मेरा यह मानना है कि हर व्यक्ति के हृदय में कोई न कोई कथा या गाथा छिपी होती है। इसमें नर या नारी का भेद नहीं है। अब वह उस कथा को कब और कैसे व्यक्त करता है- यह प्रश्न गौण है। लेकिन मौका मिलने पर व्यक्ति अपनी कथा को बताने का प्रयास अवश्य करता है- माध्यम कोई भी हो सकता है। मित्रों के संग बैठ कर अपनी जीवन में घटित घटनाओं को सुनाना हो या पति पत्नी द्वारा अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं को कहना। आपको याद होगा कि बचपन में हमें कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता था। दादी खूब नमक मिर्च लगा कर एक ही कहानी को अलग-अलग तरह से बच्चों को सुनाने की कला जानती थीं। कोई व्यक्ति अपने मन के उद्गार कैसे प्रकट करता है। यह उसकी योग्यता पर निर्भर करता है। कोई स्टोरी टेलर है तो कोई लेखक। कोई कहानीकार बनता है तो कोई उपन्यासकार ।
मैं अपनी बात करूं, तो आज मैं 74 वर्ष का हो गया हूँ और अब मैंने विधिपूर्वक नियमित लिखना प्रारम्भ किया है। लिखना प्रारम्भ किया तो पाया कि मेरे पास तो बहुत मैटर है देने के लिये। जब अपने भविष्य पर नजर डाली तो पाया कि समय समय पर मैंने लिखा है। मेरी पहली कविता 16 वर्ष की आयु में स्थानीय अखबार में प्रकाशित हुई थी। जब में 12वीं का विद्यार्थी था तो मैंने एक उपन्यास लिख डाला था, जिसे सुधारने के लिये अपने एक पूज्य गुरु जी (अध्यापक) को सुधारने के लिये दिया था, जिसे उन्होंने समय मिलने पर सुधारने को कहा था। बाद में मेरा शहर छूट गया नौकरी लग गई। उस उपन्यास को भी भूल गया।
1971-72 में भी एक या दो आधी अधूरी कथायें लिखी। यह सब लिखने से मेरा आशय है कि लिखने की भूख कहें या कला विद्यमान थी। पढ़ने का अद्भुत शौक था। जब पगार 300 रू. मासिक थी, तब भी मैं नियमित घरेलू लाइब्रेरी योजना का सदस्य था और उसमें 5 रू. मासिक का योगदान करता था। 5 रू. में 6 रू. की पुस्तकें मिलती थी। उस आयु में भी उच्च कोटि के साहित्यकारों की पुस्तके खरीदकर पढ़ना मेरा शौक था। गांव मे पोस्टिंग थी। किताबों के अतिरिक्त और कोई मनोरंजन का साधन भी नहीं था। अच्छी किताबे पढ़ने का शौक आज तक विद्यमान है। धर्मयुग, सारिका जैसी पत्रिकाओं का नियमित पाठक था।
1976 मे विवाह के साथ ही सारे शौक छूट गये। सिर्फ परिवार का भरण पोषण कर रहा था परन्तु पढ़ने का शौक नहीं छूटा। 25 वर्ष बिना लिखे ही बीत गये। सन् 2000-2003 में वृन्दावन में पोस्टिंग के समय, अकेले रहने का प्रभाव-कुछ आध्यात्मिक लेख लिखे। कुछ अखबारों एवं पत्रिकाओं में छपे भी लेकिन कुछ ज्यादा नहीं। बच्चे बड़े होने लगे। उनकी शिक्षा और विवाह इत्यादि में फंस गया। याद ही नहीं रहा कि मैं लिख भी सकता हूँ। ज्योतिष विषय का भी कुछ शौक था। 2012 में नौकरी से तो रिटायर हो गया, पर घर के कामों से रिटायर न हो सका। 2023 में ज्योतिष के हिसाब से कहूँ तो बुध की महादशा लगी। मैने देखा कि मेरे पास तो बहुत मैटर है। भौतिक रूप में भी और मानसिक रूप में भी। अपने गुरु जी नारायण ऋषि द्वारा लिखवाया गया ज्योतिष संबंधी ज्ञान और उनके द्वारा दी गई एक उसी विषय की फाइल ने थोड़ी हिम्मत दी और अपने ज्ञान और अनुभव पर आधारित एक पुस्तक 'नारायण ज्योतिष तैयार कर दी। जो अब प्रकाशित भी हो चुकी है। इसके लिये देश के सबसे प्रतिष्ठित एवं पुराने प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास जी के संचालक वरूण जैन जी का मैं बहुत आभारी हूँ। उस पुस्तक के बाद भी बहुत सा मैटर टाइप्ड था जो पहले छप भी चुका था, रखा था। इसमें कुछ नये लेख जोड़ कर पुस्तक रूप में तैयार करा दिया।
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