सन १९५४-५५ में श्री कन्हैयालाल मुनशी जी ने अपनी संस्कृत विश्व परिषद का कुछ दायित्व संभालने के हेतू मुझे बुलाया था। इस काल में कुछ महिनों तक मेरा निवास बंबई में भारतीय विद्याभवन में रहा ।
'भारतीय विद्या' का संक्षिप्त परिचय देनेवाली हिन्दी पुस्तक लिखने की सूचना मुझे भवन के प्रमुख कार्यकर्ता श्री जयत्तकृष्ण हरिकृष्ण दवेजी के द्वारा उन्होंने दी। कुछ प्रमाणभूत ग्रंथों के आधार पर मैने अपेक्षित हिन्दी पुस्तक लिखने का प्रयास किया। नागपुर में मराठी के साथ हिन्दी का व्यवहार काफी प्रमाण में होने के कारण मुझे हिन्दी का परिचय अवश्य था। फिर भी विद्यालय में विधिपूर्वक हिन्दीका अध्ययन न होने के कारण और हिन्दी लिखने का अवसर इसके पहले कभी न मिलने के कारण, मै अपनी भाषा की शुद्धता के विषय में साशंक था। अतः पुस्तककी हस्त-लिखित प्रति मैने राष्ट्रभाषा प्रचार समिती के ज्येष्ठ कार्यकर्ता श्री हृषीकेश शर्माजी के साथ बैठकर १९५६ में पढी । बाद में इसके प्रकाशन का योग नही आया । १९५९ में नागपुर के युगधर्म के संपादक श्री सत्यपाल पटाईत जी ने दृढ मित्रता के कारण इस हस्तलिखित को एक प्रदीर्घ लेख माला के रूप में रविवासरीय अंकों में प्रकाशित किया । मेरी प्रार्थना को मानकर मेरी भाषिक अशुद्धियाँ सुधारनेका प्रयास किया । इस प्रकार शुद्धीकरण होने परभी मेरे निजी भाषिक प्रमाद बाकी रहना स्वाभाविक है ।
युगधर्म में लेखमाला प्रकाशित होने के बाद भी पुस्तक प्रकाशन की संभावना नहीं दीख रही थी। भारतीय विद्याभवन की शाखा अॅड्. मधुसूदनजी मोर के प्रयत्नसे नागपूर में स्थापित होकर उसका कार्य बढ़ने लगा । तम्र नागपुर शाखा की प्रकाशन योजना के अन्तर्गत इस पुस्तक का प्रकाशन संभब हुआ । 'भारतीय विद्या' यह विषय अनन्त है। उसे चाहे जितना बढाया जा सकता है। इस विस्तीर्ण विषय का संक्षेप में निवेदन करने में कई दोष आ सकते हैं। विशेषज्ञ पाठकों को इस संक्षिप्त पुस्तक में वे अवश्य दिखाई देंगे । तथापि प्राचीन भारतीय विद्या के संबंधमें सीमित जिज्ञासा रखने वाले पाठकों का इस पुस्तक से समाधान हो इतनी ही अपेक्षा है।
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