जब से मनुष्य इस संसार में आया है, तब से विचारशील लोगों को आत्म जांच की समस्या से जूझना पड़ा है। इस विषय का सार व्यासदेव ने योग- सूत्र (२/३९) के भाष्य में इस प्रकार व्यक्त किया है- मैं कौन था? मैं क्या था? यह शरीर क्या है? यह कैसे बना? मैं क्या बनूंगा और भविष्य में यह कैसा होगा?
उपरोक्त इस आत्मभाव जिज्ञासास्वरूप जन्मकथन्ता से ही ऋषियों ने सनातन धर्म की कर्मवाद एवं जन्मान्तरवाद प्रवर्तित हुआ है। सनातन धर्म में जन्मान्तर एवं कर्मवाद दो प्रमुख स्तम्भ स्वरूप हैं। जन्मान्तर के मूल में है कर्मवाद। स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उठता है इह देह धारण क्यों होता है। इसके उत्तर में महर्षि पतजंलि ने (योगसूत्र २/१३) बताया-क्लेश मूलक कर्म के फल स्वरूप जाति (देहधारण रूप जन्म), आयु (देह की स्थितिकाल), भोग (सुख और दुख) होता है। क्लेश का कारण क्या? क्लेश के विषय में महर्षि पतजलि ने (योगसूत्र २/२४) बताया- अविद्या ही समस्त क्लेश का मूल कारण है। अविद्या के कारण ही जन्म-मृत्यु प्रवाहरूप संसार चक्र घूम रहे हैं छय और (दण्ड युक्त) होकर, यथा-राग-द्वेष, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म। (योगभाष्य-४/११)।
हमारे देश के प्राचीन ऋषियों ने आश्रमों के अनुकूल वातावरण में इस समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयास किया है। उन्होंनें अपनी व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रयोगशालाओं में कठोर आत्म-अनुशासन और गहन ध्यान के माध्यम से जो खोजा, वह वेदों, उपनिषदों, गीता, पुराणों आदि मे अच्छी तरह से वर्णित है। शास्त्रों मे सुझाये गये उपचारात्मक उपाय अब दुनियां भर के लोगों के लिए उपलब्ध है। ये सच्चे साधकों को शाश्वत शान्ति अर्थात मुक्ति के मार्ग पर मार्गदर्शन करने के लिए वास्तविकता में दुख मुक्ति का स्तम्भ है। कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत मुक्ति की खोज मे लगे साधकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
ऋषियों ने इस मार्ग को अंत तक अपनाया और माना कि व्यक्ति का कर्म और अगला जन्म एक दूसरे के पूरक हैं। कर्म के लिए व्यक्ति को एक उपयुक्त भौतिक शरीर की आवश्यकता होती है, जो पिछले जन्मों में कर्मों का संचित अव्यक्त संस्कारों द्वारा निर्धारित होता है। जो आध्यात्मिक साधक इस मार्ग पर आगे बढना चाहता है, उसे श्रद्धा (श्रद्धापूर्ण विश्वास), वीर्य (ऊर्जा और धैर्य) आदि गुणों से परिपूर्ण होना चाहिए। जैसा कि ऋषि पतंजलि ने अपने योगा सूत्र (२/२०) में वर्णित किया है। कर्म ओर पुनर्जन्म पर दो पूर्वोक्त सिद्धांतों का ज्ञान इस विषय में सहायक होगा।
सांख्य योगाचार्य स्वामी हरिहरानन्द आरण्य पूर्वी और पश्चिमी दोनों दर्शनशास्त्र में पारंगत थे और साथ ही आधुनिक विज्ञान में भी। लेकिन मूल रूप से और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वे उच्चतम श्रेणी के आध्यात्मिक विशेषज्ञ थे, जो प्राचीन ऋषियों की याद दिलाते हैं। कर्मतत्त्व (पहली बार १९३१ में प्रकाशित) उनकी अंतिम प्रमुख रचना थी। तभी से इसे बंगाली पढने वाले लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता रहा है। जिससे प्राचीन ऋषियों की शिक्षाओं को एक महत्वपूर्ण विषय पर विज्ञान की खोजों के साथ सफलतापूर्वक संयोजित करने के कारण नवीनता आई और पाठक पूर्ण रूपेण लाभान्वित हुआ। लेखक के अपने शब्दों कारण और कार्य का नियम आधुनिक विज्ञान का स्वीकृति आधार है। कर्म के सिद्धांत में भी यही बात है। अकाट्य तर्क के आधार पर इसमें अंधविश्वास, भाग्य या अज्ञेयवाद के लिए कोई स्थान नही है!
मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस संस्करण को व्यापक हिन्दी पढने वाले पाठकों द्वारा भी समान रूप से सराहा जायेगा। मुझे आशा है कि उनमें से कुछ श्रद्धालु जिज्ञासु पाठकों को नियमित आधार पर आध्यात्मिक अभ्यास शुरू करने के लिए प्रेरणा मिलेगी। जो कि श्रद्धेय लेखक के सभी लेखन के पीछे ये मूल भाव था। मैं केवल यही कह सकता हूं कि कर्म और पुनर्जन्म के नियमों की अच्छी समझ निश्चित रूप से एक आकांक्षी के लिए उसकी आध्यात्मिक खोज के सभी चरणों में सहायक बनेगी।
वर्तमान में विज्ञान में बहुत सारे आविष्कार हुए, जिससे पुराने मतवाद में परिवर्तन आया परन्तु प्राचीन ऋषियों के मतवाद मे कोई परिवर्तन नही आया। आधुनिक विज्ञान क्रमशः ऋषियों के मतवाद को बहुत कुछ स्वीकार करता है। अतः आदरणीय लेखक के प्रति मतभेद होने पर भी उनके लेखन मे कोई परिवर्तन नही किया गया है। ऐसी आशा और विश्वास है कि पाठकवृन्द इस कर्मतत्त्व का अध्ययन कर आत्मोन्नति की और बढ़ेंगें।
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