मारी भारतीय संस्कृति बहुत ही समृद्ध है, यह हमें जीवन जीने के तरीके और ऋतुओं के अनुसार ही भोजन शैली को अपनाने की हमारी सलाह देती है। भोजन के साथ ही नियम बद्ध दिनचर्या का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है, जिसमें सुबह से शाम-रात को सोने तक योग, ध्यान, भोजन, गतिविधियों और निद्रा (सोने) के समय तक के नियम बताए गए हैं।
यही कारण है कि पहले के समय में लोग शारीरिक श्रम और उचित भोजन शैली को अपनाकर निरोगी जीवन जीते थे।
धीरे-धीरे मानव जीवन में व्यस्तताएँ इतनी बढ़ी कि उसका असर खान-पान और रहन-सहन के तौर तरीकों पर पड़ने लगा, परिणामस्वरूप शरीर धीरे-धीरे रोगग्रस्त होने लगे।
मधुमेह रोग भी अनियमित दिनचर्या और भोजन की गड़बड़ियों का परिणाम है। कुछ समय पहले तक यह रोग बड़ी उम्र के लोगों में देखने को मिलता था, किन्तु अब तो युवा हों या बच्चे, छोटे से बडों तक सभी में यह रोग देखने को मिल रहा है।
वर्तमान समय में भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में मधुमेह रोग अपनी गहरी जड़ें बना चुका है। इससे बाहर आ पाना नामुमकिन-सा ही दिखाई देता है।
आज के समय में ज्यादातर सभी लोग बहुत समझदार और जानकार हैं, अतः मैं कोई सलाहकार, डॉक्टर या उपदेशक नहीं हूँ, मैं एक साधारण स्त्री हूँ और मुझे मधुमेह रोग करीब 15-16 साल से है, इसे नियंत्रण में करने के लिए मैंने बहुत सारे प्रयास किए हैं। जिसके अंतर्गत नियमित दिनचर्या को अपना कर मधुमेह रोग पर नियंत्रण पाया है।
यह मेरा अपना अनुभव है, अपने अनुभवों और प्रयासों को यहाँ सबके साथ बांटना चाहती हूँ, जिसके पीछे मेरी एक ही मंशा है कि इस रोग से ग्रस्त लोग थोड़ा-सा ध्यान अपनी जीवन शैली और खानपान पर दें और वह अपना व अपने परिवार के बच्चों व बड़ों का ध्यान रखें तथा इस रोग को अच्छे से समझ कर इस पर नियंत्रण पा सकें।
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