प्रस्तावना
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियासी।" (वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड-47.32) अर्थ माँ और स्वर्ग से भी बड़ा है। यह वाक्य स्वदेशी भावना का सार है। विदर नीति में कहा गया है कि "अपना देश अपनी संस्कृति, और अपने लोगों की सेवा सर्वोच्च धर्म है।" स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत बंगाल के विभाजन के ब्रिटिश फैसले के जवाब में हुई, जिसकी आधिकारिक घोषणा दिसंबर 1903 में की गई थी। फूट डालो और राज करो की रणनीति, जबकि आधिकारिक कारण प्रशासनिक दक्षता था, वास्तविक मकसद भारतीय राष्ट्रवाद के केंद्र बंगाल को कमजोर करने की ब्रिटिश इच्छा माना जाता था। विभाजन का उद्देश्य बंगालियों को भाषा और धर्म के आधार पर विभाजित करना था। विरोध के बावजूद सरकार ने 19 जुलाई, 1905 को विभाजन की घोषणा कर दी, जिसके कारण बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। (प्रांत 16 अक्टूबर 1905 को अस्तित्व में आया) बहिष्कार प्रस्ताव यह 7 अगस्त, 1905 को पारित किया गया था, जो स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक घोषणा थी। 16 अक्टूबर, 1905 को बंगाल का विभाजन हुआ। इस दिन भारतीयों ने शोक मनाया, उपवास रखा, गंगा में स्नान किया, वंदे मातरम गाया (जो आंदोलन का थीम गीत बन गया) और एकता के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे के हाथ पर पट्टी बाँधी। बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित है। यह आंदोलन बंगाल से आगे पूना, बंबई, पंजाब, दिल्ली और मद्रास तक फैल गया। कांग्रेस ने 1905 ई. में बनारस में अपने अधिवेशन (जी.के. गोखले) में विभाजन की निंदा की और स्वदेशी आंदोलन को मंजूरी दी। कलकत्ता 1906) में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन (दादाभाई नौरोजी) में यह घोषित किया गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्य 'स्वशासन' या स्वराज है। भारतीयों में गर्व और आत्मविश्वास बहाल हुआ। पहली बार बड़ी संख्या में छात्रों और महिलाओं ने भाग लिया। अगस्त 1906 में शिक्षा को राष्ट्रवादी तर्ज पर उन्मुख करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की गई थी। सतीशचंद्र मुखर्जी ने 1895 ई. में भागवत चतुस्पति की स्थापना करके राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का नेतृत्व किया। उनका समाचार पत्र 'डॉन' (1897) और उनकी डॉन सोसाइटी की स्थापना 1902 ई. में हुई थी। बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना अरविंदो घोष को प्राचार्य बनाकर की गई थी और इसके पहले अध्यक्ष रासबिहारी घोष थे। स्वदेशी आंदोलन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की।
लेखक परिचय
तिवारी टोला, भभुआ, कैमूर (बिहार) में जन्मे, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षित आचार्य विवेकानंद तिवारी धर्म-दर्शन, विज्ञान, न्याय, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं इतिहास विषयों के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मर्मज्ञ विद्वान हैं। आचार्य तिवारी एक शिक्षाविद् और सुप्रसिद्ध लेखक के रूप में देश-देशांतर में प्रतिष्ठित हैं। आचार्य तिवारी की 200 से ज्यादा पुस्तकें और 300 से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। आप सर्व भूत हित चिंतन में निरंतर रत तथा सनातन धर्म की बोध-परंपरा के संवाहक, गो-ग्राम संस्कृति के श्रेष्ठ संरक्षक एवं व्याख्याता, गो-गंगा-गायत्री-गीता के तत्त्ववेत्ता एवं भारत-भारतीयता के अनन्य आराधक, अनुशासनप्रिय, सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित, सत्यान्वेषी, गुणग्राही, सारस्वत कार्य के प्रति समर्पित जिनके ऊर्जा का प्रत्येक कण एवं श्वास का प्रत्येक क्षण राष्ट्र, सनातन धर्म के उत्थान एवं परहित के लिए समर्पित हैं। आपकी लिखित कई पुस्तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एवं प्रशंसित हैं जिसमें 'गो समग्र' एवं 'गंगा समग्र' विशेष उल्लेखनीय हैं। अनेक संस्थाओं से डॉ. तिवारी को प्राप्त सम्मानों में 'भारत भारती सम्मान', 'देवी सरस्वती सम्मान', 'मालवीय प्रज्ञा सम्मान', 'राष्ट्र गौरव सम्मान' एवं 'महाशक्ति सम्मान' विशेष उल्लेखनीय है। विशेष : गौमाता के विविध पक्षों पर एक साथ 61 पुस्तकें प्रकाशित कर इन्होंने विश्व रिकॉर्ड कायम किया है। संप्रति : आप अंबेडकर पीठ (हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला) के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
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