प्रस्तावना
इतिहास, जब वह सत्ता के अधीन हो जाए और विचारधारा के आग्रह में ढल जाए, तो वह स्मृति का दमन कर देता है। भारत जैसे देश, जिसकी पहचान एक जीवित सांस्कृतिक चेतना के रूप में रही है वहाँ इतिहास न केवल अतीत का वर्णन होता है, बल्कि वर्तमान की दिशा और भविष्य की चेतना का नियामक भी होता है। किंतु जब दिल्ली जैसे प्राचीन और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध भूगोल का इतिहास योजनाबद्ध ढंग से विकृत किया जाए, जब उसकी स्मृतियों को इस प्रकार भुला दिया जाए कि नई पीढ़ियाँ अपने ही नगर के मठ-मंदिरों, पर्वों, नदियों और संस्कारों से अपरिचित हो जाएँ तब यह केवल इतिहास-च्युत समाज नहीं होता, यह आत्महीन राष्ट्र की भूमिका बन जाती है। इस पुस्तक का उद्देश्य किसी भावना या गौरव के मिथक को पुनर्जीवित करना नहीं है। यह एक गहन शोध पर आधारित ऐतिहासिक पुनर्रचना है, जिसका आधार अभिलेखीय साक्ष्य, पुरातात्त्विक विवरण, औपनिवेशिक अभिलेख, भारतीय साहित्यिक प्रमाण, स्थान विशेष की स्मृति परंपराएँ, और विदेशी यात्रियों के विवरण हैं। प्रत्येक अध्याय में जिस संरचना और स्रोत चयन का उपयोग किया गया है, वह इतिहास लेखन की कठोर पद्धतियों के अनुरूप है, और इसका हर निष्कर्ष प्रमाण-संगत है। दिल्ली के इतिहास को जिस प्रकार से वामपंथी विचारधारा ने गढ़ा, उसका मूल उद्देश्य केवल सत्ता के सांस्कृतिक वैधताकरण को स्थापित करना था। इन्होंने दिल्ली को इस्लामी स्थापत्य, मुराल दरबारों और सल्तनती संघर्षों का केंद्र बनाकर प्रस्तुत किया, जबकि हिन्द राज्य-व्यवस्था, ग्राम संस्थाएँ, धार्मिक प्रतिष्ठान, और व्यापारिक परंपराएँ इनके विमर्श से या तो बहिष्कृत कर दी गईं या उपहास का विषय बना दी गई। उदाहरण के लिए, अनंगपाल तोमर द्वारा स्थापित लौह स्तम्भ, पृथ्वीराज चौहान की प्रशासनिक व्यवस्था, योगमाया और कालकाजी जैसे मंदिरों की अक्षुण्ण परंपरा, और 360 से अधिक प्राचीन गाँवों की भू-संरचना ये सभी इस वैचारिक प्रक्षेपण से पूर्णतः अनुपस्थित हैं। इतिहास लेखन का यह पक्षपात केवल अभिलेखीय नहीं है, यह स्मृति पर नियंत्रण का उपकरण है। जब किसी समाज को उसकी सांस्कृतिक स्मृति से वंचित किया जाता है, तो वह केवल राजनीतिक उपभोक्ता बनकर रह जाता है। दिल्ली के हिन्द गाँवों को 'विकास प्राधिकरण उपनगरों' के रूप में जबरन ढाल दिया गया, और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था को 'अनधिकृत बस्तियों' के रूप में कलंकित कर प्रशासनिक उपेक्षा के हवाले कर दिया गया। इस प्रक्रिया में केवल जमीनें नहीं बदलीं, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अनुशासन का स्वरूप ही नष्ट कर दिया गया। यह पुस्तक इस विकृति का सीधा प्रत्युत्तर है। इसमें प्रत्येक अध्याय किसी ऐतिहासिक प्रश्न को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करता है उदाहरणतः, क्या दिल्ली केवल मुराल स्थापत्य की विरासत है? क्या यहाँ हिन्द राज्य केवल क्षणिक और सीमित रहे? क्या मंदिर संस्थान केवल सांस्कृतिक मिथक हैं या उनके शिलालेखीय प्रमाण भी उपलब्ध हैं? क्या दिल्ली की व्यापारिक संस्कृति का कोई हिन्द इतिहास है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर इस पुस्तक में साक्ष्य सहित प्रस्तुत किया गया है, और वह भी बिना किसी वैचारिक मुरव्वत या बौद्धिक दया के। पुस्तक की दृष्टि यह है कि दिल्ली का हिन्द इतिहास कोई भावात्मक विषय नहीं, अपितु एक शास्त्रसम्मत शोध का क्षेत्र है। यहाँ प्रतीकों की नहीं, तथ्यों की बात की गई है। शिलालेखों का अनुवाद किया गया है
लेखक परिचय
डॉ प्रशांत बड़थ्वाल वर्तमान में श्री अरविन्द महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक हैं। इनके अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध लेख प्रकाशित हुए हैं तथा देश के प्रमुख समाचार पत्रों और ब्लॉग्स में नियमित स्तंभ लेखन करते रहे हैं। डॉ. बड़थ्वाल राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषक के रूप में भी काफ़ी समय से सक्रिय रहे हैं। शोध क्षेत्र में इन्होने उल्लेखनीय योगदान दिया है तथा अनेक संस्थानों में विज़िटिंग लेक्वरर तथा एक कुशल एवं प्रेरक वक्ता के रूप में भी सहभागिता निभाई है। इनकी प्रकाशित पुस्तकें पाठकों के मध्य व्यापक रूप से प्रशंसित रही हैं जिनमें प्रमुखतः द सियर ऑफ़ भारतीय अवेकनिंग: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, लाल स्याही का काला इतिहास, द हह्मनिस्ट मोंकः स्वामी विवेकानन्द आदि शामिल है। डॉ बड़थ्वाल का लेखन भारतीय दृष्टिकोण से लेकर समकालीन विमर्शों को पुनः पुनः पुनर्नवा बनाकर सत्य को उद्घाटित करने की दिशा में एक सशक्त एवं सराहनीय प्रयास माना जाता है।
पुस्तक परिचय
यह पुस्तक "दिल्ली का हिंदू इतिहास" दिल्ली की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान को पुनः समझने का एक गंभीर और गहन शोधपरक प्रयास है। यह कृति केवल घटनाओं का साधारण वर्णन नहीं करती, बल्कि दिल्ली के अतीत को एक व्यापक सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करती है। लेखक का मानना है कि समय के साथ इतिहास-लेखन की कुछ प्रवृत्तियों ने दिल्ली के प्राचीन स्वरूप को सीमित कर दिया और उसे मुख्यतः सल्तनत तथा मुगल काल की राजनीतिक घटनाओं तक ही केंद्रित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप उस दीर्घकालिक सांस्कृतिक परंपरा की उपेक्षा हुई, जो इन्द्रप्रस्थ से लेकर मध्यकालीन हिंदू राजवंशों तक निरंतर विकसित होती रही। पुस्तक में दिल्ली के इतिहास को इन्द्रप्रस्थ की परंपरा से श्रारंभ करते हुए उसके सांस्कृतिक विकास की एक दीर्घ यात्रा प्रस्तुत की गई है। महाभारत में वर्णित इन्द्रप्रस्थ को केवल पौराणिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति के रूप में समझने का प्रयास किया गया है। लेखक विभिन्न पुरातात्विक खोजों, स्थलपरंपराओं, शिलालेखों तथा प्राचीन ग्रंथों के आधार पर यह संकेत करते हैं कि दिल्ली का भूभाग प्राचीन काल से ही वैदिक सम्यता, धार्मिक अनुष्ठानों, गुरुकुलों और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें तोमर, चौहान एवं मराठा जैसे हिंदू राजवंशों की भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला गया है। अनंगपाल तोमर द्वारा स्थापित लौह स्तम्भ, लालकोट जैसे किलों का निर्माण, मंदिरों और जलसंरचनाओं की स्थापना तथा ग्राम व्यवस्था का विकास दिल्ली के उस ऐतिहासिक स्वरूप को सामने लाते हैं जो लंबे समय तक उपेक्षित रहा। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में भी दिल्ली केवल एक सैन्य शक्ति का केंद्र नहीं थी, बल्कि वह सांस्कृतिक गतिविधियों, विद्या, स्थापत्य और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बनी रही। पुस्तक यह भी दर्शाती है कि दिल्ली के आसपास के ग्राम, मंदिर, तीर्थस्थल और स्थानीय परंपराएँ इस क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता के साक्ष्य हैं। लेखक विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों जैसे पुरातात्विक उत्खनन, ताम्रपत्र, विदेशी यात्रियों के विवरण और लोकस्मृतियों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि दिल्ली की पहचान बहुस्तरीय रही है और उसे केवल एक सीमित ऐतिहासिक कालखंड से जोड़कर नहीं समझा जा सकता। इस प्रकार "दिल्ली का हिंदू इतिहास" केवल अतीत का पुनर्निर्माण नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और भारतीय इतिहास-बोध को पुनः समझने का एक महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास है। यह पुस्तक पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी भी नगर का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं बनता, बल्कि उसकी सम्यता, परंपराओं और सामाजिक स्मृतियों से भी निर्मित होता है।
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