जिलें के महलिया गाँव में हुआ है। इन्होंने अपनी स्नातक और स्नातकोतर की डिग्री काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त किया है। वर्तमान समय में यह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग से "उत्तर भारत के इष्टिका मंदिरों का स्थापत्य उद्भव एवं विकास (प्रारंभ से ।। वी शताब्दी तक) "विषय पर सह-प्राध्यापक डॉ. विनय कुमार के निर्देशन में अपना शोध कार्य कर रहीं हैं। कृति कुशवाहा ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है तथा भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद द्वारा शोधवृत्ति प्राप्त कर रहीं है। इन्होंने वास्तुकला और कला विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध पत्र प्रस्तुत किया है।
पुस्तक परिचय
भारतीय स्थापत्य परंपरा में मंदिरों का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही समुद्ध, गौरवशाली और प्रशस्त भी है। विभिन्न कालखण्डों में विकसित मंदिर स्थापत्य भारतीय सभ्यता की निरंतरता और उसकी सृजनात्मकता का द्योतक है। प्राचीन भारतीय वास्तुकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ वह विशिष्ट राज्य है, जहाँ प्रारंभिक स्थापत्य विकास में इष्टिका का उल्लेखनीय योगदान परिलक्षित होता है। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक परिस्थितियों के अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि यह प्रदेश नदियों के घने जाल से आच्छादित है। इसके भीगोलिक स्वरूप में मैदानी क्षेत्र की प्रधानता पाई जाती है। चट्टानों एवं पाषाण की उपलब्धता कम तथा रेत एवं मिट्टी की प्रचुरता के कारण संभवतः यहाँ के मंदिर-निर्माण में प्रायः ईंट को ही प्रमुख निर्माण सामग्री के के रूप में अपनाया गया। इन मंदिरों में सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर, राजिम का राजीव लोचन मन्दिर, खरीद का इंदल वेवल, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, तालागावं का देवरानी जेठानी मन्दिर, खरीद का शबरी मन्दिर, खरीद का लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर, धोबानी का चितवारी देवी मन्दिर, तुरतुरिया का इष्टिका मन्दिर, सिरपुर का राम मन्दिर, कबीरधाम का भोरमदेव मन्दिर समूह प्रमुख हैं। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ की इष्टिका स्थापत्य के विविध आयामों का सुव्यवस्थित एवं गहन अध्ययन प्रस्तुत करती है। अतः यह कृति भावी शोधकर्ताओं, पुरातत्वविदों तथा कला-इतिहास में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन सामग्री के रूप में सहायक सिद्ध होगी।
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