द शकों से वन में यह विचार था कि जम्मू कबीर एवं लद्दाख की प्राचीन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत तथा एक आयत ही समृद्ध संस्कृति को ऐतिहासिक विमर्श की मुख्य धारा में उथित स्थान नहीं दिया गया। इस विचार को केंद्र में रखते हुए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के द्वारा जम्मू कामीर एवं लद्दाख, मांस्कृतिक निरंतरता विषय पर एक शोधपरक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम, मैं भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (ICAR) के अपने महयोगी सदस्यों को उनके बहुमूल्य मार्गदर्श समर्थन और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद देना चाहता है। साथ ही, परिषद् के कर्मठ अधिकारियों डॉ. मो. नौशाद अली, डी. दूम सिंह, की प्रवीण कुमार शर्मा और मो. नाजिम, जो कि प्रारम्भ से ही इस परियोजना से जुड़े रहे हैं, को साधुवाद देता हूँ। इनके कठिन परिचय और निःस्वार्थ समर्पण के बिना यह पुस्तक वर्तमान स्वरूप नहीं ले पाती। डॉ. ओम जी उपाध्याय और डॉ. राजेश कुमार को भी इस परियोजना से जुड़ने के लिए धन्यवाद देता है।
प्रो. शोनालीका कौल, प्रो. ललित गुमा, प्रो. सुस्मिता पांडे, प्रो. वसंत शिंदे, डी. बी. आर. मगि, श्री मेष कल्याणसुंदरम और प्रो. जिगर मोहम्मद आप सभी इस विषय के मर्मज्ञों ने प्रदर्शनी की संकल्पना तैयार करने में हमारा मार्गदर्शन किया और इस पुस्तक की सामग्री को समृद्ध करने के लिए बहुत उदारता से अपने शोध कार्य का योगदान दिया। मैं आप सबके प्रति आभारी हूँ।
इस पुस्तक में इस क्षेत्र के 3000 वर्षों के इतिहास को सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है और इस कार्य हेतु शोध के विविध और विशिष्ट क्षेत्रों से सहयोग एवं सूचना ती गई है। विषय-वस्तु और कार्य योजना को अंतिम रूप देने के लिए देश के प्रतिक्षित विषय विशेषज्ञों के साथ अनवरत बैठकें और संवादायक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रो. कपिल कपूर, श्री जवाहरलाल कौल, प्रो. के. एन. पंडित, प्रो. हीरामन तिवारी, डी. मीनाक्षी जैन, डी. के. के. मोहम्मद, प्रो. रजनीश मिश्रा, प्रो. अमरजीव लोचर और श्री आशुतोष भटनागर शामिल हैं। निश्चित रूप से, हम इन बैठकों में हुए विचार-विमर्श और इन विद्वानों के मार्गदर्शन से बहुत लाभान्वित हुए हैं।
मैं डी. प्रवीण कुमार शर्मा, डी. ओ.पी. क्षा और सुत्री कमी मलिक को धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक की सामग्री का अंग्रेजी भाषा से हिंदी में अनुवाद किया। साथ ही, प्रदर्शनी और इस पुस्तक की साज-सज्जा के लिए श्री नीरज सहाय और उनकी टीम को धन्यवाद देता हूँ। मैं विशेष रूप से लेफ्टिनेंट कर्नल युवराज मलिक, निदेशक, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी), नई दिल्ली के प्रति आभारी हूँ, जिन्होंने मूल्यपरक मार्गदर्शन और यथेष्ट सहयोग प्रदान किया। एनबीटी ने न केवल नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2024 में जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख पर केंद्रित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् की प्रदर्शनी का शुभारंभ किया, बल्कि प्रस्तुत पुस्तक का प्रकाशन भी किया है।
डी. अजमल शाह, निदेशक, मध्य एशियाई अध्ययन केंड संग्रहालय, काभीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर और इसी केंद्र से श्री बिलाल शाह ने इस दुरूह कार्य को सम्भव करने में सराहनीय योगदान दिया है। संग्रहालय में उपलब्ध शोध सामग्रियों तक हमारी पहुँच को सुलभ करने के साथ ही हमें अन्य महत्वपूर्ण स्रोतों के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया। श्री राहुल भोला ने शोध सामग्री और परिक्षेत्र में उपलब्ध मंदिर स्थापत्य के विषादि उपलब्ध कराने में महती योगदान दिया है।
मैं ही अमलेश मिश्रा, निदेशक और डॉ. नरेंद्र यादव, उपनिदेशक इतिहास प्रभाग, रक्षा मंत्रालय और सुश्री सीमा मेरा, उप-क्यूरेटर, गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी, चचंडीगढ़ को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने महत्वपूर्ण चित्रादि उपलब्ध कराने के साथ ही अपने बहुमूल्य सुझाव साझा किए।
इस पुस्तक को वर्तमान स्वरूप प्रदान करने के लिए अनेक संग्रहालयों, पुस्तकालयों, शोध केंद्रों और निजी संग्रहों से शोध सामग्री ली गई है। मैं, विशेष रूप से, एस. पी. एस. संग्रहालय, श्रीनगर, डोगरा कला संग्रहालय, जम्मू प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय, नई दिल्ली भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली: फोटो प्रभाग, सूजनरा भवन, नई दिल्ली, भारत कला भवन, वाराणसी पंजाब राज्य अभिलेखागार, पटियाला, भारतीय वैश्चिक परिषद नई दिल्ली महाराजा रणसंग्रहालय, अमृतसर और डॉ. हा सिंह पंजाबी रिपनेस लाइब्रेरी, पटियाला के कर्मचारियों के प्रति आभारी है।
'ज म्मू कश्मीर एवं लद्दाखः सांस्कृतिक निरंतरता' विषय पर एक प शोधपरक प्रदर्शनी का आयोजन भारतीय इतिहास अनुसंधान क परिषद्, नई दिल्ली द्वारा विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान, नई दिल्ली वि में किया गया। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 10 फरवरी, 2024 को हुआ था। जम्मू कश्मीर एवं को समर्पित इस प्रदर्शनी के आयोजन का विचार इस तथ्य पर आधारित है कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के उद्गम का अधिकांश भाग प्राचीन कश्मीर की भव्यता और श्रेष्ठता से जुड़ा हुआ है। हजारों वर्षों से साधु, संत, महात्मा और आमजन तीर्थयात्री के रूप में भारत के विभिन्न स्थलों का भ्रमण करते रहे हैं, जहाँ कश्मीर एक प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र रहा है।
कश्मीर के प्रारम्भिक इतिहास से अवगत हो जाने के बाद भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया में इस क्षेत्र के योगदान को जानना और समझना आसान हो जाएगा। लगभग दो दशक पहले जब मैं एक पुस्तक के लिए जम्मू कश्मीर के 1947 के बाद के इतिहास पर काम कर रहा था, तब मैंने महसूस किया कि उस समय के राजनैतिक और ऐतिहासिक विमर्श में इस परिक्षेत्र के प्राचीन इतिहास के लिए वस्तुतः कोई जगह ही नहीं थी। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस परिक्षेत्र से आत्मसात् होने के लिए यहाँ के प्राचीन इतिहास को जानना अत्यंत आवश्यक है। लम्बे समय से यह विचार मेरे मन को कुरेद रहा था, किंतु जब मुझे भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष पद का दायित्व प्राप्त हुआ तो मुझे इस विचार को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला। परिषद् के सहकर्मियों एवं अन्य सम्बंधित विद्वानों से इस सन्दर्भ में विस्तार से चर्चा हुई और उनकी जो सक्रिय प्रतिक्रिया आई वह अत्यंत ही प्रोत्साहित करने वाली थी। इस पुस्तक में जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख के गौरवशाली इतिहास को इस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है कि यह पुस्तक विद्वानों, इतिहासकारों और विशेषज्ञों के साथ-साथ आमजन के लिए भी समान रूप से सुग्राह्य हो सके। सात खण्डों में विभाजित यह पुस्तक इस परिक्षेत्र के तीन हजार साल से भी अधिक प्राचीन इतिहास को उद्घाटित करती है। पुस्तक में दिए गए प्रत्येक चित्र को बहुत ही सावधानीपूर्वक चयनित किया गया है, जो एक विशेष कालखण्ड, उसके महत्व और भारतीय इतिहास के वृहद् फलक पर पर उसके योगदान को प्रतिबिम्बित करते हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (13645)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (730)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2087)
Chaukhamba | चौखंबा (3184)
Jyotish (ज्योतिष) (1563)
Yoga (योग) (1166)
Ramayana (रामायण) (1336)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24710)
History (इतिहास) (9024)
Philosophy (दर्शन) (3633)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist