म्मृति परिरक्षण मानव जाति की आदिम प्रवृत्ति रही है । प्राचीन शिलाखण्डों पर अंकित रेखाचित्र, गुफा और कन्दराओं की दीवार पर उत्कीर्ण चित्रावली, देवालयों में स्थापित मंजुल प्रतिमाएँ, गगनचुम्वी अट्टालिकाएँ और भव्य राज प्रासाद तथा काल के निर्मम थपेड़ों से क्षत-विक्षत भग्न खंडहर प्रभृति सभी कलाकृतियाँ किसी-न-किसी व्यक्ति, विचार, भाव अथवा घटना की स्मृति को अपने आँचल में समेटे हुए हैं। वाह्य जगत् के नानाविध दृश्यप्रपंच में अनुम्यूत ग्मृतियों का एक छोर आपके कमरे में भी प्रवेश करता है, जब हम चाहे अनचाहे ऐसी म्मृति-छवियों की प्रतिकृति, पेटिंग, तसवीर इत्यादि को दीवारों पर टाँग देते हैं। गौर से देखा जाय तो स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी लोकयात्रा के पाथेय रही हैं। विकास-पथ के अनिवार्य अंग । इसलिए स्मृति-अर्चना मात्र यादों का एलवम नहीं है जो मन को हर्षित और आँखों को तृप्ति देती है, अपितु वे अंतर्जगत् को परितः उद्वेलित-उप्रेरित करती हैं, कल्पनाशील बनाती हैं तथा चिन्तन की भूमि प्रदान करती हैं। दरअसल, समय का धूप-छाँही रंग लिए ये स्मृति-कण मानवीय सांस्कृतिक वैभव एवं उत्कर्ष के निदर्श हैं। और इनकी व्याप्ति वास्तुकला, मूर्तिकला, संगीतकला, नृत्यकला इत्यादि में भी विच्छुरित है ।
स्मृत्यर्चन की प्रक्रिया में कृतित्व और कृतिकार दोनों घुलमिल कर एकमेक हो जाते हैं। वाणी और व्यक्ति, अक्षर तथा कलमकार, कैन्वस और रंगसाज "वागार्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिप्रत्तये" सदृश प्रतीत होते हैं। यह कोरा सिद्धान्त नहीं, बल्कि अनुभवगम्य तथ्य है। क्या श्रीरामचरितमानस का पारायण करते समय गोस्वामी जी की छवि सहज भाव से कौंध नहीं उठती? क्या मेघदूत या कुमारसम्भव के अनुशीलन-क्रम में महाकवि कालिदास प्रच्छन्न रूप से जीवंत नहीं हो उठते ? जगनिक का आल्हखण्ड, चन्दबरदाई का पृथ्वीराजरासो तथा कविवर भूषण का शिव-राजभूषण, शिवा बावनी और छत्रशाल दशक तो स्वयं में स्मृति-काव्य हैं। ऐसे अन्य और कई दृष्टांत दिये जा सकते हैं। आलोचकगण इसे चरित काव्य के नाम से वर्गीकृत करते हैं। रस की दृष्टि से, भले ही, इन रचनाओं में वीर रस की प्रधानता हो अथवा श्रृंगार रस का सम्मिश्रण, किन्तु इन कृतियों की आत्मा निश्चित रूप से स्मृतिमूलक है। हाँ, यह दीगर वात है कि भारतीय मनीषा कर्तृत्व प्रधान रही है. कृतिकार गौण । ऐसा इसलिए कि आत्म गोपन हमारा सांस्कृतिक वैशिष्ट्य रहा है। मगर कर्तृत्व का सम्पूर्ण ज्ञान, रसास्वाद और आकलन कर्त्ता को दरकिनार कर न तो वांछनीय है और न संभव ।
ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी साहित्य में दिवंगत या जीवित शब्दकर्मियों के प्रति स्मृति-तर्पण की परम्परा यद्यपि समृद्ध नहीं है, तथापि समय-समय धूर्जटी साहित्यकारों की पुण्यस्मृति में स्मारक ग्रंथ, स्मृति-ग्रंथ और अभिनन्दन ग्रंथ के रूप में आक्षरिक नैवेद्य अर्पित किये गए हैं। मगर ऐसी कृतियों का अपेक्षित मूल्यांकन और विधागत मान्यता अब भी शेष है। साहित्यिक दायित्व की दृष्टि से जिन महनीय सरस्वती-साधकों ने अपनी हड्डी रगड़-रगड़ कर राष्ट्रभारती के भाल को चन्दन-चर्चित किया है, रक्त की प्रत्येक बूँद माँ की सेवा में बहा दी है, अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा कर साहित्य की श्रीवृद्धि में तन-मन-श्रम की आहुति दी और जिन्होंने भोग-ऐश्वर्य की तिलांजलि दे राष्ट्र के तिमिराच्छन्न पथ को शब्द-रश्मियों से आलोकित किया है, उनका विस्मरण या समुचित आदराभाव अपराध नहीं तो क्या है ? इस संदर्भ में महीयसी महादेवी जी की वाणी मेरे कर्ण-कुहरों में सदैव गूँजती रहती है- "हमारा देश निराशा के गहन अन्धकार में साधक साहित्यकारों से ही आलोक-दान पाता रहा है। जब तलवारों का पानी उतर गया, शंखों का घोष विलीन हो गया, तब भी तुलसी के कमंडलु का पानी नहीं सूखा और सूर के एकतारे का स्वर नहीं खोया । आज भी जो समाज हमारे सामने है, वह तुलसीदास का निर्माण है। हम पौराणिक राम को नहीं जानते, तुलसीदास के राम को जानते हैं ।
पुण्यश्लोक द्विजजी कीर्तिलब्ध कवि, कथाकार, समालोचक, संपादक और रेखाचित्रकार थे । वाग्मिता के धनी तो वे थे ही और कई "प्रथम" के अधिकारी भी। वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रथम छात्र थे, जिनकी वक्तृत्व कला से अभिभूत होकर प्राचार्य ध्रुव ने अपनी सोने की घड़ी उनकी कलाई में बाँध दी थी । वह कथाकार-सम्राट प्रेमचन्द के प्रथम समालोचक थे और बिहार-हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन की शोध-त्रैमासिकी "साहित्य" के प्रथम संपादक । द्विज जी प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सम्मेलन के द्वादश छपरा-अधिवेशन (13 अप्रैल, 1935 ई.) का सभापतित्व करते हुए पौने दो घंटे तक मौखिक भाषण कर एक अभिनव कीर्तिमान स्थापित किया था । प्रथमता के इस अनुक्रम का साक्ष्य उनकी रचनाओं में भी विद्यमान है । छात्र-जीवन से प्राध्यापकी के प्रथम दौर के मध्य तक मुझे द्विजजी के कई बार दर्शन हुए । जब कभी उनसे मिलने का अवसर मिला, मुझे हर वार प्रतीति हई कि जिन श्रेष्ठ पुरुष को मैं देख रहा हूँ, जिनसे मिल रहा हूँ, वह दूर अथवा नजदीक से एक जैसे हैं। बाहर जो दीख रहा है वही भीतर भी है और जो भीतर है वही बाहर । कहीं कोई छिपाव-दुराव नहीं। बहुधा किसी तसवीर को दूर और नजदीक से देखने में कुछ अंतर आ जाता है, मगर द्विजजी में ऐसी वात नहीं थी। एक वात और । द्विजजी के उठने-बैठने, भाव-भंगिमा, बातचीत इत्यादि क्रियाकलाप में अनूठापन था, साहित्यकता की गरिमा लिये एक असामान्य विलक्षणता । इसलिए मैं अवश भाव से उनकी ओर आकर्षित होता गया। उनकी रचनाओं का पाठक तो मैं अरसा पहले से था ही। बाद के वर्षों में उनके साथ काम करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ । अगर द्विजजी पूर्णियां महाविद्यालय के प्रधानाचार्य नहीं रहे होते तो मुझे दाना-पानी का ठौर-ठिकाना अन्यत्र ढूँढ़ना पड़ता ।
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