मोहम्मद इशरत खान द्वारा लिखित पुस्तक "भारतवर्ष की सांस्कृतिक धरोहर" अपने आप में एक अनूठी पुस्तक है जिसमें भारत की विभिन्न जनजातियों, संस्कृतियों और कलाओं की विलक्षणता परिलक्षित होती है।
2. उनका यह प्रयास सराहनीय है। उन्होंने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण परिवेश में रहते हुए इस पुस्तक द्वारा हिन्दुस्तान की विलुप्त होती हुई विरासत, सुन्दर और मनमोहक कलाओं, मेलों व तीज-त्यौहारों तथा धार्मिक आस्थाओं पर एक विश्लेषणात्मक नज़र डाली है। लेखक ने आम बोल-चाल की भाषा का इस्तेमाल बड़े ही सहज और सरल ढंग से किया है। किंवदन्तियों का वर्णन मार्मिक है। 'कथानक' में कदाचित् तारतम्यता का एहसास हो उठता है। शब्दों का चुनाव बड़ी ही चतुराई से किया गया है। हिन्दी, अंग्रेज़ी व उर्दू के आमतौर पर इस्तेमाल में आने वाले प्रचलित 'अल्फाज' का भरपूर इस्तेमाल इस पुस्तक' को एक नई पहचान प्रदान करता है। 3. 'खाकी' एवं लेखनी के मध्य समायोजन का यह उदाहरण विरले ही देखने को मिलता है। मै श्री खान को उनकी इस कृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि यह पुस्तक भारत के समस्त प्रदेशों के प्रबुद्ध वर्ग के बीच अवश्य लोकप्रिय होगी तथा उन्हें आनन्द एवं प्रेरणा प्रदान करेगी।
4. शुभ कामनाओं सहित ।
भारत भूमि देव भूमि है- इसकी सभ्यता और संस्कृति नें सदियों से समस्त विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है। भारतवर्ष की यह-वह धरोहर है, जिसका शुमार विश्व की महानतम् और प्राचीनतम् संस्कृतियों में होता है। यहाँ की सभ्यता, सहनशीलता और सहिष्णुता ने समस्त मानवता और पूरे विश्व को प्रभावित किया है।
2. यद्यपि अनेक रचनाकारों ने भारतीय संस्कृति को अपनी लेखनी के माध्यम से प्रकाशित किया है, फिर भी मेरे अंतर्निहित कला प्रेम ने मुझे भी इस विषय पर कुछ रौशनी डालने को प्रेरित किया। भारतीय संस्कृति एवं विविधता को एकीकृत कर जीवंत रूप में प्रस्तुत करने का मेरा यह लघु प्रयास है।
3. शुरूआत हमने मध्य प्रदेश से की है, क्योंकि मेरी लेखनी का सफर भी यहीं से शुरू हुआ। इसके पश्चात् मैंनें देश के हर कोने में छिपी भारतीय संस्कृति और उसके विविध रूपों को समेटने की भरपूर कोशिश की है।
4. इस रचना में भारत के अनेक राज्यों, वहाँ की जन-जातियों एवं कलात्मक तथ्यों को उजागर किया गया है। उत्तर- पूर्व राज्यों की प्राकृतिक छटा से लेकर राजस्थान की मरूभूमि, उत्तरी क्षेत्र में हिमालय की अट्टालिकाओं पर बसर करने वाली जनजातियों एवं भारतवर्ष के विभिन्न उत्सव एवं उत्कृष्ट कलाओं को चित्रित करने का हमारा यह प्रयास शायद पाठकों को पसंद आयेगा। उड़ीसा की सावरा जनजाति, बिहार के छोटानागपुर की बिरहोर जनजाति, पूर्वाचल की बोड़ो संस्कृति एवं कई राज्यों के महत्वपूर्ण उत्सवों एवं वहां पर प्रचलित कलात्मक तथा स्थापत्य कलाओं को इसमें संकलित किया गया है।
5. इन तमाम विषय वस्तुओं को एक 'पुस्तक' की शक्ल प्रदान करने की दिशा में सीमा सुरक्षा बल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। एक सीमा प्रहरी होने के नाते मुझे, भारत के विभिन्न प्रांतों के दुलर्भ स्थलों का दौरा करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान मुझे वहाँ की संस्कृति, वहाँ की कला, वहाँ के उत्सव एवं जनजातियों को नज़दीक से जानने एवं समझने का मौका मिला, जिसे मैं अपने विचारों के माध्यम से, जो 'यात्रा-वृत्तान्त' पर आधारित है, आप पाठकगण तक पहुंचा रहा हूँ।
6. उम्मीद है कि यह रचना भारत की संस्कृति, विभिन्न प्रांतों की अद्भुत कलाओं एवं विलुप्त हो रही जनजातियों से आम जनता को रूबरू कराने में सार्थक सिद्ध होगी।
7. अपनी पुस्तक "भारतवर्ष की सांस्कृतिक धरोहर" को आपकी ख़ातिर सुपुर्द करते हुए अब सारी बातें आप ही पर छोड़ता हूँ कि आप इसे किस रूप में, किस अंदाज़ में और किस भावना के साथ स्वीकार करते हैं, क्योंकि एक महान शायर ने भी कहा है :-
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