माँ भगवती की असीम कृपा एवं पूज्य गुरुओं के आशीर्वाद के फलस्वरूप यह अल्प कार्य पूर्ण करने में सफल हो सकी हूं, जो परम कृतज्ञता एवं बद्धा-भक्ति सहित 'माँ' के चरणों में समर्पित है।
भारतीय संगीत का भव्य भवन सुर और ताल पर आधारित होते हुए भी ताल शास्त्र, उसके बाद, उनका इतिहास, वाद्यों के आविष्कार का समय, उनकी वादन विधियों एवं शैलियों, उनके वादक तया ताल सम्बन्धी अन्य अनेक बातों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती। उसका मुख्य कारण यह है कि मध्य युग में हमारा ताल कला वैभव अशिक्षित कलाकारों में मौखिक रूप से तथा वंश परम्परागत चलता रहा। अतः इस विषय से सम्बन्धित आधारभूत पुस्तकें बहुत ही कम लिखी गयी। यही कारण है कि ताल सम्बन्धी अनेक विषयों पर विद्वानों में मतभेद है तथा अनेक निराधार मान्यतायें प्रचलित हो गयी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार के अनेक जटिल प्रश्नों के समाधान ढूढ़ निकालने का निष्ठापूर्वक प्रयास किया गया है। इसमें मुझे कहाँ तक सफलता मिली है, इसका निर्णय आप पर छोड़ती है।
भारत जैसे इस विशाल देश में न जाने कितने कलाकार बिखरे पड़े हैं। उनमें से कुछ महान् विभूतियों के नाम से तो संगीत जगत् परिचित है, किन्तु अनेक ऐसे विद्वान संगीतकार हो गये है या है जिनके विषय में लोगों को विशेष जानकारी नहीं है या उनका यश एक छोटी सी परिधि में ही सिमट कर रह गया है। ऐसे कलाकरों के विषय में जानकारी एकत्र करके प्रकाश में लाना एवं ताल सम्बन्धी अनेक विवाद ग्रस्त विषयों का सर्वमान्य हल निकालना इस योजना का लक्ष्य था।
इस शोध कार्य के निमित्त विभिन्न भाषाओं के सभी उपलब्ध ग्रन्थों का यथा सम्भव अध्ययन करके उसका सारांश निकालने इस शोध कार्य के निमित्त विभिन्न भाषाओं के सभी उपलब्ध ग्रन्थों का यथा सम्भव अध्ययन करके उसका सारांश निकालने का प्रयल किया गया है। संगीत मुख्यतः एक क्रियात्मक विषय है। अतः इनसे संबंधित देश के विभिन्न अंचलों के सैकड़ों कलाकारों एवं महारथियों का साक्षात्कार लेकर अधिकाधिक विषय के मूल में जाने का प्रयास किया गया है जिससे ठोस और अधिकाधिक जानकारी प्रकाश में आ सके।
प्रस्तुत शोध के स्रोत के सम्बन्ध में नौ वर्ष पूर्व की एक संध्या की पटना बरबस याद आ जाती है। जब सुप्रसिद्ध गायनाचार्य प्रो० वी० आर० आठवले ने मुझसे प्रश्न किया कि सुप्रसिद्ध तबला वादक कामुराव मंगेश्कर के गुरु कौन थे? मैं उत्तर न दे सकी। फिर एक विचार आया कि इस विशाल देश में ऐसे ही कितने आजीवन संगीत साधक काल के गर्त में विलीन होते गये और लोग उनको विस्मृत करते गये। इस संवेदना ने मुझे ऐसा झकझोर दिया कि मैंने अपने शोध का विषय ही इसी से सम्बन्धित चुन लिया और उस प्रश्नकर्ता से ही मैने मार्ग निर्देशन का आग्रह किया, जिसे स्वीकार कर प्रो० आठवले ने मुझे अनुग्रहीत किया।
कार्य के आरम्भ के समय मेरा कार्य क्षेत्र मुंबई तक ही सीमित था। फिर महाराष्ट्र प्रान्त तक विस्तृत हुआ और अन्त में राज्य की परिधि को लांघ कर पूरे देश तक फैल गया। नौ वर्ष पूर्व वह चिन्गारी जो प्रश्न बन कर दिल में चुभी थी, आज लम्बे परिश्रम के पश्चात् आपके सामने पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है।
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