अंग्रेजी में एक शब्द है "स्टॉकहोम सिंड्रोम "; हिन्दी में इसे "स्टॉकहोम लक्षण" कह सकते हैं। विकिपीडिया के अनुसार "स्टॉकहोम सिंड्रोम" एक ऐसी स्थिति होती है जब अगवा होने वाले व्यक्ति को अपने अपहर्ता के साथ सहानुभूति हो जाती है। ये कैद के दौरान अस्तित्व के लिये रणनीति का एक रूप माना जा सकता है। "स्टॉकहोम सिंड्रोम" जितना अपहृत व्यक्ति पर लागू होता है उतना ही प्रताड़ित समाज पर भी लागू होता है। लगभग 1000 वर्षों की गुलामी के फलस्वरूप हिन्दू समाज में स्टॉकहोम लक्षण का आ जाना स्वाभाविक ही था। हिन्दुओं में शक्ति विहीनता, लाचारी और विवशता का भाव आ जाना भी स्वाभाविक ही था। एक और भाव जो बहुत से हिन्दुओं के अंतर्मन में उत्पन्न हुआ वह था अपनी प्राचीन धर्म व संस्कृति के प्रति संदेह का भाव; यह भाव कि हम आततायियों का मुकाबला नहीं कर पाए कहीं इसका कारण हमारे अपने ही धर्म की हीनता तो नहीं? धर्म के आधार पर देश के बँटवारे के बाद होना यह चाहिए था कि, बचे हुए हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के खोए हुए आत्मविश्वास को पुनर्जीवित व अस्मिता को पुनः स्थापित करने का अभियान चलाया जाता; परन्तु हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में, हिन्दू धर्म या सनातन के वैभवशाली अतीत के विषय में बात करने को सांप्रदायिकता की संज्ञा दे दी गई। जवाहरलाल नेहरू ने तो इसे हिन्दू पुनः प्रवर्तनवाद (Hindu Revivalism) कह कर नकार दिया मानो सनातन तथा हिन्दू धर्म की हज़ारों वर्ष पुरातन परम्परा का पुनर्जागरण अवांछनीय था। महात्मा गाँधी तथा उनके बाद कांग्रेस, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू द्वारा बहुसंख्यकों की भावनाओं की अनदेखी करके अल्पसंख्यक समूहों का निःसंकोच तुष्टिकरण किया गया। इसके बावजूद हिन्दू बार-बार उन्हें ही सत्ता सौंपते रहे। मानो हिन्दू समाज गहरी निद्रा में मग्न था। यहाँ तक कि हिन्दूवादी महापुरुषों, जैसे वीर सावरकर के शब्द भी उनकी निद्रा भंग ना कर पाए। हिन्दुओं ने अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा इत्यादि को विस्मृत कर दिया। इससे अधिक आश्चर्यजनक बात कुछ नहीं हो सकती। विश्व में ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलेगा। प्रश्न उठता है कि हिन्दुओं के ऐसे व्यवहार के क्या कारण थे। इसके कुछ कारण निम्न हो सकते हैं:
1. सदियों की गुलामी के फलस्वरूप आत्मसम्मान व आत्मविश्वास की क्षति।
2. अधिकतर हिन्दुओं का अपने धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता के विषय में सही जानकारी तथा समझ का अभाव।
3. निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा सनातन व हिन्दू धर्म के विषय में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, हिन्दू धर्म को कमतर करके दिखाने का प्रयास।
उपरोक्त कथन के समर्थन में निम्न उदाहरण ही पर्याप्त होंगे:
1. हिन्दुओं के अनगिनत देवी-देवता होने का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता है, अन्य धर्मानुयायियों द्वारा ही नहीं, बहुत
से हिन्दुओं द्वारा भी। जैसा कि इस पुस्तक में व्याख्या की गई हैं, वास्तव में अनेकानेक देवी-देवता होना हिन्दू धर्म की कमज़ोरी नहीं अपितु हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। यह हिन्दुओं को प्राप्त अपनी आस्था के अनुसार, ईश्वर के स्वरूप की कल्पना करने की तथा पूजने की स्वतंत्रता का द्योतक है। इस स्वतंत्रता के फलस्वरूप, हज़ारो वर्षों में देवी-देवताओं के अनगिनत रूपों का हो जाना स्वाभाविक है।
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