विश्व में केवल भारत ही ऐसा देश है जहां का विस्तृत इतिहास सुरक्षित रहा है। 800 ई० से 1947 के विदेशी आक्रमण में प्रायः सभी पारम्परिक विद्यालय और पुस्तकालय नष्ट कर दिये गये तथा व्यक्तिगत संग्रह भी जलाये गये।
अंग्रेजों ने भी बचे खुचे ग्रन्थ जला दिये। कुछ की चोरी कर इंगलैण्ड ले गये जहां उनको तोड़-मरोड़ कर मनमाना इतिहास लिखा जा सके। 1831 में औक्सफोर्ड में स्थापित बोडेन पीठ का घोषित उद्देश्य था ऐसा इतिहास लिखना जिससे वैदिक सभ्यता नष्ट की जा सके और सभी भारतीयों को इसाई बनाया जा सके। औक्सफोर्ड से प्रकाशित सभी पुस्तकों के लेखकों यथा मैक्समूलर, वेबर, मैकडोनल्ड, कीथ, मोनियर विलियम्स आदि ने अपनी पुस्तकों की भूमिका में यही लिखा है। भारत की गुलामी की प्रवृत्ति विचित्र है। अंग्रेज खुलकर कहते हैं कि भारतीय इतिहास को तथा सभ्यता को नष्ट कर अपना शासन स्थायी रखना उनका एकमात्र उद्देश्य है। पर उनके भारतीय दास केवल उसी को सच मानते हैं। अंग्रेज आते समय भी अपने लोगों को शासन देकर चले गये जो अंग्रेजी परम्परा के अनुसार भारत को लूटकर पैसा विदेशी बैंकों में जमा करते रहे और देशभक्त भारतीयों को छोटे मुकदमों में फंसा कर उनको आतंकवादी आदि सिद्ध करते रहे। विदेशी बैंकों के पैसों से आज भी व्यवहार में विदेशी शासन ही है जिनसे चुनाव परिणाम प्रभावित होते हैं। पहले इस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यक्ति शासन करते थे, अब वर्ल्ड बैंक के।
अंग्रेज भारत के उद्धार या उन्नति के लिये नहीं आये थे न उन्होंने यहां का इतिहास लिखा। उन्होंने सभी उपलब्ध इतिहास नष्ट किया जिससे वैदिक सभ्यता को नष्ट कर उनका स्थायी शासन रखा जा सके। भारतीय नेताओं की मदद से उनका लूट पहले जैसा या उससे भी अधिक चल रहा है। यदि भारत का इतिहास नहीं रहता तो वे कैसे लिख सकते थे? यदि सचमुच उनको अज्ञात इतिहास की खोज करनी आती थी तो अपने देश का इतिहास क्यों नहीं लिख पाये?
इतिहास नष्ट करने का एक और उद्देश्य था कि अंग्रेजों की तरह भारतीयों को भी विदेशी आक्रमणकारी सिद्ध किया जाय। पर ऐसा किसी भारतीय या पाश्चात्य साहित्य में उल्लेख नहीं मिला। बल्कि सिकन्दर के समकालीन ग्रीक लेखक मेगास्थनीज ने लिखा कि विश्व में भारत एकमात्र देश है जहां बाहर से कोई नहीं आया है। अतः भारतीयों को विदेशी सिद्ध करने के लिये मध्य एसिया से उनके काल्पनिक आगमन स्थल सिन्ध में खुदाई की गयी। उन स्थानों के बारे में भी पहले से पता था कि यह नागों द्वारा महाभारत के बाद के पाण्डव राजा परीक्षित की हत्या का बदला लेने के लिये उनके पुत्र जनमेजय द्वारा आक्रमण का परिणाम था। उनके दो नगर श्मशान बन गये थे जिनके प्रायश्चित्त के लिये जनमेजय ने कई स्थानों पर मन्दिर के लिये भूमिदान किये थे। ऐसे 5 पट्टे मैसूर ऐण्टिकुअरी के जनवरी 1900 अंक में प्रकाशित हुये थे। इनके नाम भी श्मशान बनने के ही अर्थ के हैं-मोइन जो-दरो मुर्दों का स्थान, हडप्पा हड्डियों का ढेर। इन स्थानों की खुदाई कर मनमाने निष्कर्ष निकाले गये कि विदेशी आर्यों ने यहां की द्रविड़ सभ्यता नष्ट कर वैदिक सभ्यता आरम्भ की तथा द्रविडों को दक्षिण की तरफ भगाते गये। यह पारम्परिक वर्णनों के विपरीत था। इन्द्र को पूर्व दिशा का लोकपाल कहा गया है तहा इन्द्र से सम्बन्धित वैदिक शब्द आज भी उन्हीं अर्थों में ओड़िशा से वियतनाम तक प्रयुक्त होते हैं। तथाकथित सिन्धु घाटी की सभ्यता की कहानी आश्चर्यजनक है। अभी तक सिन्धु लिपि को कोई पढ़ नहीं पाया है। वास्तव में कोई लिपि या कोई लेख नहीं है। कुछ मिट्टी की मूर्तियां हैं जिनके मनमाने अर्थ निकाले जाते हैं। जो लेख अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है उसे ठीक म उसे ठीक मानते हैं तथा जो हजारों वर्षों से पढ़ा और बिना सन्देह के समझा जा रहा है उसे गलत मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्राचीन सरस्वती नदी के अवशेष मिले हैं जिसके सूखने का उल्लेख समय सहित भारतीय पुराणों में है। इस आधार पर कुछ लोगों ने सिन्धु के बदले सिन्धु-सरस्वती सभ्यता कहना आरम्भ कर दिया है।
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