बौध्द निबन्धावली (समाज एवं संस्कृति) - Essays on Buddhism
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बौध्द निबन्धावली (समाज एवं संस्कृति) - Essays on Buddhism

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Item Code: NZD667
Author: कृष्णनाथ (Krishna Nath)
Publisher: Vani Publications
Language: Hindi
Edition: 2009
ISBN: 9788181439338
Pages: 245
Cover: Paperback
Other Details: 9.0 inch X 6.0 inch
Weight 350 gm


 

पुस्तक परिचय

कृष्णनाथ बौध्द दर्शन और साहित्य के साथ-साथ उन इलाकों के भी प्रकाण्ड विद्वान हैं जहाँ बौध्द दर्शन विकसित हो कर फलता फूलता रहा है! इन इलाकों में धुर उत्तरी लदाख है तो बुध्द की जन्मभूमि लुमिनी भी! प्रस्तुत पुस्तक में कृष्णाथ ने इन्हीं इलाकों में बौध्द दर्शन, बौध्द साहित्य और जान-जीवन को जांचा परखा है! अगर उन्होनें हिमालय और उनमें बसने वाले लोगों की भाषा, धर्म , और संस्कृति की समस्याओं पर लिखा है तो दूसरी और लदाख, किन्नौर, अरुणाचल, साँची और नागार्जुनकोंडा जैसे स्थानों के बारे में भी! इसके साथ-साथ उन्होंने भवचक्र, निर्वाण, अहिंसा , पांच महाविद्या और बौद्ध साधना के भी विभिन्न पक्षों से पाठकों को परिचित कराया है! यही नहीं तिब्बत से व्यापार हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड का भी जायजा लिया है! इस प्रकार यह निबंधावली बौध्द धर्म, साहित्य, दर्शन और संस्कृति का ऐसा कोश बन गयी है जिसमें कृष्णाथ ने अपने अनुभवों और यात्राओं से संगृहीत मधु को संचित करके पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है! हमे विश्वास है की यह पुस्तक केवल उन्हीं लोगों को रुचिकर नहीं लगेगी जो बौध्द धर्म और दर्शन में दिलचस्पी रखते हैं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी एक ऐसा सन्दर्भ ग्रन्थ साबित होगी!

लेखक परिचय

विचारक, लेखक , साधक और एकाकी यायावर कृष्णाथ यायावर १९३४ में कशी में एक स्वंत्रता सेनानी परिवार में पैदा हुए! बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पूर्व और पश्चात वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े और जन संघर्षों में भाग ले कर जेल यात्रा की! हैदराबाद में रह कर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'कल्पना' तथा अंग्रेजी पत्रिका 'मैनकाइंड' का सम्पादन किया! जीविका के लिए काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य, जहाँ कालांतर में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने! 'आर्थिकी' नाम अर्थशास्त्रिया पत्रिका के प्रथम संपादक बने! शनै:शनै: उनका चिंतन अधिक सूक्ष्म एवं गहन विषयों में प्रवृत्त होने लगा! बौध्द दर्शन ने उन्हीं विशेष रूप से आकृष्ट किया! भारतीय और प्रवासी तिब्बती आचार्यों के साथ बैठ कर नागार्जुन के माध्यमिक दर्शन तथा वज्रयान का अध्ययन क्रम चलने लगा! इसकी के साथ चलता रहा उनका हिमालय यात्राओं का सिलसिला! अस्सी के दशन में विश्वप्रसिध्द विचारक जे. करिश्मुर्ति इन बौध्द विद्वानों में से एक थे! कुछ वर्षों से वे हर साल कुछ महीने बेंगलूर के पास स्थित कृष्णर्ति स्टडी सेंटर में एकांत प्रसास करते है! जब व दक्षिण भारत में नहीं रहते तब या तो हिमालय के किये इलाके में भ्रमण करते हैं या काशी के निकट सारनाथ में रहते है!. प्रकाशित ग्रंथों में राग विराग, किन्नर धर्मलोक, स्पीति में बारिश, पृथ्वी परिक्रमा बौद्ध निबंधावली, हिमालय यात्रा, कुमाऊं यात्रा किन्नौर यात्रा प्रमुखहै! सृजनशील लेखन के लिए उन्हीं लोहिया विशिष्ट सम्मान भी प्राप्त हो चुका है!

 












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