भारतीय तन्त्रपरम्परा अत्यन्त प्राचीन, गूढ़ एवं बहुआयामी साधनात्मक परम्परा है। यह केवल कर्मकाण्ड या रहस्यमय प्रयोगों तक सीमित न होकर, मानव जीवन के सम्पूर्ण विकास-शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक का समन्वित विज्ञान है। इसी तन्त्रपरम्परा के शाक्त शैव प्रवाह में गौरीकाञ्चलिका तन्त्र का स्थान विशेष महत्व रखता है।
यह ग्रंथ देवी-तत्व, शक्ति-साधना तथा साधक के आन्तरिक उत्कर्ष से सम्बन्धित गूढ़ रहस्यों को सरल किन्तु प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है।
'गौरी' शब्द स्वयं में ही शुद्धता, सौम्यता और परम शक्ति का बोध कराता है। यहाँ 'गौरी' केवल पार्वती या किसी देवी-स्वरूप तक सीमित नहीं है, अपितु वह आदि-शक्ति का वह रूप है जो साधक के भीतर स्थित अज्ञान-अन्धकार को भेदकर चेतना का प्रकाश प्रकट करती है।' काञ्चलिका' शब्द संकेत करता है- सूक्ष्म आवरण, रहस्यमय परत अथवा वह कड़ी जो बाह्य साधना को अन्तःसाधना से जोड़ती है। इस प्रकार गौरीकाञ्चलिका तन्त्र साधक को बाह्य अनुष्ठान से आन्तरिक अनुभूति की ओर ले जाने वाला ग्रंथ है।
गौरीकाञ्चलिकातन्त्र यद्यपि शिव-शिवा के संवाद रूप में प्रस्तुत है, तथापि यह साधारण संवाद-ग्रंथों से सर्वथा भिन्न और विशिष्ट है। यह ग्रंथ केवल दार्शनिक तत्त्वों का निरूपण नहीं करता, अपितु लोककल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर मानव जीवन की व्यावहारिक समस्याओं-जैसे रोग, शोक, भय तथा मृत्यु-से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इस तन्त्र में भगवती श्रीभवानी जी करुणावश होकर भगवान् शंकर से प्रश्न करती हैं कि किस प्रकार सामान्य मनुष्य अपने जीवन को निरोग, दीर्घ और सुखमय बना सकता है। उनके इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् शंकर अनेक ऐसे रहस्यमय किन्तु उपयोगी उपायों का वर्णन करते हैं, जो मनुष्य के लिए अत्यन्त हितकारी सिद्ध हो सकते हैं।
शिवजी द्वारा बताए गए उपायों में विशेष रूप से ज्वर, शूल, वात, पित्त, कफ तथा अन्य नाना प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों के शमन हेतु विविध कल्पों का वर्णन है। ये कल्प केवल औषधीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि तांत्रिक और काल-सापेक्ष नियमों से भी युक्त हैं। ग्रंथ में यह स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि कन्द, मूल, फल, फूल, पत्र तथा विविध वनस्पतियों में स्वाभाविक रूप से अद्भुत शक्तियाँ निहित रहती हैं, तथापि यदि उन्हें तिथि, नक्षत्र, वार, योग, करण और ऋतु के नियमानुसार ग्रहण किया जाए, तो उनकी शक्ति अनेक गुना बढ़ जाती है।
उदाहरणार्थ, शरद और हेमन्त ऋतु में वृक्षों की छाल तथा जड़ का संग्रह करना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय उनमें औषधीय तत्त्व अपने पूर्ण उत्कर्ष पर होते हैं। शिशिर ऋतु में फलों का, बसन्त ऋतु में पुष्पों और पत्तियों का तथा ग्रीष्म में बीजों का संग्रह विशेष फलदायक बताया गया है। इन सूक्ष्म नियमों का पालन करके तैयार किए गए प्रयोग न केवल रोगों से रक्षा करते हैं, बल्कि शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ और सशक्त बनाए रखते हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ शरीर-रक्षण और आरोग्य की दृष्टि से एक अमूल्य निधि के समान है।
गौरीकाञ्चलिकातन्त्र में केवल रोग निवारण तक ही विषय सीमित नहीं है, अपितु इसमें आयुष्य-ज्ञान से संबंधित अनेक निमित्तों का भी वर्णन मिलता है। ऐसे अनेक संकेत और प्रयोग बताए गए हैं, जिनके माध्यम से साधक अपने जीवनकाल का अनुमान कर सकता है। यह ज्ञान भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य को सजग और सतर्क बनाने के उद्देश्य से दिया गया है, जिससे वह समय रहते धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थों का संतुलित साधन कर सके।
ग्रंथ में आगे ऐसे भी अनेक कल्प वर्णित हैं, जिनका विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से मनुष्य वृद्धावस्था की दुर्बलताओं और मृत्यु के भय पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि तन्त्र का उद्देश्य मृत्यु से पलायन नहीं, बल्कि मृत्यु के भय से मुक्ति है। जब साधक शरीर, मन और प्राण-तीनों के रहस्यों को समझ लेता है, तब वह जीवन को पूर्णता से जीने में सक्षम हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, इस तन्त्र में युवा स्त्री-पुरुषों के लिए भी अनेक उपयोगी विषयों का समावेश किया गया है। शरीर की कान्ति, सौन्दर्य और आकर्षण को बनाए रखने हेतु उबटन, लेप और अभ्यंग के विविध उपाय बताए गए हैं। शरीर को सुडौल, सन्तुलित और रमणीय बनाने के लिए जो उपाय यहाँ वर्णित हैं, वे प्राकृतिक और सुरक्षित हैं। इनका उद्देश्य केवल बाह्य सौन्दर्य नहीं, बल्कि आन्तरिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास की वृद्धि भी है।
वशीकरण सम्बन्धी प्रयोगों का वर्णन भी इस ग्रंथ में मिलता है, किन्तु उन्हें अत्यन्त संयम और मर्यादा के साथ प्रस्तुत किया गया है। यहाँ वशीकरण का अर्थ किसी की स्वतंत्र इज्छा का हनन नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और सामंजस्य की स्थापना से है। इसी प्रकार स्मरण-शक्ति की वृद्धि, वाणी की मधुरता और स्वर की उत्कृष्टता के लिए भी अनेक प्रयोग बताए गए हैं, जो विद्यार्थियों, वक्ताओं और साधकों के लिए विशेष लाभकारी हैं।
गौरीकाञ्चलिकातन्त्र में अञ्जन-प्रयोगों का भी विस्तृत वर्णन है, जिनसे दृष्टि-शक्ति, तेजस्विता और आकर्षण में वृद्धि होती है। साथ ही लक्ष्मी-वृद्धि के उपाय भी बताए गए हैं, जिनका उद्देश्य केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि समृद्धि के साथ धर्मपूर्ण जीवन की स्थापना है। यह स्पष्ट किया गया है कि यदि धन का उपयोग लोकहित और सत्कर्मों में किया जाए, तभी वह साधक के लिए कल्याणकारी होता है।
इस सम्पूर्ण ग्रंथ की भाषा, शैली और विषयवस्तु इस प्रकार विन्यस्त है कि सर्वसाधारण जन भी इसे समझ सकें और अपनी क्षमता के अनुसार इसमें वर्णित उपायों का लाभ उठा सकें। यह तन्त्र किसी एक वर्ग या संप्रदाय के लिए सीमित नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण हेतु रचित प्रतीत होता है। लोकोपकार की यही भावना इसे अन्य तांत्रिक ग्रंथों से विशिष्ट बनाती है।
अतः कहा जा सकता है कि गौरीकाञ्चलिकातन्त्र न केवल तांत्रिक साधना का ग्रंथ है, बल्कि यह एक समग्र जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है-जहाँ स्वास्थ्य, सौन्दर्य, आयुष्य, ज्ञान और आत्मबल-सभी का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि यह ग्रंथ आज भी साधकों और जिज्ञासुओं के लिए समान रूप से उपयोगी और प्रासंगिक है।
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