प्रस्तावना
दुनिया भर में बेशुमार लोग हाल ही में फैल रही महामारी के प्रतिकूल प्रभावों को झेल रहे हैं। अधिकांश लोग मानसिक उत्पीड़न, बेरोजगारी या फिर किसी-न-किसी विपदा से जूझ रहे हैं, जबकि अन्य को किसी बीमारी ने आ घेरा है। कोई रिश्तों में बेवफाई की टीस से तड़प रहा है तो कोई दफ्तर या व्यवसाय में आर-पार की लड़ाई में व्यस्त है। कोई बुढ़ापे से परेशान है तो कोई सामाजिक भेदभाव से दुखी। कोई बच्चों के विवाह में विलंब से चिंताग्रस्त है तो कोई बैंकों के बड़े कर्ज में डूबा। कोई रात-दिन अदालतों के चक्कर काट रहा है तो कोई हिरासत में उम्रकैद। किसी को कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया है तो अन्यों को ब्लड प्रेशर, शुगर या फिर डायलेसिस के चक्रव्यूह ने आ घेरा है। कोई दिन में आलस्य का शिकार है अथवा कोई रात में नींद न आने से जूझ रहा है। 'महाभारत' के अर्जुन की तरह हम भी आज द्वंद्व और असमंजस में फँसे उचित निर्णय लेने का सामर्थ्य ही खो बैठे हैं। अंतःकरण पर मानो बेचैनी, बेकरारी, द्वेष, ईर्ष्या, काम, क्रोध और भय ने अपनी स्थायी सत्ता सी बना ली है। जीवन में एक के बाद एक विपदा, बुरा समय है कि जाने का नाम ही नहीं लेता। इतने दुःख व परेशानी के बावजूद एक मजेदार पहलू यह है कि महाभारत से लेकर आजतक कुछ भी नहीं बदला है। हमारी ऐसी दयनीय मनःस्थिति कुरुक्षेत्र व महाभारत के समय भी थी, आज भी है और कल भी इसी तरह रहनेवाली है। इस क्रम में हम सभी के लिए सुख व सांत्वना की बात यह है कि श्रीमद्भगवद्गीता में उपर्युक्त समस्त समस्याओं के समाधान कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और कल भी रहनेवाले हैं। मनोविज्ञान की विश्रृंखलता का समाधान श्रीमद्भगवद्गीता में कल भी था, आज भी है और कल भी रहनेवाला है। श्रीमद्भगवद्गीता के तात्त्विक सिद्धांतों पर आधारित इस पुस्तक में उल्लेखित '7 त्रिगुणी सिद्धांत' बिल्कुल साधारण परंतु अत्यंत प्रभावी और शक्तिशाली हैं। मेरा यकीने कामिल है कि इन विधि-विचारों को अपने रोजमर्रा के जीवन प्रयोग में लाने से आप भी मेरी ही तरह इन प्राचीन सिद्धांतों के चामत्कारिक प्रभाव से अवश्य लाभान्वित होंगे। मेरी आपसे प्रार्थना है कि कृपया इस पुस्तक को प्रस्तुत अध्याय-क्रम में ही पढ़ें। सफलता के सिद्धांतों का सारतत्त्व पूर्णरूप से तभी समझ आएगा, जब आप उपर्युक्त सिद्धांत 'रुक जाने की चाह' को परास्त कर 'जीवन की चाह' में निहित विशिष्ट मान्यताओं का संज्ञान लेंगे। हो सकता है कि उपर्युक्त सिद्धांत भाषा व तत्त्व जटिलता के चलते एक बार पढ़ने पर समझ में न आएँ। इसे दो या तीन बार पढ़ने पर तत्त्वसार अवश्य समझ में आएगा। बाकी अन्य अध्यायों की भाषा-शैली आम और सहज है। इस पुस्तक के प्रेरणा स्रोत वस्तुतः वर्तमान सरसंघचालक माननीय मोहन भागवतजी हैं। 7 जून, 2018 को मैं अपने जेल कारावास के दौरान दिल्ली की तिहाड़ जेल में था। जेल में उपलब्ध टेलीविजन पर उस दिन लगभग सभी न्यूज चैनल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मा. मोहन भागवतजी के बौद्धिक का सीधा प्रसारण कर रहे थे। मौका था नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह का। व्याख्यान की कुछ बातों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। मैंने अपने पास ही रखी कॉपी (नोटबुक) और पेन उठाकर मोहनजी के विचार-तत्त्व को लिखना शुरू किया।
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