हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के स्वर्णकाल में 'अवंतिका' का प्रकाशन अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। सुधांशु जी उस समय अपनी राजनीतिक व्यस्तता से निकल चुके थे । बिहार प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षता तथा अखिल भारतीय कांग्रेस की कार्यसमिति से निवृत्ति पा चुके थे । लोकसभा तथा विधानसभाओं का निर्वाचन कार्यक्रम समाप्त हो चुका था । सामाजिक हलचल शांत हो चुका था। अब उनके लिए समय था साहित्यिक कार्यों के लिए उपयोग करना। इसी समय पटना के अजंता प्रेस के स्वत्वाधिकारी प्रकाशन व्यवसाय के परम अनुभवी साहित्यानुरागी स्व० पं० जयनाथ मिश्र जी ने एक साहित्यिक मासिक के प्रकाशन का प्रस्ताव उनके समक्ष उपस्थित किया । उस समय अजंता प्रेस से बच्चों के लिए प्रसिद्ध समाजवादी साहित्यिक स्व० रामवृक्ष बेनीपुरी जी के संपादन में 'चुन्नू मुन्नू' का प्रकाशन हो रहा था । सुधांशु जी के लिए यह प्रस्ताव रूचिकर लगा और उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर पत्रिका के नामकरण का उपक्रम प्रारंभ किया । अनेक नामों पर विचार किए गए और अंत में सुधांशुजी तथा जयनाथजी के अनन्य अनुरागी मित्र स्व० पं० जर्नादन प्रसाद झा 'द्विज' के परामर्श से 'अवंतिका' का नामकरण कार्य सम्पन्न हुआ । उसके बाद पत्रिका की पूरी रूपरेखा बना ली गई और अब विविध विषय विभूषित साहित्यिक मासिक के प्रकाशन का कार्य प्रारंभ हो गया । 'अवंतिका' ने जहाँ उस समय के हिंदी के अत्यन्त ख्यातिलब्ध रचनाकारों का सहयोग प्राप्त कर प्रसिद्धि पाई, वहीं उसने हिंदी के प्रस्फुटित होनेवाले साहित्यकारों को भी पूर्ण विकास का अवलम्ब दिया। यहाँ मैं एकबार की घटना का उल्लेख अपनी कथन-पुष्टि के लिए करना चाहता हूँ। हिंदी विद्यापीठ, देवघर की प्रबंध परिषद् की बैठक में इसके कुलाधिपति श्री अशोक वाजपेयी जी अपनी साहित्यिक जीवन-यात्रा पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जब वह किशोरावस्था में थे, तो उस समय उन्होंने अपनी एक कविता 'अवंतिका' में भेजी थी और वह उसी समय उसमें प्रकाशित भी हुई थी । इस प्रकार 'अवंतिका' जहाँ निराला तथा महादेवी की रचनाओं का प्रकाशक था वहीं वह उदीयमान बाल साहित्यानुरागी का भी गौरवपीठ था ।
'अवंतिका' अपने अग्रलेखों के लिए अपने काल में अत्यंत ख्यातिलब्ध था । उसके साहित्यिक एवं राजनीतिक विचारों की अपने समय में बड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा थी। कई-कई बार तो दूसरे लोगों ने उसके संपादकीय लेखों को पुनर्मुद्रित करा कर बाँटा भी था । आज जब महाविद्यालयों में पत्रकारिता का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है, तो 'अवतिका' जैसी पत्रकारिता की टिप्पणियों का अनुशीलन-अध्ययन आवश्यक प्रतीत होता है ।
आज हमारे लिए बड़ा सुखकर दिवस है कि स्व० श्रुतिदेव शास्त्री जी के कार्यकाल से बंद यह पांडुलिपि डॉ० जयकृष्ण मेहता जी के कार्यकाल में सूर्य का प्रकाश देख रही है । बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के संचालक डॉ० जयकृष्ण मेहता जी का मैं आभारी हूँ कि उन्होंने तत्परतापूर्वक इसके प्रकाशन में रूचि ली तथा इसका प्रकाशन संभव बनाया। मैं बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी के श्री विश्वनाथ प्रसाद का भी आभारी हूँ जिन्होंने दौड़-धूप कर हमारे कार्य को सरलतापूर्वक सम्पन्न कराया ।
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