लेखक परिचय
डॉ. विकास कुमार जन्म 12 दिसम्बर 1986 को झारखण्ड के चतरा जिला अन्तर्गत सिमरिया प्रखण्ड के अमगावी ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। विपरीत और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद अध्ययन एवं अध्यापन कार्य में हमेशा अग्रणी रहे। इन्होंने विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, झारखण्ड से मनोविज्ञान विषय में स्नातकोत्तर एवं पीएच-डी. की उपाधि प्राप्त की। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा में उच्चतम अंकों के साथ पात्रता हासिल की। साथ ही उक्त आयोग द्वारा ही कनिष्ठ एवं बरिष्ठ अध्येतावृत्ति एवं शोधवृत्ति हेतु चयनित किये गए। सम्प्रति स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में बतौर अतिथि व्याख्याता अपना योगदान दे रहे हैं। इनकी प्रथम कहानी 'भ्रूणहत्या' 6 फरवरी 2004 को दैनिक जागरण, राँची से प्रकाशित हुई। तत्पश्चात् आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, संवदिया, ककसाड़ अक्षरपर्व, परिकया, आश्वस्त, आम आदमी, दिल्ली प्रेस, पहचान यात्रा, दलित साहित्य, पृथ्वी और पर्यावरण तथा रांची एक्सप्रेस आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित हुई और आकाशवाणी हजारीबाग से प्रसारित भी हुई। इनका न सिर्फ हिन्दी साहित्य में, बल्कि मनोविज्ञान में भी कई शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित हुए और अन्तर्वैयक्तिक आकर्षण मापनी का निर्माण भी किया।
पुस्तक परिचय
'जीवन का यथार्थ जीवन की सत्य घटनाओं का कारुणिक प्रस्तुतिकरण है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पाठकों को कुछ-न-कुछ संदेश प्रेषित करती है। इस संग्रह की पहली कहानी 'भ्रूण हत्या' महिलाओं की विवशता और पुरुष की तानाशाह मानसिकता का परिचय कराती है। दूसरी कहानी 'जख्म' एक गंवई विद्यार्थी की कारुणिक दास्तान है। तीसरी कहानी 'जीवन का यचार्य' एक वृद्ध व्यक्ति की व्यथा कथा है। 'आज का यथार्थ वस्तुतः वर्तमान में शिक्षित युवक की कहानी है जो दर-दर की ठोकरें खाता है। 'मोबाइल वाला' एक प्रेम कहानी है, जिसमें प्रेमिका के हिस्से मौत ही आती है। 'अंतिम ख्वाहिश' दरअसल विवाह मंडप से उठी अविवाहित युवती की मार्मिक दास्तान है। 'बेचारा' एक बच्चे की व्यथा कथा है, जिस पर माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ जाता है। 'भूमिहीन' एक मजदूर की कहानी है। 'अंत' मुम्बई में एक गंवई युवक के संघर्ष की कहानी है। 'विधवा' एक औरत की मार्मिक व्यथा-कथा है। 'रखवाला' एक ऐसा पात्र है, जो दुनिया के शीक-मौज से बेखबर पेट के खातिर दार्शनिक बन बैठा है। 'यह कैसा इंसाफ है' एक किन्नर की दुःख भरी कहानी है। 'फ्रॉड' एक ऐसी कथा है, जिसमें एक युवक झूठ का शिकार हो जाता है। 'हीरो न बनने की मुसीबत' एक संघर्षरतः युवा की दुःखभरी कहानी है। 'अनु न ही.... अनु सिंह' एक अर्द्ध-मनोरोगी युवती की दास्तान है। 'एक जनवरी' झुठी शुभकामनाओं पर आधारित कहानी है। 'मौन-प्रेम' शिक्षक और छात्रा के बीच अव्यक्त प्रेम कहानी है। 'सरबतिया' एक भोली-भाली लड़की से वैश्या बनने की कहानी है। 'पार्लर वाली भौजी' स्वरोजगार करने वाली महिला की दुःखभरी दास्तान है... और सबसे अंत में 'विश्वजीत' एक असफल प्रेम की कहानी है। इस तरह इस पूरे संग्रह में समाज के विभिन्न पक्षों का मार्मिक चित्रण किया गया है।
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