भारतीय समाज की आवश्यकता के अनुरूप इस देश के महापुरुषों, ऋषियों एवं मुनियों द्वारा आदिकाल से निर्मित होते आ रहे सामाजिक विधान, नैसर्गिक रूप में प्रतीत होते हैं। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए सर्व प्रथम मनु को श्रेष्ठतम प्रणेता के रूप में अग्रणी माना जाता है, उन्होंने सामाजिक विधान को बहुत ही लचीलेपन से निर्मित किया और सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के दृष्टिकोण से उन्होंने नारी-वर्ग को समाज में सम्माननीय स्थान दिया । महाराज मनु ने कहा है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्र तास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।
(मनुस्मृति, ३ / ५६)
अर्थात्- "जहाँ नारी की पूजा होगी, वहाँ स्वर्ग बन जाएगा, देवता निवास करेंगे और जहाँ नारी की पूजा नहीं होगी, वहाँ सारे फल, क्रियाएं समाप्त हो जाएंगी और दुःखों का सामना करना पड़ेगा।"
इसी प्रकार वेदव्यास ने भी नारी-वर्ग को समाज में श्रेष्ठतम स्थान प्रदान
किया। स्त्रियों के लिए उन्होंने कहा है-
नास्ति गंगा समं तीर्थं नास्ति विष्णु-समः प्रभुः ।
नास्ति शम्भु-समः पूज्यो नास्ति मातृ-समो गुरुः ।।
अर्थात् "गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान कोई प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूजनीय नहीं तथा वात्सल्य स्रोतस्विनी मातृ-हृदया नारी के बराबर कोई गुरु नहीं, जो इस लोक और परलोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे ।"
जैसा कि हिन्दू धर्म, सनातन धर्म के रूप में अनादिकाल से प्रचलित है, को संसार के सबसे पहले धर्म के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है और सनातन धार्मिक व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी सर्वाधिक पुरातन रूप में मान्यताएँ दी गई हैं। वस्तुतः इस धर्म के प्रणेता ऋषियों, मनीषियों ने नारियों को समाज में सर्वोच्च स्थान दिया। यही कारण रहा कि वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल तक स्त्रियों की पारिवारिक व सामाजिक स्थिति सम्माननीय रही है, उन्हें परिवार में साम्राज्ञी के रूप में देखा जाता था। किन्तु स्मृतिकारों व व्याख्याकारों ने स्त्रियों के सम्माननीय अधिकारों पर अधिक कुठाराघात किए, वर्ण-व्यवस्था को भी तहस-नहस कर, वर्ण-व्यवस्था को जाति-व्यवस्था में परिवर्तित करने में अहम् भूमिकाएँ निभाई, जातियों को उपजातियों में विभक्त किया जाता रहा। फलतः वैवाहिक सम्बन्धों का दायरा सीमित होता गया तथा वैवाहिक सम्बन्धों को धार्मिक प्रधानता दिए जाने के प्रतिफलस्वरूप विवाह-सम्बन्धों में धार्मिक भावनाएँ बलवती हुई।
यद्यपि वैदिककाल में वर्ण-व्यवस्था ही समाज की संरचना व संगठन की प्रमुख आधार थी, किन्तु वर्ण-व्यवस्था के ह्रास के साथ ही जातिवाद सुदृढ़ हुआ और जातिगत सदस्यों को संगठित करने तथा जाति के प्रति निष्ठावान बने रहने के लिए स्मृतिकारों एवं व्याख्याकारों ने बाध्यतामूलक परिस्थितियाँ पैदा कीं तथा स्त्रियों की पारिवारिक व सामाजिक स्थिति को निम्नतर बनाया, जाति के नियम कठोर व दुरूह बना दिए गए। कर्म के स्थान पर जन्म को महत्त्व दिया जाने लगा, अनुलोम-प्रतिलोम विवाह के स्थान पर कुलीन विवाह, अन्तर्जातीय विवाह के स्थान पर अन्तर्विवाह को मान्यता दी जाने लगीं।
कन्या के विवाह में कन्यादान करने के समय कुछ गुप्तदान देने का भी धार्मिक विधान निर्मित होने के फलस्वरूप विवाह में दान देने का प्रचलन हुआ। इस दान ने दहेज का रूप लिया। वस्तुतः ऋग्वेद और अनेक धार्मिक ग्रन्थों में वैवाहिक सम्बन्धों में दहेज के संकेत मिलते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में प्राचीनकाल से दहेज प्रथा का प्रचलन राजा-महाराजाओं और उच्च कुलों में रहा। किन्तु धर्म-ग्रन्थों व राजा-महाराजाओं का अनुकरण कर आम व्यक्ति अपनी कन्याओं के विवाह में धार्मिक महत्ता एवं मोक्ष-प्राप्ति की भावना के वशीभूत होकर दान-दहेज देने लगे। अन्ततोगत्वा जातीय सुदृढ़ता और कुलीनता ने दहेज प्रथा को दिन-प्रतिदिन विकसित किया। अन्ततः जातिवाद एवं, कुलीनवाद के दुष्परिणामस्वरूप वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना का क्षेत्र सीमित हुआ फलतः कन्याओं के मंगलमय, सुखमय व समृद्धिशाली जीवन-यापन की भावना ने दहेज-प्रथा को प्रोत्साहित किया। इसके परिणामस्वरूप नारी-वर्ग की सामाजिक स्थिति में गिरावट ही आई।
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