प्रस्तावना
भारतीय धर्म साधना की तीन प्रमुख धाराएं रही हैं वैष्णव, शेव एवं शाक्त। प्रमुख रूप से वैष्णव एवं शैव तत्य का वर्णन हिन्दी साहित्य के विभिन्न युग में रचनाकारों ने किया है। अब तक हिन्दी में शिव तत्व का विवेचन करने वाले बहुत थोड़े से ऐसे ग्रंथ हैं, जिनमें सम्यक रूप से इस तत्व का विवेचन विश्लेषण हुआ है। निम्नलिखित ग्रंथों में अब तक शोधात्मक दृष्टि से हिन्दी साहित्य में शिव तत्व के विकास का विवेचन किया गया है। ऐसे ग्रंथों में डॉ. छोटे लाल दीक्षित का शोध-प्रबंध "राम कृष्ण काव्येतर हिन्दी सगुण भक्ति काव्य" है। इस शोध प्रबंध में राम-कृष्ण के अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं का स्वरूप विवेचन हिन्दी साहित्य की विभिन्न कृतियों के आधार पर किया गया है। शिव तत्व ऐसे तत्वों में से एक है। लेखक ने शिव तत्व के प्रारंभ और उसके विविध रूपों की व्याख्या नहीं की है। इस ग्रंथ में केवल शिव तत्व के कुछ प्रमुख वर्णनों को समाहित किया गया है। अतः स्पष्ट है कि इस ग्रंथ में शिव तत्व का सम्यक विवेचन संभव नहीं हुआ है। शिव तत्व के विवेचन से सम्बन्धित दूसरा शोध-प्रबंध डॉ. राम गोपाल शर्मा 'दिनेश' का है, जिसका शीर्षक "हिन्दी शिव-काव्य का उद्भव और विकास" है। इस ग्रंथ में लेखक ने वैदिक, पौराणिक एवं तांत्रिक साहित्य में विवेचित शिव तत्व की अनदेखा किया है। जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि शिव तत्व के कौन से विभिन्न रूप हैं, जिनका वर्णन हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालों में साहित्यकारों द्वारा किया गया है। लेखक ने लोकाश्रित अथवा लोक परम्परा में जन-देवता के रूप में शिव तत्व के अत्यंत महत्वपूर्ण रूप का भी वर्णन नहीं किया है। लेखक ने केवल कुछ प्रमुख कवियों द्वारा वर्णित शिव तत्व का संकलन किया है। उपलब्ध सामग्री का विवेचन विश्लेषण सम्यक रूप से नहीं किया गया है। अतः इस ग्रंथ से भी शिव तत्व के विकास का स्पष्ट रूप प्रस्तुत नहीं होता। तीसरा ग्रंथ डॉ. कमला भण्डारी का "मध्यकालीन कविता पर शैव मत का प्रभाव" शीर्षक से प्रस्तुत हुआ है। इस ग्रंथ में लेखिका ने शैव मत के सिद्धांतों का विवरण प्रस्तुत करने में विशेष रुचि दिखाई है। किंतु शिव तत्व के विभिन्न रूपों का हिन्दी साहित्य में विश्लेषण नहीं किया गया है। केवल कुछ रचनाओं से शिव तत्व के वर्णनों और उल्लेखों को लेकर शैव मत के सिद्धांतों के अनुसार उनकी व्याख्या की गई है। लेखिका द्वारा हिन्दी की अनेक ऐसी रचनाएं छूट गयी हैं, जिनमें शिव तत्व का संश्लिष्ट विवेचन उपलब्ध है। लोकाश्रित परम्परा को तो लेखिका ने सर्वथा विस्मृत ही कर दिया है। अतः यह ग्रंथ भी शिव तत्व का सम्यक विवेचन प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं है। उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हिन्दी काव्य में प्रमुख रूप से प्रयुक्त शिव तत्व का विश्लेषण अभी तक किसी शोध-प्रबंध में समग्रता से नहीं हुआ है। ध्यातव्य है कि शिवतत्व हमारी जातीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंश है। इस तत्व का प्रयोग कर विभिन्न कालों के हिन्दी कवियों ने वैष्णव एवं शैव परम्पराओं में ऐक्य उपस्थित किया है। इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसी दास का अवदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। आधुनिक काल के अनेक हिन्दी कवियों ने शिव तत्व की व्याख्या युगीन संदमों में की है और स्पष्ट किया है कि शिव तत्व हमारी युगीन समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है। महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति 'कामायनी' विशेष उल्लेखनीय है। इसी प्रकार संतों और भक्तों ने भी शिव तत्व का प्रयोग मानव-जीवन को अधिक सुखकर बनाने के लिए किया है। लोकाश्रित काव्य में भी शिव-तत्व का बहुत अच्छा उपयोग किया गया है और शिष्ट साहित्य में वर्णित शिव तत्व से अलग एक नयी परम्परा स्थापित हुई है। शिव तत्व की इन्हीं विशिष्टताओं को ध्यान में रखकर प्रस्तुत शोध प्रबंध के लेखक ने - "हिन्दी काव्य में शिव तत्व" शीर्षक शोध प्रबंध की रचना करने का निश्चय किया। प्रस्तुत शोध-प्रबंध आठ अध्यायों में विभक्त है, जिनका विवरण निम्नलिखित है :- प्रस्तुत शोध प्रबंध के प्रथम अध्याय का शीर्षक "वैदिक एवं पौराणिक साहित्य में शिव तत्व" है। इस शीर्षक के अन्तर्गत वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध शिव तत्व को क्रमबद्ध कर उसका तात्विक विवेचन किया गया है। इसी के साथ विविध पुराणों में शिव तत्व के विवेचनों के आधार पर शिव तत्व के पौराणिक अवधारणा के अनुसार शिव के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है और इसे पौराणिक शिव तत्व की संज्ञा दी गई है। प्रथम बार इस तरह का प्रयास प्रस्तुत शोध-प्रबंध में किया गया। इस अध्याय की यही विशिष्टता है। दूसरे अध्याय का शीर्षक "तंत्र एवं लोक-परम्परा में शिवतत्व" है। पौराणिक अवधारणा के विपरीत एक अन्य शिव तत्व की मान्यता तंत्र शास्त्र में है, जिसका विवेचन और विश्लेषण किया गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि तंत्राश्रित शिव की अवधारणा पौराणिक शिव से भिन्न है। इस अध्याय में तंत्राश्रित शिव का स्वरूप निश्चित किया गया है। प्रस्तुत शोध प्रबंध में प्रथम बार इस तरह का प्रयास किया गया है। इस अध्याय की यही विशेषता है। इसी अध्याय में तंत्राश्रित शिव तत्व से भिन्न लोकाश्रित शिव तत्व का भी स्वरूप निर्धारण किया गया है। लोक परम्परा में भी शिव तत्व उपलब्ध है
लेखक परिचय
नंद किशोर सिंह का जन्म 3 जुलाई 1943 को आजमगढ़ (वर्तमान में मक) के जिले के हृदयपट्टी गांव में हुआ। प्रखर मेधा के धनी डॉ० नंदकिशोर ने सन् 1961 ई० बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज से हिंदी, अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान तथा दर्शनशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1963 ई० में गोरखपुर विश्वविद्यालय से परास्नातक की उपाधि के पश्चात 1964 ई० असम के राज्य गोहाटी कॉमर्स कॉलेज में हिन्दी के व्याख्याता हुए। किन्तु इस कॉलेज में वे अधिक वर्ष तक कार्य नहीं कर सके। 1965 ई० होजाई कॉलेज में अध्यापन कार्य शुरू किया। बाद में 1966 ई० प्रागज्योतिष कॉलेज में स्थाई नियुक्ति हुई। 1970 ई० में इसी कॉलेज के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने। भक्तिकालीन और रीतिकालीन काव्य परम्परा में इन्हें गहरी रुचि और विशेषज्ञता के कारण 1980 ई० में इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस से 'हिन्दी काव्य में शिव तत्त्व' विषय से पीएच डी की उपाधि धारण की। गोहाटी के इसी कॉलेज में 2001 ई० में वे कॉलेज के प्राचार्य हुए। हिन्दी विभाग में लम्बी सेवाएं देने के पश्चात वे 2003 में सेवा निवृत्त हुए। उन्होंने अमर भारती, हिन्दी कविता चमन, हिंदी गद्य सुधा, एकांकी त्रय, निबंधायन, राष्ट्रभाषा पाठशाला भाषा जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का सम्पादन किया। हिन्दी कविता भाषा और संस्कृति का गौरव 3 अप्रैल (चौत्र नवरात्र द्वितीय 2022 में पंच महाभूत में विलीन हो गया। असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, असम उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद, असम भारती (अध्यक्ष के रूप में) उत्तर प्रदेश पूर्वोत्तर विकास संघ (उपाध्यक्ष के रूप में) आदि संस्थाओं से भी जुड़े रहे। उनके द्वारा संपादित पुस्तकों में अन्यतम हैं-अमर भारती, हिन्दी कविता चयन, हिन्दी गद्य सुधा, एकाकी-त्रय, निबंधायन, और राष्ट्रभाषापाठमाला। गौहाटी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक सफल शोध निदेशक के रुप में डाँ०अच्युत शर्मा और मालविका शर्मा के जरिये क्रमश 'हिन्दी और असमिया भाषाओं की कारक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन' तथा प्रिय प्रवास और कनुप्रिया के सन्दर्भ में श्रीराधा संज्ञक विषयों पर पीएचडी डिग्री के शोध कार्य पूरे कराये.
पुस्तक परिचय
आधुनिक हिंदी काव्य में शिव तत्त्व का पुनर्परिशोधित स्वरूप देखने को मिलता है। प्रसाद (कामायनी) और निराला (राम की शक्तिपूजा) नागार्जुन (भस्मांकुर) दुष्यंत कुमार (एक कंठ विषपायी) और उद्धांत (रुद्रावतार) जैसे कवियों ने शिव को आत्मतत्त्व, क्रांति और शाश्वत ऊर्जा के रूप में निरूपित किया । समकालीन हिंदी काव्य में शिव को पुनः एक शक्ति तत्त्व, वैराग्य एवं चेतना के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। शिव का अर्धनारीश्वर रूप स्त्री-पुरुष समरसता का प्रतीक है, तो वहीं योगी स्वरूप ध्यान और समाधि का आधार। उनके तांडव में महाकाल की गूंज है, तो उनके करुणामय रूप में समस्त सृष्टि के प्रति प्रेम व शिव तत्त्व की यह व्यापकता हिंदी काव्य में सर्वदा विद्यमान रही है और यह न केवल दार्शनिक अपितु सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विमर्शों का मूलाधार बनी रहेगी।
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