कुछ वर्ष पहले राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्कालीन (दिवंगत) निदेशक श्री हंस कुमार तिवारी ने हिन्दी पाठकों के लिये गणित का परिचयात्मक लेख लिखने का प्रस्ताव मेरे समक्ष रखा था। इस दिशा में मेरे साथ कतिपय कठिनाइयाँ थी। दयालु स्वभाव होने के नाते, तिवरी जी ने लेख लिखने पर अधिक जोर नहीं दिया और मामला जहाँ का तहाँ पड़ा रहा। मैंने भी सोचा, चलो जान बची। पर, विधाता को यह मंजूर नहीं था। नये निदेशक श्रद्धेय रामदयाल पांडेय जी को इस प्रस्ताव की भनक मिली और उन्होंने इसे नये सिरे से दुहराया। वे हर पखवारे मुझे याद दिलाना नहीं भूलते थे। इन्हीं के प्रयत्नों का फल है कि यह लघु कृति आपके सामने है।
ऊपर जिन कठिनाइयों की तरफ मैंने इशारा किया है उनका खुलासा करना आवश्यक है। पुस्तक लिखने में मेरी पहली कठिनाई व्यक्तिगत थी। दुर्भाग्यवश, मैंने अपने चालीस साल का अध्ययन तथा अध्यापन के अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही सम्पन्न किया है। अतः हिन्दी में लिखने-पढ़ने का अभ्यास ही नहीं रहा।
दूसरी अधिक महत्वपूर्ण कठिनाई थी कि अधिकांश हिन्दी साहित्य प्रेमियों और गणित में दूर का रिश्ता रहता आया है। मैं मानता हूँ कि इस अपरिचय के वातावरण का दोष गणितज्ञों के ही मत्थे मढ़ना चाहिये। क्योंकि गणित जानने वालों ने अभी तक गणित का संदेश हिन्दी पाठकों के सामने रखा ही नहीं है। फलतः, इन पाठकों के दिल में गणित के लिये भारी अभिरुचि पैदा हो गयी है।
तीसरी और सबसे अधिक महत्वपूर्ण कठिनाई थी कि विषय-वस्तु के बदलते हुए रूप और रंग का पठनीय परिचय प्रस्तुत करना। संभवतः यहाँ पर बदलते हुए रूप और रंग की बात सुनने पर कुछ पाठक चौंके। क्योंकि अभी तक आम जनता में और काण्ट (Kant) जैसे विचारकों में भी (भ्रम पूर्वक) यह धारणा फैली हुई है कि गणित ही संभवतः ऐसा ज्ञान का क्षेत्र है जो ठोस अविचल सत्य को उद्धारित करता है। इन पृष्ठों में पाठक पायेंगे कि यह धारणा बिल्कुल गलत है। सत्य तो यह है कि आज का गणित अङ्गों का गणित कम रह गया है और संरचनाओं (structures) का अध्ययन अधिक। बीसवीं सदी के पहले, अङ्क गणित, ज्यामिति, बीजगणित आदि अधिकांशतः अलग-अलग अध्ययन माने जाते रहे हैं- कोई एक मूलभूत अध्ययन नहीं था जिसकी स्वीकृत अवधारणाओं (concepts) के अन्तर्गत इन भिन्न-भिन्न अध्ययनों को एकसूत्र में पिरोया जा सके। पर बीसवीं सदी के पाश्चात्य गणित ने समुच्चय (class or set) की मूलभूत अवधारणा करीब-करीब सभी गणित को अन्तर्भूत कर दिया है। यह तो अत्यन्त गर्व का विषय है कि अनेक सदियों पहले वैशेषिक न्याय की जाति (caste) की अवधारणा का ही पल्लवित रूप आज का समुच्चय सिद्धान्त है। पुस्तक में यथास्थान इस बात की कुछ झलक दिखायी पड़ेगी।
सच पूछिये तो भिन्न-भिन्न संरचनाओं के अध्ययन से गणित सभी ज्ञान तथा विज्ञान की विधाओं को व्यक्त करने की एक सक्षम भाषा है। इस नाते भाषा विज्ञान के विषय में भी गणित को बहुत कुछ करना है। उदाहरण के लिये गणित की अवधारणाओं के विश्लेषण के बाद हमने यहाँ यह दिखलाने का प्रयास किया है कि कुंतक की अलङ्कार-अवधारणा बहुत हद तक स्वीकार्य तथा समीचीन है। फिर, न्याय और दर्शन के क्षेत्र में भी गणित को बहुत कुछ कहना है। तर्कशास्त्र तथा न्याय का अध्ययन गणित का एक अनिवार्य अङ्ग हो गया है। पाश्चात्य गणितीय न्याय में अरस्तू के, सदियों से सम्मानित, द्विभंगी न्याय (two-valued topic) के स्थान पर अनेक दूसरे न्याय-त्रिभंगी तथा बहुभंगी नयाय का अध्ययन हुआ है। ये बहुभंगी नयाय प्रणालियाँ क्वांटम सिद्धान्त (quantum theory) आदि भौतिकी सिद्धान्तों को व्यक्त करने में अधिक सक्षम सिद्ध हुई है। यहाँ भी गर्व की बात है कि अनेक शताब्दियाँ पहले ही भारत में जैन गणितज्ञ और नैयायिकों ने सप्तभंगी नय (seven valued judgement) पर जोर दिया था। इस पुस्तिका में हमने इन बहुभंगी न्यायों का समन्वित रूप गणित के माध्यम से व्यक्त करके दिखलाया है।
अन्त में, गणित ही के माध्यम से दर्शन की अर्थवत्ता और अर्थ की अवधारणाओं पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।
गणित के स्वरूप अध्ययन में, प्रयास करने के बावजूद कतिपय वैज्ञानिक शब्दावली का सहारा लेना अनिवार्य सा हो गया है पाठक क्षमा करेंगे।
स्पष्ट है कि मौजूदा अध्ययन में गणित की कुछ मूलभूत अवधारणाओं के अलावा अधिक विस्तृत वर्णन न संभव है न वांछनीय। फिर, इस अध्ययन में जो विचार और निष्कर्ष व्यक्त किये गये हैं वे अधिकांश हमारे अपने हैं।
अतः यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक पाठक प्रत्येक विचार से सहमत. हो। कहा भी है- 'वादे वादे जायते तत्त्वबोधः'।
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