प्रस्तुति जगत के विस्तृत मंच पर लोक नाट्यों की अपनी ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये लोक नाट्य कभी स्वांग बनकर तो कभी लीलाएं बनकर तथा कभी ख्याल का रूप बनकर जन मानस के मनोरंजन का सशक्त माध्यम बनते रहे हैं। राजस्थान सदा से ही लोक-नाट्यों की श्रेणी में बहुत अमीर परम्परा का धारनी रहा है पर इसी पक्ष की एक सच्चाई यह भी है कि यह प्रस्तुति क्षेत्र में जितनी भी महारत रखता हो पर इन्हीं लोक नाट्य विधाओं में अब तक खोजपूर्ण सांस्कृतिक और साहित्यक अध्ययन तथा लेखन कार्य कम ही हो सका है। प्रथम बार किसी बड़ी संस्था (North Zone Cultural Centre) ने इस आवश्यकता के महत्व को समझा है और इस ओर अपनी रूचि दिखाई है। आज जितनी आवश्यकता नाट्य-विधाओं के प्रदर्शन की सी.डी., आडियो-वीडियो कैसट आदि प्रदर्शित सामग्री को सम्भालने की है उतनी ही आवश्यकता इन शैलियों पर लिखित सामग्री अथवा शोध के स्तर पर लिखित जानकारी इकट्ठी करने की भी है ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए लिखित-पाठ्य तथा प्रस्तुति पाठ्य दोनों ही संग्रहित किए जा सकें। आज तकनीक तथा बदलते परिवेश में मीडिया जगत की चकाचौंध से मुकाबले में बदल रही लोक-नाट्य शैलियों के मौलिक स्वरूप को जांचने व समझने का कोई तो सशक्त माध्यम हो जिसकी सहायता से सालों बाद भी इनके ऐतिहासिक परिपेक्ष को समझा जा सके।
उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की तरफ से इस महत्वपूर्ण कार्य की आवश्यकता को समझते हुए जो प्रयास आरम्भ किए गए हैं। वे निःसंदेह सराहनीय हैं।
अपने इस शोध कार्य में लेखिका ने ख्याल शैली की उत्पत्ति इसके अनेक रूपों, विशेषताओं, रंगमंच, वेशभूषा, संगीत, नृत्य, पात्र, प्रस्तुति स्थल, कलाकारों, मंच सामग्री, अभिनय प्रयोग, रोशनी, ख्याल शैली के दोहों, छन्दों, ठुमरी प्रयोग, तथा लोक कला मण्डल में प्रकाशित ख्यालों की सूची आदि को शामिल किया है इसके इलावा इस शोध कार्य में इंटरनैट, कलाकारों तथा गायकों वादकों से निजी मुलाकातें पुस्तक अध्ययन, आडियो-वीडियो कैसेटों की भी सहायता ली है।
इस खोज कार्य के लिए मैं उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक श्री आर.टी. जिंदल जी का विशेष आभार प्रगट करती हूं। जिनके कलात्मक बोध की दूरदर्शिता और इस तरह के शोध-कार्य की आवश्यकता को समझने के गुण ने ऐसे महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया है। इस प्रबन्ध में उनके मार्गदर्शन, प्रेरणा और निर्देशन का यह परिणाम है कि एक लोक-नाट्य विधा को लिखित पाठ्य मिल रहा है। यदि इस शोध कार्य से किसी एक नाट्य शैली के स्वरूप, परम्परा तथा प्रवृतियों को समझने में कभी भी किसी को सहायता मिल सकी तो मैं अपने इस कार्य को सार्थक हुआ समझेंगी।
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