शिल्प एक विस्तृत शब्द है जिसके अंतर्गत अनेक कलाएं तथा हस्तकलाएं छिपी है। इसके अंतर्गत उपयोगिता और सौन्दर्य दोनों का समावेश रहता है। मानव जन्म और मानव विकास के साथ ही शिल्प कला का जन्म हुआ। शिल्पकारों ने अपने द्वारा उत्पादित शिल्प के माध्यम से न केवल मानव की दैनिक आवश्यकताओं को पूर्ण किया बल्कि उनमें सौन्दर्य शास्त्र को भी जन्म दिया। वस्तुतः शिल्प और कला में कोई विशेष अंतर नहीं था क्योंकि शिल्पकार आर्थिक एवं दैनिक उपयोग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिल्प वस्तुओं का सृजन तो करते ही थे साथ ही उनमें अपनी सौन्दर्य अभिव्यक्ति को भी ध्यान दे दिया करते थे। मानव इतिहास में शिल्प को जीवन का एक अति आवश्यक अंग स्वीकार किया गया था और शिल्पकार के बगैर समाज की कल्पना निरर्थक थी। शिल्पकार समाज को गति देने वाला महत्वपूर्ण कारण स्वीकार किया गया था। इसी कारण शिल्पकार को सामाजिक राजनीतिक संरक्षण दिया गया था। धार्मिक ग्रंथों में उसकी उपयोगिता को स्वीकार किया गया था। मनु ने कहा है.
नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्डे सच्च प्रसारितम।
ब्रह्मचरिगंत भैक्ष्यं नित्यं मेध्यथिति स्थितिः ।।
धार्मिक ग्रंथों मे शिल्पकार का संबंध देवताओं के प्रिय शिल्पी विश्वकर्मा के साथ जोड़ा गया है जो विभिन्न कलाओं और हजारों शिल्पों का स्वामी है।
शिल्प के अंतर्गत मिट्टी एवं धातु के बर्तन तथा मूर्तियां धातु के हथियार, लकडी, पत्थर एवं हाथी दांत की वस्तुएं बनाना और उन पर शानदार नक्काशी करना, खिलौने, वस्त्र, पत्थर की इमारतें, कालीन, चमडे की वस्तुएं आदि आते है। समाज और राज्य शिल्प और शिल्पकार की उपयोगिता को समझते थे, इसी कारण उनको समाज में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। उनकी सुरक्षा के लिए नियम बनाए गए थे। उनको प्रोत्साहित करने के लिए यथा संभव पुरस्कार आदि दिए जाते थे। शिल्पकार भी अथक परिश्रम करके न केवल समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे वरन अपने श्रेणी संघ के माध्यम से समाज और राज्य के कल्याणार्थ अनेक कार्यों को सम्पन्न करते थे।
शिल्प और शिल्पकार की विकास यात्रा को कुछ समय के लिए मध्यकाल में आघात लगा जबकि भारत पर मुस्लिम आक्रमणों की बाढ़ आ गई जिसके कारण शिल्प दैनिक आवश्यकता तक सिमटकर रह गया। दिल्ली सल्तनत की स्थापना, उसको मिले स्थायित्व एवं फिर मुगल सत्ता की स्थापना से एक बार फिर शिल्पकार को प्रोत्साहन मिला। किले, महल, मस्जिद आदि के निर्माण के लिए शिल्पकारों को बुलाया गया। राजकीय वस्त्रों, आभूषणों, कलात्मक बर्तनों, हथियारों आदि की पूर्ति के लिए भी शिल्पकारों को कार्य सौपे गए। शहरों में मुस्लिम अभिजात वर्ग के कदम ने शिल्पकार की मांग में तीव्र गति से वृद्धि की। मुगल शासक कला प्रिय थे, अपने शौकों को पूर्ण करने के लिए उन्होने न केवल शिल्पकारों को कार्य करने के लिए प्रेरित किया वरन अपनी देखरेख में शिल्प संबंधी कारखाने स्थापित कराए और उनमें भाडे पर शिल्पकारों को रखा गया। मुगल काल प्राचीन काल से पूर्णतया अलग था, इस काल में शिल्प को तो प्रोत्साहन दिया गया मगर शिल्पकार समाज के अंतिम छोर पर खड़ा रह गया।
प्रस्तावित शोध शिल्पकार और भारतीय समाज (1526 से 1707 ई. तक) को सुविधा की दृष्टि से 7 अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय प्रस्तावना के रूप में है जिसमें प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक शिल्प और शिल्पकार की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
किसी भी देश के आर्थिक विकास में औद्योगीकरण महत्वपूर्ण योगदान करता है।
इससे राष्ट्रीय आय में तीव्र गति से वृद्धि होती है, जनता की आय में निश्चितता आती है, श्रमिकों की क्षमता में वृद्धि होती है जिससे उत्पादन के परिणाम बढ़ जाते है और परिवहन तथा यातायात के अनेक साधन विकसित हो जाते हैं। भारत ने औद्योगीकरण (शिल्प) के ये लाभ प्राचीन काल में एक बडे स्तर पर प्राप्त किए थे जबकि भारत में सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था शिल्प उत्पादन के इर्द गिर्द घूमती थी।
प्राचीन काल से ही भारत शिल्प उत्पाद के क्षेत्र में सम्पन्न रहा है। एडवर्ड थार्नटन ने लिखा है, "जब नील नदी की घाटी में पिरामिड देखने को भी नहीं मिलते थे, जब आधुनिक सभ्यता के केन्द्र इटली और यूनान जंगली और असभ्यावस्था में थे, उन दिनों भारत वैभव और सम्पत्ति का केन्द्र था।' भारत का यह वैभव उसके शिल्प उत्पाद और व्यापार के कारण ही था। औद्योगिक आयोग की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि जिन दिनों आधुनिक औद्योगिक प्रणाली का जन्म स्थल पश्चिमी यूरोप असभ्य कबीलों का अवास स्थल था उन दिनों आर्यावर्त अपने शासको के धन और अपने शिल्पकारों के श्रेष्ठ कलात्मक कौशल के लिए विश्व विख्यात था। भारत में प्राचीन काल से ही शिल्प उद्योग विकसित अवस्था में था और यहां विभिन्न प्रकार के वस्त्र, धातुओं के आकर्षक सामान और हाथी दांत, चंदन तथा लकडी के सामान बनाए जाते थे। शिल्पकार कला मर्मज्ञ थे। लोहे की शिल्प सामग्री की प्रशंसा करते हुए प्रो. विल्सन ने लिखा है "भारत के शिल्पकार लोहे को गर्म करना, उसे मोड़ना और उसे ढालना बखूबी जानते थे। बेबर ने अपने कथन में भारत के वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग और पत्थर उद्योग की भी प्रशंसा की है। भारतीय समाज के बनने से पूर्व ही, शिल्प मानव के लिए एक आवश्यक तत्व बन गया था। मानव की समझ और उसके कौशल तथा उसके भौतिकवादी होने का परिणाम शिल्प में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया था। इसी कारण प्राचीन ऐतिहासिक युग से ही शिल्पजगत में नित परिवर्तन आते गए और वह भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वूपर्ण अंग के रूप में उभरकर सामने आया।
ऐतिहासिक युग में भारतीय समाज के आर्थिक जीवन का विकास क्रमशः हुआ। सरस्वती सिन्धु सभ्यता के उत्खनन में जो शिल्प सामग्री प्राप्त हुई है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि सरस्वती सिन्धु सभ्यता औद्योगिक विष्टिकरण पर आधारित सभ्यता थी जिसमें समस्त प्रकार के शिल्प उद्योग विशिष्टता पर आधारित थे। दूसरी तरफ वैदिक युग में आते हैं तो पाते हैं कि पूर्ववैदिक आर्यों की आर्थिक स्थिति कोई बहुत सुंगठित और सुव्यवस्थिति नहीं थी। ऋग्वैदिक आर्यों ने अपने समाज और अर्थव्यवस्था को एक साथ धीरे धीरे संगठित किया था। शिल्प कार्य उनके लिए दैनिक आवश्यकता का अंग थे। आगे चलकर उसमें सौन्दर्य और कलात्मकता का प्रवेश हुआ। पूर्ववैदिक युग में आर्यों ने अपनी अपनी रूचि के अनुसार शिल्पों को अपनाया था और उनको पृथक पृथक नाम दिए जो उत्तरवैदिक युग में आकर अलग-अलग वर्गों के नाम से जाने गए। जैसे कर्मार, रथकार, हिरण्यकार, चर्मकार, स्वर्णकार आदि। समाज विकसित होने के साथ साथ शिल्प कार्य भी परवान चढ़ता गया। उत्तर वैदिकाल, बौद्धकाल, मौर्यकाल, शुंग-सातवाहन काल और गुप्त काल में शिल्प कार्य केवल एक कार्य न रहकर एक उद्योग और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बन गया। प्राचीन भारत में व्यापार एवं वाणिज्य का आधार शिल्प सामग्री ही थी प्राचीन धार्मिक साहित्य एवं ऐतिहासिक ग्रन्थों में लगभग 75 प्रकार के शिल्प कार्यों का उल्लेख मिलता है। शिल्प और शिल्पकारों की उपयोगिता को समझकर समाज व्यवस्थाकारों, कानूनविदों एवं राज्य ने उनकी सुरक्षा के लिए कानून बनाए।
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