लेखक परिचय
डॉ. प्रियंका वाघेला जन्मः 17 अक्टूबर, 1990 माता-पिताः भारती बहन वाघेला, नरणभाई वाघेला पतिः श्री सागर कुमार ठाकोर शैक्षिक योग्यताः पी.टी.सी., एम.ए., बी.एड., एम. फिल, पीएच. डी. सम्प्रतिः प्राथमिक स्कूल में शिक्षिका प्रकाशनः साहित्य वीथिका जैसी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित आवासः सेवा सहकारी मंडली के पास, गोध-बामणगाम, तहसील-आंकलाव जिला- आनंद, गुजरात
प्राक्कथन
मेरी मातृभाषा गुजराती है फिर भी मैंने हिन्दी भाषा में अध्ययन किया है। में स्नातक कक्षा से ही हिन्दी भाषा से जुड़ी हुई हैं। आज मुझे हिन्दी भाषा अपनी सी लग रही है। भारत के कई राज्यों की बोलचाल में ज्यादातर हिन्दी भाषा का प्रयोग होता है। विश्व में हिन्दी तीसरे नंबर पर बोली जानेवाली भाषा है। इसलिए मैंने हिन्दी भाषा को चुना इस बात की मुझे खुशी हो रही है। हिन्दी के कई साहित्यकारों ने हिन्दी की विभिन्न विधा पर अपनी कलम चलाई है। उसमें ज्यादातर हिन्दी भाषी साहित्यकार ही होते हैं। एक ऐसे साहित्यकार हैं जो अहिन्दी भाषी होने के बावजूद उन्होंने हिन्दी भाषा साहित्य में अपना योगदान दिया है और वह हैं डॉ. पारूकान्त देसाई। मुझे डॉ. दिलीप मेहरा सर और डॉ. हसमुख परमार सर के पास से डॉ. पारूकान्त देसाईजी के बारे में पता चला। मैंने सुना है कि वे गुजराती भाषी हैं फिर भी उन्होंने हिन्दी भाषा में बहुत अच्छा लेखन कार्य किया है। उन्होंने कविता, दोहा, निबंध, आलोचना, बाल साहित्य आदि पर लेखन कार्य किया है। उनके बारे में ये सब सुनकर मुझे उनके समग्र हिन्दी साहित्य पर अध्ययन करने की इच्छा हुई। इसलिए मैंने उनके समग्र साहित्य पर अध्ययन करने का निर्णय लिया। इस तरह डॉ. दिलीप मेहरा सर की सहायता से मैंने 'डॉ. पारूकान्त देसाई का समग्र हिन्दी साहित्य' नामक विषय पर अपने अध्ययन का कार्य शुरू किया। डॉ. पारूकान्त देसाई जी अहिन्दी भाषी प्रदेश के हिन्दी भाषी साहित्यकार हैं। वे कवि, समीक्षक, आलोचक, निबंधकार एवं व्यंग्यकार के रूप में हमारे सामने आते हैं। गुजराती भाषी होने के बावजूद भी उन्होंने हिन्दी भाषा में बहुत ही अच्छी तरह से लेखनकार्य किय के अंतर्गत डॉ. पारूकान्त देसाई के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। उनके व्यक्तित्व में उनके जन्म, शिक्षा-दीक्षा और अध्यापन कार्य, पारिवारिक जीवन, संघर्षयात्रा आदि को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही उनकी साहित्यिक यात्राएँ, विभागीय गतिविधियाँ, साहित्यिक सम्मान एवं पुरस्कार, साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में परिचय दिया गया है। द्वितीय अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई के समग्र हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त परिचय' के अंतर्गत उनके काव्य संग्रह, दोहा संग्रह, निबंध संग्रह, आलोचना, बाल साहित्य का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। तृतीय अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई का कविता साहित्य' के अंतर्गत 'बिजली के फूल', 'मिलन के क्षण चार', 'भेदकु खोला कबिरा बोला', 'सूखं सेमल की वृत्तों पर', कविता संग्रह के कथ्यपक्ष और शिल्पपक्ष को दर्शाया गया है। कथ्यपक्ष के अंतर्गत विभिन्न विषयों पर आधारित कविताओं की चर्चा की गई है। शिल्प पक्ष के अंतर्गत भाषा-शैली, शब्द प्रयोग की चर्चा की गई है। चतुर्थ अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई का दोहा साहित्य' के अंतर्गत 'मानसमाला' और 'देसाई सतसई' दोहा संग्रह का कथ्यपक्ष और शिल्पपक्ष को प्रस्तुत किया गया है। कथ्यपक्ष के अंतर्गत विविध विषयों पर आधारित दोहों की चर्चा की गई है। शिल्पपक्ष के अंतर्गत भाषा-शैली, छंद, अलंकार की चर्चा की गई है। पंचम अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई का गद्य साहित्य' के अंतर्गत 'कबीरा खड़ा बाजार में : व्यंग्य निबंध' तथा 'चिन्तनिका निबंध संग्रह' के बारे में परिचय दिया गया है। षष्ठम अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई का आलोचना और शोध विषयक साहित्य' के अंतर्गत 'युग निर्माता प्रेमचंद तथा कुछ अन्य निबंध', 'समीक्षायण', 'साठोत्तरी उपन्यास', 'हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त सुगम इतिहास', 'आधुनिक लेखिकाओं के नगरीय परिवेश के उपन्यास', 'हिन्दी उपन्यास साहित्य की विकास परंपरा में साठोत्तरी उपन्यास' की विस्तृत रूप से चर्चा की गई है। सप्तम अध्याय 'डॉ. पारूकान्त देसाई का बाल साहित्य' के अंतर्गत 'चींटी ने ऊँट को जनम दिया' कहानी संग्रह के कथ्यपक्ष के अंतर्गत कहानी की समीक्षा की गई है तथा पात्र सृष्टि को उजागर किया है। शिल्पपक्ष के अंतर्गत भाषाशैली को प्रस्तुत किया गया है। 'उपसंहार' के अंतर्गत उपयुक्त सातों अध्यायों का संक्षिप्त सार निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त अध्यायों के आरंभ में प्रस्तावना तथा अंत में निष्कर्ष को स्थान दिया गया है। 'साक्षात्कार' के अंतर्गत डॉ. पारूकान्त देसाई के साथ किए गए साक्षात्कार को प्रस्तुत किया गया है। 'ग्रंथानुक्रमणिका' के अंतर्गत मूलग्रंथ, सहायक ग्रंथ, पत्र-पत्रिकाएँ, शब्दकोश, वेबसाईट्स, समाचार पत्र आदि अध्ययन सामग्री की सूची अकारान्त रूप से प्रस्तुत की गई है। अन्त में इस महती बेला में मैं अपने आदरणीय गुरुवर प्रो. दिलीप मेहरा साहब का आभार प्रकट करना चाहूँगी, जिनकी बदौलत मेरा शोध कार्य सुचारू रूप से पूर्ण हुआ और साथ-साथ मेरी पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए प्रेरणा दी, इन्हीं के आशीर्वाद से मैं इस मुकाम तक पहुँच पाई। उनको शत-शत नमन। साथ ही हंस प्रकाशन दिल्ली के श्री स्वामी हरिंद्र तिवारी जी का भी आभार ज्ञापित करना चाहती हूँ जिन्होंने अत्यन्त अल्पावधि में सुंदर एवं सजीव पुस्तक का प्रकाशन कर आपके समक्ष प्रस्तुत किया। मैं अपनी सीमाओं से अच्छी तरह परिचित हूँ। मैंने पुस्तक लेखन में अधिक से अधिक जानकरी देने का प्रयास किया है, फिर भी कुछ त्रुटियों का रह जाना संभव है। इसके लिए मैं विशेष रूप से क्षमा प्रार्थी हूँ।
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