भूमिका
सप्त सिन्धु क्षेत्र की कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिन्होंने भारतवर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण निभाई है। इनमें सबसे पहले सिन्धु-सरस्वती की सभ्यता के विकास की चर्चा की जा सकती है। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि यह सभ्यता आधुनिक युग के पैमाने से भी विकसित सभ्यता थी और यह पश्चिमोत्तर भारत तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसका विस्तार बहुत व्यापक था। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं मूल्यों का आधार सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में ही मिलता है। यह भारतीय इतिहास का प्रारम्भिक वैदिक काल कहा जा सकता है। इसके उपरान्त उन्नत वैदिक काल (Mature Vedic period) आता है। इसी बीच वेदों की रचना हुई। यह सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का अगला चरण है। गंभीर चिन्तन का युग। इस युग के दशराज्ञ युद्ध से इस काल के इतिहास, विभिन्न जनों (वेद में जिसे जन कहा गया है पश्चिमी इतिहासकार उसे tribe कहते हैं) के परस्पर संबंधों, विचारधाराओं का पता चलता है। इस युग के चिन्तन ने भारतवर्ष को ही नहीं बल्कि पूरे जम्बूद्वीप को आच्छादित किया। यहां भारतीय इतिहास के दो प्रसंगों की चर्चा करना प्रासांगिक होगा। प्रथम अयोध्या में श्री रामचन्द्र जी का शासन और उनका इतिहास। श्री राम चन्द्र जी के परिवार के अनेक सदस्यों का संबंध सप्त सिन्धु/पंजाब से माना जाता है। कैकेयी गान्धार से ताल्लुक रखती थीं। माता कौशल्या पटियाला के नजदीक घड़ाम गांव की रहने वाली थीं। दशरथ के पिता महाराजा अज्ज का रोपड़ जिला के खरड़ में आने का जिक्र मिलता है। वहां उनके नाम से अज्ज सरोवर आज भी विद्यमान हैं। अमृतसर के समीप ही रामतीर्थ/वाल्मीकि तीर्थ है जहां सीता जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए थे। यहीं लव और कुश का लालन पालन हुआ था। ऐसी लोक कथा भी है कि पंजाब के दो ऐतिहासिक नगर लाहौर और कसूर लव और कुश ने स्थापित किए थे। द्वितीय, कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध सप्त सिन्धु क्षेत्र की ऐसी घटना है जिसने पूरे हिन्दुस्थान को पश्चिमोत्तर के मैदानों में लाकर खड़ा कर दिया था। पांडवों के वंशज महाराजा परीक्षित और तक्षक नाग का युद्ध महाभारत के युद्ध के बाद की घटना है। नागों ने परीक्षित को पराजित कर मार डाला जिसके बाद नागों तथा परीक्षित के वंशजों में लम्बे समय तक युद्ध होते रहे। काफी लम्बे अरसे बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ होगा। सदियों बाद तथागत बुद्ध के वचनों का मध्य एशिया में प्रसार इसी उत्तरापथ से हुआ। तृतीय संगीति तो सप्त सिंधु में ही हुई थी। श्रीनगर इसका साक्षी है। उन दिनों सारे पश्तून बुद्धम् शरणम् गच्छामि का घोष करते घूमते थे। एशिया जम्बू द्वीप के अरव क्षेत्र में इस्लाम का उदय एक ऐसी घटना थी जिसने हिन्दुस्थान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया। नव इस्लाम में दीक्षित हो चुके अरबों, तुर्कों व मुगलों यानि ए.टी.एम (अरब+ तुर्क+मुगल) के हिन्दुस्थान पर, सप्त सिन्धु के रास्ते हमले आठवीं शताब्दी में ही शुरू हो गए थे। लेकिन इस बार के हमले केवल भौगोलिक आधिपत्य के लिए ही नहीं थे बल्कि येन केन प्रकारेण विजित देश के निवासियों को अपने मजहब में मतान्तरित करने के लिए सांस्कृतिक हमले भी थे। इन हमलों ने भारतवर्ष को अनेक दिशाओं में प्रभावित किया। प्रभाव की एक दिशा क्षत्रिय समाज के बहुत बड़े हिस्से का बंजारा समाज में परिवर्तन। एटीएम से पराजय के बाद विदेशी सत्ता की सबसे ज्यादा मार क्षत्रिय समाज को ही सहनी पड़ी थी। लेकिन इस समाज ने पराजय को मन से कभी स्वीकार नहीं किया था। इस संक्रमण काल में क्षत्रिय समाज के बहुत बड़े हिस्से का घुमन्तु समाज में परिवर्तन हुआ जिसे जनभाषा में बंजारा के नाम से जाना जाने लगा। हमले क्योंकि सप्त सिन्धु क्षेत्र से ही हो रहे थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसी क्षेत्र को सहना पड़ा। इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती भी इसी सप्त सिन्धु क्षेत्र के लिए थी। इस मरहले पर सप्त सिन्धु क्षेत्र में दस गुरु परम्परा का उदय एक दैवी योजना ही कही जा सकती है। श्री नानक देव जी इस परम्परा के प्रथम गुरु थे।
लेखक परिचय
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री जी द्वारा लिखित यह पुस्तक गुरु तेग बहादुर जी के जीवन, उनके बलिदान और ऐतिहासिक योगदान को विस्तार से प्रस्तुत करती है। लेखक ने सप्त सिंधु क्षेत्र में गुरु परम्परा के उदय से लेकर गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान तक की घटनाओं का क्रमवार, तथ्यात्मक और गहराई से विश्लेषण किया है। इसमें उनके विचारों, धार्मिक संघर्षों, यात्राओं और आत्मबलिदान से जुड़े प्रसंगों को प्रामाणिक संदर्भों सहित कहा गया है।
पुस्तक परिचय
यह पुस्तक सिर्फ आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं रहती बल्कि यह दश गुरु परम्परा के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पक्षों को भी उजागर करती है। इसमें दश गुरु परम्परा के अविस्मरणीय क्षणों-जैसे गुरु तेग बहादुर का पहचान संकट, मखन शाह लुबाना की भूमिका, चांदनी चौक में बलिदान, और लखी शाह द्वारा गुरु जी की देह का दाह का संस्कार- की मार्मिक व ऐतिहासिक प्रस्तुति है। साथ ही, इतने साहसिक प्रसंगों की वैज्ञानिक विवेचना भी मिलती है। यह कृति न केवल गुरु तेग बहादुर जी के समग्र जीवन, उनके बलिदान और उनके विचारों को सामने लाती है, बल्कि भारतीय सभ्यता, सिख परंपरा और सामाजिक एकता के आयाम को गहराई से प्रस्तुत करती है। इतिहास, धर्म, संस्कृति और समाजशास्त्र से जुड़े सभी पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय है।
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