लोकतंत्र की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, सरकारी निर्णयों, राजनीतिक उथल-पुथल तथा संविधान संशोधनों का तर्कपूर्ण विश्लेषण.
26 जनवरी, 1950 से शुरू हुई भारतीय लोकतंत्र की यात्ना अनेक चुनौतियों से गुज़रती हुई अपने वर्तमान तक पहुँची है। 75 वर्ष की इस यात्रा में भारतीय लोकतंत्र ने बहुत से जोखिम भरे मोड़, दुर्गम उतार-चढ़ाव पार किए हैं।
1952 में हुए पहले आम चुनाव से अब तक, समय-समय पर अनेक राजनीतिक दल, संगठन और व्यक्ति अपने स्वप्नों, नीतियों, कार्यक्रमों और सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती महत्त्वकांक्षाओं के साथ इस यान्ना से कभी जुड़ते, कभी बिछड़ते रहे। ऐसे बहुत से स्वर और चेहरे समय की धारा में बिखर गए या बिसरा दिए गए, लेकिन उन्होंने हमारे लोकतंत्र को दशा और दिशा को स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पुस्तक उन स्वरों, व्यक्तियों व घटनाओं का लेखा-जोखा और पुनरावलोकन भी है, जिनसे गुज़रते हुए हम अपने वर्तमान लोकतंत्र तक पहुँचे हैं।
इतिहास को कथा की उत्सुकता और रोचकता के साथ प्रस्तुत करने वाले प्रियंवद इसके पहले भारतीय राजनीति पर दो बेहद महत्त्वपूर्ण व चर्चित पुस्तकें भारत विभाजन की अंतःकथा और भारतीय राजनीति के दो आख्यान लिख चुके हैं। यह पुस्तक उसी कड़ी का अगला पड़ाव है।
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