प्रस्तावना
'गण' समूह की इकाई का बोधक है, ऐसी इकाई जो सुपरिभाषित हो और जिसका चरिगणन हो सके। वेद और पुराण में गण शब्द आया है। गण 'संघ' का पर्याय है और गणों का समूह भी। देवताओं में विघ्न विनाशक गणेश जी 'गणपति' के रूप में विख्यात हैं। आधुनिक गणराज्य या 'रिपब्लिक' का आशय सरकार की ऐसी व्यवस्था से है जो शासकों की व्यक्तिगत संपदा न हो। वहाँ जनता के प्रतिनिधियों द्वारा स्वीकृत संविधान के अनुरूप सरकार चलाई जाती है। गणराज्य की व्यवस्था प्राचीन भारत में प्रचलित थी। पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' और व्यास के 'महाभारत' में अनेक गणों और गणों के संघों का वर्णन मिलता है। गणसभा और मतदान का भी विवरण मिलता है। लिच्छवियों का गणराज्य जिसकी राजधानी वैशाली थी कदाचित विश्व का सबसे प्राचीन गणराज्य है जो लगभग ढाई हजार वर्ष पहले प्रजातांत्रिक व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ समितियाँ थीं जो जनता के लिए नीति-निर्माण करती थीं। छठी सदी ईसा पूर्व यहाँ का शासक जन प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता था। चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रा-वृत्तांत में इसका वर्णन मिलता है। बौद्ध काल में षोडश महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। बुद्ध शाक्य गण में जन्मे थे। वज्जियों की वैशाली भी एक प्रमुख गणराज्य था और मगध की ही तरह महत्वपूर्ण था। उपर्युक्त इतिहास भारत का गौरवशाली अतीत है। कालांतर में मुगल और अंग्रेज आक्रांताओं ने भारत पर आधिपत्य स्थापित किया। लंबे संग्राम के बाद अंग्रेजों ने 15 अगस्त 1947 को भारत देश को भारतवासियों को सौंपा। आज का भारतीय गणतंत्र आधिकारिक रूप से 26 जनवरी 1950 को आरंभ होता है जब भारत की संसद ने एक संविधान को अंगीकार किया जिसे भारत सरकार अधिनियम 1935 की जगह लागू किया गया। विश्व के विशालतम प्रजातांत्रिक देश की महत्वाकांक्षाओं को आकार देने के लिए बना यह संविधान सामाजिक विषमताओं और असमानताओं को दूर करने और नागरिक जीवन के विधिसम्मत संचालन की व्यवस्था करता है। उल्लेखनीय है कि देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता और बहुलता उस समय भी मौजद थी जब संविधान बन रहा था। परंतु उस दौरान सब के बीच देश की एकता के असंदिग्ध सूत्र भी तीव्रता के साथ मुखर रूप में उपस्थित थे. उनके प्रति अकाट्य प्रतिवद्धता थी और उनका सबके द्वारा आदर किया जाता था। तब से भारतीय गणतंत्र आंतरिक और बाहा चनौतियों का सामना करते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहा है। फिर भी राष्ट्रीय जीवन को उन्नति के प्रशस्त मार्ग पर ले चलने के लिए निरंतर आत्मावलोकन आवश्यक है। आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग है। ज्ञान का विस्फोट हो रहा। इस युग की मान्यता है कि ज्ञान अपने आप में 'सेकलर' (यानी निर्दोष!) होता है और उसका किसी तरह के मानवीय मूल्य से कुछ लेना-देना नहीं होता है। वह सब कुछ से परे अर्थात निरपेक्ष-निष्पक्ष होता है। आज विज्ञान की सारखी के साथ (सफेद कोट से सजे) विज्ञापनों की धूम मच रही है। कभी ज्ञान को शक्ति का महान स्रोत घोषित किया गया (नोलेज इज पावर!) वह छवि आज भी विद्यमान है। विद्या के परिसरों में भी मानविकी (ह्यूमेनिटीज) विज्ञान (साइंस) और प्रौद्योगिकी (टेक्नोलोजी) के आगे बेहद फीकी पड़ रही है। आज विज्ञान से बढ़त पाकर कुछ देश शेष विश्व पर नियंत्रण करने में लगे हुए हैं। शायद इसी सोच के साथ परमाणु बम जैसे संहारक अस्त्र-शस्त्र भी बनते गए। आज भी संहार की विभीषिका का अनुभव करने के बाद भी नए-नए ज्यादा-से-ज्यादा संहार शक्तिवाले अस्त्र-शस्त्र बनाने की होड़ मची हुई है। । अब छोटे-बड़े सभी देश अपने बजट में जन-कल्याण की जगह युद्धास्त्रों के मद पर सबसे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। आज दुनिया में दो घोषित युद्ध लंबे समय से चल रहे हैं जिनके आयोजन में विकसित दुनिया के बड़े-बड़े देश शामिल हैं। इन युद्धों में जीवन और संपदा की हो रही भीषण तबाही का भयानक मंजर सभी देख रहे हैं। यह तब हो रहा है जब दुनिया विश्वयुद्ध में बड़े पैमाने हो चुके संहार की साक्षी रही है। इस तरह के घटना चक्र के पीछे की ज्ञान-दृष्टि बेमानी सिद्ध हो रही है। किंतु प्रबल उपभोग वृत्ति के आकर्षण और बाजार पर अधिकाधिक प्रभुत्व स्थापित करने के तीव्र दुराग्रह के बीच हमें कुछ भी दिख नहीं रहा है। आज पृथ्वी समेत पूरी प्रकृति और सारी मनुष्यता के भविष्य पर भीषण खतरा मंडराता दिख रहा है। हमारी वैज्ञानिक ज्ञान-दृष्टि की एक सीमा यह भी उभर रही है कि हम इस स्थिति में निरुपाय और विवश बने रहने के लिए अभिशप्त हो चले हैं। इस दृष्टि से अभिभूत हम सब प्रगति, विकास और उन्नति के प्रलोभन से ग्रस्त हो कर घोर अनैतिकता और अमानवीयता को नजर अंदाज करते जा रहे हैं। सूचना और प्रौद्योगिकी के अतिरेक वाले आज के विस्मय भरे दौर में ज्ञान की भूमिका अनधिकृत रूप से वर्चस्व, शोषण और दूसरों को पराभूत करनेवाली शक्ति
लेखक परिचय
लेखक प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र एक मनोविद, विचारक और संस्कृति के अध्येता हैं। पाँच दशकों के शैक्षिक एवं अकादमिक जीवन में गोरखपुर, इलाहाबाद, भोपाल तथा दिल्ली विश्वविद्यालयों में प्राध्यापन के बाद महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति (2014-19) पद से सेवानिवृत्त हुए। समाज, शिक्षा, संस्कृति, भाषा और साहित्य से जुड़े प्रश्नों पर पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करते हैं। अपने अकादमिक-सांस्कृतिक यात्रा क्रम में उन्होंने अमेरिका, रूस, चीन, जर्मनी, इंग्लैंड,, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया आदि देशों की यात्राएँ कीं तथा अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में फेलो भी रहे हैं। उनकी कुछ प्रकाशित कृतियाँ हैं : होने और न होने का सच, हिंदी भाषा और समाज, हिरना समझी बूझी बं चराना, भारत में शिक्षा चुनौतियाँ और अपेक्षाएँ, प्रकाश की आकांक्षा, मंगल प्रभात की परस्तीक्षा में, सांस्कृतिक चेतना के उन्नायक, साहित्य के परिसर से, सभ्यता विमर्श का समय। उन्होंने विद्यानिवास मिश्र रचना संचयन, शमशेर बहादुर सिंह संचयिता तथा गांधी संचयिता तथा गांधी संचयन का संपादन भी किया है। श्री मिश्र को अनेक सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं।
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