भाषा विभाग, पंजाब साहित्य के शोधकर्ताओं के श्रम से संजोए शोध कार्य को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने के लिए सदव कृत संकल्प रहा है। इससे पाठकों को अपनी महान सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत का बोध होता है और इससे उन्हें साहित्य क्षेत्र में हुई नयी उद्भावनाओं का परिचय मिलता है। इस दिशा में पी. एच. डी. और डी. लिट्, की उपाधियों के लिए स्वीकृत शोध-प्रबन्धों को प्रकाशित करना हमारा विनम्र प्रयास रहा है। डा. उमेश जैन द्वारा लिखित "हिन्दी कथा-साहित्य में अस्तित्ववाद का स्वरूप" शोध-प्रबन्ध का प्रकाशन भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।
हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में कहानी और उपन्यास लोकप्रिय और समृद्धतम विधाएं है। आधुनिक काल की उपन इन साहित्यिक विधाओं में आधुनिकता के चिन्तन से अस्तित्ववादी अवधारणाओं का हिन्दी कथा-साहित्य में व्यापक रेखांकन हुआ है। कथा-साहित्य में अस्तित्ववाद का स्वरूप क्या है, अस्तित्ववादी चिन्तन में मनुष्य की गरिमा को किन धरातलों पर स्थापित किया जा सकता है, अस्तित्ववादी चिन्तकों के प्रभाव को आधुनिक भारतीय लेखकों ने अपने साहित्य में कैसे आत्मसात् किया है आदि महत्वपूर्ण प्रश्नों पर डा० उमेश जैन ने अपने इस शोध-प्रबन्ध में विस्तार पूर्वक विचार किया है। इसमें अस्तित्ववाद के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्ष को विवेचित करते हुए लेखिका ने आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य के विकास की नवीनतम उपलब्धियों का मूल्यांकन और निष्कर्ष प्रस्तुत किया है इससे मानव-मन के नवीन वैचारिक क्षितिज उद्घाटित होते हैं ।
आशा है पाठक इस नये प्रकाशन का भरपूर स्वागत करेंगे।।
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