यह समाजवाद का युग है। इस युग में आध्यात्मिक ज्ञान को भी केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के लाभ के लिए भी प्रयोग करने की चर्चा है। आज यह प्रश्न सभी पूछते हैं कि – आध्यात्मिक ज्ञान समाज की समस्याओं को हल करने में क्या मदद दे सकता है?
पुनश्च, आज लोग इस बात को भी समझ चुके हैं कि व्यक्तिगत मुक्ति के लिए समाज-सेवा को छोड़ना भी एक तरह से कर्त्तव्य-विमुख होना ही है। अतः आज लोग ऐसे जीवन-दर्शन को ऊंचा नहीं समझते जो मनुष्य को जंगल में अलग-थलक बैठ, आंखे मूंदकर साधना साधने की प्रेरणा दे, बल्कि आज ऐसे योग की माँग है, ऐसी साधना की खोज है, ऐसे जीवन-दर्शन की आवश्यकता है जो गृहस्थ को सुखी बनाये, कार्य-व्यवहार में लगे, व्यक्ति में खुशी और उल्लास भर दे तथा उसके जीवन से तनाव, मन-मुटाव तथा दुःख दूर कर दे।
यह जो पुस्तक है, यह आज के युग की माँग को पूरा करती है। यदि गहराई से देखा जाय तो आज की समस्त समस्याओं का मूल कारण कोई-न-कोई मानसिक विकार ही है। उदाहरण के तौर पर तीव्र गति से बढ़ती हुई जन-संख्या, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक दरिद्रता, बे-रोज़गारी इत्यादि समस्याएं उग्र रूप में विद्यमान हैं, का मूल कारण की उत्तेजित काम-वासना ही है। दो देशों या दलों में लड़ाई और मज़दूरों अथवा युवकों के द्वारा तोड़-फोड़ का मूल कारण क्रोध ही है। आर्थिक शोषण अथवा उसको लेकर मिल-मालिकों तथा मज़दूरों में मनमुटाव, हर आये दिन हड़ताल, जिससे कि देश का उत्पादन कम होता है और मंहगाई बढ़ती है, का मूल कारण अमीरों की लोभ-वृत्ति तथा ग़रीबों की समाधान-विधि में क्रोध एवं हिंसा है। जब लोग अपनी जाति, अपनी पुस्तकों तथा देश का मिथ्या अहंकार करने लगते हैं या उनके प्रगाढ़ मोह में पड़ जाते हैं कि - सत्य को देखने के लिए आँखें या सुनने के लिए कान भी बन्द कर देते हैं और नई बात सोचने के लिए बुद्धि को भी ताला लगा देते हैं तो सम्प्रदायों में दंगे और देशों में झगड़े होते हैं तथा व्यक्ति को सत्य से वन्चित रहना पड़ता है। इसी प्रकार, जब किसी देश के लोग स्फूर्ति, कार्य-क्षमता तथा कर्त्तव्य-परायणता को तिला-न्जलि देकर आलस्य में पड़ जाते हैं तो वहाँ दरिद्रता का साम्राज्य छा जाता है और दूसरे देश उन पर आर्थिक अथवा राजनीतिक शासन करने लगते हैं।
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