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हिंदी के प्रारंभिक निबंधकार जयशंकर प्रसाद: Hindi Ke Prarambhik Nivandhkaar Jaishankar Prasad

$24
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Specifications
Publisher: Sasta Sahitya Mandal Prakashan
Author Pallav
Language: Hindi
Pages: 159
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 240 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789348765673
HCC036
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Book Description

भूमिका

     

 

आधुनिक काल में खड़ी बोली हिंदी के लिए पहली लड़ाई काव्य भाषा के रूप में अपना स्थान बनाने की थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से हिंदी ने वह लड़ाई जीती। इसके बाद छायावाद के कवियों के लिए काव्य भाषा के रूप में ब्रज और खड़ी बोली हिंदी के मध्य कोई दुविधा न थी तथापि सुमित्रानंदन पंत ने 'पल्लव' की भूमिका में जैसे इस लड़ाई का पटाक्षेप किया। इसके बाद क्या छायावाद के कवियों के लिए वैचारिक गद्य लेखन का कोई आकर्षण था। ध्यान से देखें तो पंत, निराला, प्रसाद और महादेवी अर्थात् सभी प्रमुख कवियों ने वह गद्य लिखा जो आलोचना का निर्माण करता था साथ ही वैचारिक सिद्धांतों और मतवादों पर अपना पक्ष रखता था। जयशंकर प्रसाद कवि, कथाकार और नाटककार तो हैं लेकिन उनके निबंध भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि " आचार्य शुक्ल की तरह प्रसाद जी के लिए भी कला सोद्देश्य है। नाटकों में 'रस का प्रयोग' नाम के निबंध में वह कहते हैं, इसमें लोकमंगल की कल्पना प्रच्छन्न रूप से अंतर्निहित है।" डॉ. शर्मा का प्रसाद के निबंधों को वैचारिक बहसों के लिए उद्धृत करना उनके निबंधों के महत्त्व को स्वतः सिद्ध कर देता है और यहाँ उनका निष्कर्ष था कि प्रसाद जी के लिए साहित्य सोद्देश्य है, इसलिए साहित्य में मूलवस्तु अनुभूति है, न कि अभिव्यक्ति। वस्तुतः आलोचना भी निबंधों के रूप में ही आकार लेती है तो यह स्वाभाविक ही है कि आलोचना के निमित्त लिखे गए गद्य को भी निबंधों की श्रेणी में स्थान दिया जाए। जयशंकर प्रसाद आधुनिक काल में हिंदी के सबसे प्रमुख कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबंधकार माने जाते हैं। जयशंकर प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1946 वि. तदनुसार 30 जनवरी 1890 दिन गुरुवार को वाराणसी में हुआ। इनके पितामह बाबू शिवरतन साहू अपनी दानवीरता के लिए विख्यात थे और इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी भी दान देने के साथ-साथ कलाकारों के आदर-सत्कार के लिए जाने जाते थे। इनके परिवार का वाराणसी में बड़ा सम्मान था। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज और सातवें दर्जे तक ही वे वहाँ पढ़ सके थे। उन्होंने अपने घर पर ही हिंदी और संस्कृत का अध्ययन किया। प्रसाद जी के प्रारंभिक शिक्षक मोहिनीलाल गुप्त थे, जो स्वयं कवि थे और 'रसमय सिद्ध' के उपनाम से जाने जाते थे। उनकी ख्याति अच्छे शिक्षक के रूप में थी। गुप्त जी ने प्रसाद जी को हिंदी और संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा दी। संस्कृत में और गति प्राप्त करने के लिए प्रसाद जी ने तीन संस्कृत अध्यापकों से शिक्षा ग्रहण की जो क्रमशः गोपाल बाबा, दीनबंधु ब्रह्मचारी और हरिहर महाराज थे। इस शिक्षकों से संस्कृत सीखकर उन्होंने बाद में स्वाध्याय से वैदिक संस्कृत पर भी अपनी पकड़ बना ली। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत-अध्यापक महामहोपाध्याय पं. देवीप्रसाद शुक्ल 'कवि-चक्रवर्ती' को प्रसाद जी का काव्यगुरु माना जाता है। यह भी मान्यता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही प्रसाद जी ने 'कलाधर' के नाम से ब्रजभाषा में एक सवैया लिखकर अपने गुरु 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्यशास्त्र का गहराई से अध्ययन किया था। उनकी पहली कविता 'सावक पंचक' सन् 1906 में' भारतेंदु' पत्रिका में कलाधर नाम से प्रकाशित हुई थी। प्रसाद जी का पहला विवाह 1909 ई. में विंध्यवासिनी देवी के साथ हुआ था। क्षय रोग के कारण सन् 1916 ई. में विंध्यवासिनी देवी की मृत्यु हो गई। सन् 1917 ई. में प्रसाद जी ने सरस्वती देवी के साथ विवाह किया। दुर्भाग्यपूर्ण ही था कि कुछ समय बाद सरस्वती देवी को भी क्षय रोग हो गया और दो ही वर्ष 1919 ई. में उनका देहांत भी प्रसूतावस्था में क्षय रोग से ही हुआ। दो विवाहों के पश्चात भी वैवाहिक जीवन के नष्ट हो जाने से प्रसाद जी का जीवन अत्यंत शोकग्रस्त हो गया। बताया जाता है कि अपनी भाभी के आग्रह पर सन् 1919 ई. में उनका तीसरा विवाह कमला देवी के साथ हुआ। तीसरे विवाह के बाद उन्हें एकमात्र संतान पुत्र रत्नशंकर प्रसाद का सुख मिला, जिनका जन्म सन् 1922 ई. में हुआ था। जब उनके पुत्र मात्र पंद्रह वर्ष के ही थे तभी क्षय रोग के कारण प्रसाद जी भी 14 नवंबर 1937 (दिन सोमवार) को असमय चल बसे। इससे पहले उन्होंने क्षय रोग से निदान के लिए अंग्रेजी और अन्य प्रचलित उपचारों का प्रयोग किया लेकिन कोई विशेष लाभ न हो सका। पचास वर्ष की आयु भी पूरी नहीं कर पाने वाले इस मनीषी रचनाकार ने साहित्य को अपूर्व योगदान किया। कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास जैसी विधाओं में अविस्मरणीय रचनाएँ देने वाले प्रसाद जी का एक निबंध संग्रह 'काव्य और कला तथा अन्य निबंध' प्रकाशित हुआ था।

 

लेखक परिचय

 

डॉ. पल्लव जन्म: राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार में 2 अक्टूबर को। शिक्षा: पीएच. डी, एम.ए. हिंदी। रुचि: गद्य आलोचना में विशेष रुचि । लेखन : 'कहानी का लोकतंत्र' और 'लेखकों का समार' शीर्षक से दो पुस्तकें प्रकाशिता साहित्य अकादेमी के लिए कवि नन्द चतुर्वेदी पर मोनोग्राफ लेखन । संपादन : नंद चतुर्वेदी रचनावली (चार खंड), असगर वजाहत तथा स्वयं प्रकाश के रचना संचयनों का संपादन। 'मैं और मेरी कहानियों' शीर्षक से हिंदी के दस प्रतिनिधि युवा कथाकारों के दस कहानी संग्रहों का चयन और संपादन। साहित्य-संस्कृति के विशिष्ट संचयन 'बनास जन' का 2008 से निरंतर संपादन-प्रकाशन । लेख : प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आलेख, आलोचना और समीक्षा लेखों का लगभग ढाई दशक से निरंतर प्रकाशन । पुरस्कार एवं सम्मान : भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का 'युवा साहित्य पुरस्कार', 'वनमाली सम्मान', 'आचार्य निरंजननाथ सम्मान', 'राजस्थान पत्रिका सृजन पुरस्कार', 'पाखी आलोचना सम्मान' । सम्प्रति : दिल्ली के हिंदू कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर ।

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