परिचय करने अथवा घनिष्ठता बढ़ाने के मामले में मैं बेहद संकोची रहा हूँ। आप मुझे इस मामले में अभागा अथवा मनहूस भी कह सकते हैं। अक्सर मैं कवि गोष्ठियों में नये-नये चेहरे देखता हूँ, किन्तु जान-पहचान बनाने का साहस नहीं जुटा पाता । सोचता हूँ बात कहाँ से आरम्भ करूँ ?... और बात धरी की धरी रह जाती है। जब तक वह व्यक्ति बात नहीं करता तब तक मैं संकोच से दबा रहता हूँ। कुछ बोल नहीं पाता । इस तरह चेहरे से परिचित होते हुए भी वैयक्तिक घनिष्ठता नहीं बढ़ पाती । इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे ?
एक कवि ने तो मुझे असामाजिक ही कह दिया था। परोक्ष में कही गयी यह बात मेरे कानों तक आई थी। मुझ पर आरोप यह लगाया गया कि मैं एक अहंकारी व्यक्ति हूँ और अपनी मेधा के सामने और किसी को कुछ नहीं समझता। बात सरासर गलत थी । इस आरोप ने मुझे घायल कर दिया था। मैंने उनसे लपक कर रिश्ता बनाया । आज हम दोनों घनिष्ठ मित्र हैं। मैंने उनसे अपने मन की बात बताई तो उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर ली ।
कविवर श्रीकांत तिवारी 'सदेह' से भी मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं है। साल अथवा डेढ़ साल से हम दोनों का साथ है। एक कविगोष्ठी में ही उनसे मुलाकात हुई थी । वे काव्यपाठ कर रहे थे। मैं सभाध्यक्ष के आसन पर विराजमान था। उनके काव्य की ओजस्विता की तरफ मेरा ध्यान गया था। मैं आकृष्ट हुआ। इस तरह हम दोनों एक-दूसरे के निकट आ गए। यह तो बाद में पता चला कि हम दोनों आपस में रिश्तेदार भी हैं। मेरे एक भतीजे का व्याह सदेह जी के दामाद भाइयों के परिवार में है। यह जानकर मुझे खुशी हुई। जब सदेह जी ने अपने गंगा नामक प्रबन्ध काव्य की भूमिका लिखने का आग्रह किया तो मैं उनके इस आग्रह को टालने का साहस नहीं जुटा पाया। लोकार्पण के बाद पुस्तक आपके हाथ में जाएगी । मैंने अपने नजरिए से इस पुस्तक का अवलोकन किया है। सोचता हूँ यह पुस्तक आप भी अवश्य पसन्द करेंगे ।
कवि ने देवापगा गंगा पर, अथवा यो कहिए कि गंगावतरण पर यह प्रबन्ध काव्य लिखकर संसार के सामने एक आदर्श उपस्थित किया है। मम्मट, कैयट रुद्रट, भामह, राजशेखर और दण्डी ने प्रबंध काव्य के लिए धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरप्रशान्त और धीरललित नायकों के चुनाव पर बल दिया है। नारियों को नायक बनाया जाए कि नहीं, इस तथ्य पर मौन रह गए हैं। मैं सोचता हूँ कि कवि श्रीकान्त तिवारी 'सदेह' ने इस दिशा में साहसिक कदम उठाया है। इसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम होगी। गंगा की पवित्रता के बारे में जितने उदाहरण हमारे धर्मशास्त्रों में मिलते हैं, संभवतः उतने अन्य नदियों के नहीं मिलते। यों तो कर्मनाशा और काकपेया दो नदियों को छोड़कर बाकी सभी नदियों का जल पवित्र माना जाता है। लेकिन गंगा का क्या कहना ? उसकी पवित्रता पर ऊँगली नहीं उठाई जा सकती । बाकी नदियों में स्नान करने को ही महत्त्व दिया गया है, किन्तु गंगा के बारे में स्कन्दपुराण 31/7 कहता है कि जो मनुष्य सौ बार भी गंगा के नाम का जप करता है वह अपने जीवन के सभी पापों को मिटाकर अंततः विष्णुलोक में निवास करता है -
गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ।।
कहा गया है कि पूजा में बासी पुष्प वर्जित है। बासी जल भी वर्जित है। लेकिन न तो बासी तुलसीदल वर्जित है, न गंगा का जल । किंवदन्ती है कि एक यक्ष ने भगवान् शंकर की अर्चना बासी पुष्पों से की। फलस्वरूप उसे भगवान् शंकर के कोप से प्रिया का विछोह हो गया । सम्भवतः श्री कवि कुलगुरु कालिदास ने मेघ को दूत बनाकर इसी विरही यक्ष की वेदना को प्रस्तुत किया है। स्कन्दपुराण 2/1 यह भी कहता है कि माधव (वैसाख) के समान कोई दूसरा महीना नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है ।
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