लेखक परिचय
एम.वी.आर.शास्त्री लोक जागरण का अलख जगाने एवं सामाजिक रूपान्तरण की प्रक्रिया को त्वण प्रदान करने वाले प्रख्यात सम्पादक एम.वी.आर.शास्त्री ने अनेक अज्ञात एवं अनछुए विषयों पर प्रामाणिक एवं संग्रहणीय कृतियाँ दी हैं जिनके अध्ययन से लेखक की मौलिक प्रतिभा की ऊर्जा से पाठक ऊष्णता प्राप्त करता है और कई अवसरों भर सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक चेतना के स्तर पर पाठक अपने ज्ञान की श्री वृद्धि करने में गौरव का अनुभव करता है। तेलुगु भाषा में पत्रकारिता जगत् को समृद्ध करने वाले ईनाडु में एम.वी.आर. शास्त्री ने तेरह वर्ष तक सम्पादन के क्षेत्र में कई पदों में सफलतापूर्वक कार्य किया फिर घनीभूत अनुभव सम्पदा ले आप "आन्ध्र सभा दैनिक" में उप सम्पादक के पद पर प्रतिष्ठित हुए, चार वर्ष के उपरान्त दिसम्बर 1994 में आप आन्ध्रभूमि दैनिक के सम्पादक बने। नौ वर्ष से अधिक समय तक लोकप्रिय स्तम्भ "उन्नमाटा" अर्थात् "जो बात है" और छह वर्ष से अधिक समय तक "वीक पॉइन्ट" अर्थात् "कमज़ोर कड़ी" निपुणता से लिख रहे हैं। तीन दशक में अपने सैकड़ों सम्पादकीय अग्रलेख तथा ललित निबन्ध लिखे हैं- कश्मीर कथा के अतिरिक्त उन्नमाटा (जो बात है) एवं एदी चरित्रा (इतिहास कहाँ है?) आपकी बहुचर्चित कृतियाँ हैं।
पुस्तक परिचय
कश्मीर - 'पृथ्वी पर स्वर्ग', की एक विलक्षण और अद्भुत विशेषता है, उसे सारे देश ने प्यार दिया। कश्मीर के प्रति पं. जवाहरलाल नेहरू का असीमत प्रेम था। नेहरू के बाद यदि किसी में कश्मीर प्रेम दिखा तो अटलबिहारी वाजपेयी में। कश्मीर के प्रति अटूट प्रेम है, हम सबका पर समस्या और अधिक जटिल हो गयी। उग्र आतंकवादियों में जिस आत्मविश्वास की कमी आ रही थी वाजपेयी शासन में उसे पनपने का मौका मिला, बसों, रेलगाड़ियों में उन्होंने बम विस्फोट किया, दहशत फैला निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारने का साहस प्रगति कर गया। सीधे सैनिक छावनियों पर, खुले आम आक्रमण करने में भी वे सफल हुए। और तो और लाल किले एवं सर्वप्रभुत्व सम्पन्न सार्वभौमिकता की प्रतीक भारतीय संसद पर भी हमला करने पर वे आमादा हो गए। उन्हें कुचलने की बजाय उग्रवादियों के नेताओं से बातचीत का सिलसिला भी चला। नागरिक उड़ान भर रहे वायुयान को आँखों के सामने ही अपहृत कर ले जाते देखकर देशद्रोहियों और विदेशी अभिकर्ताओं से अनुनय-विनय, कर उनकी माँग के अनुसार क़ैदियों को छोड़कर अपने अपहृतों को सुरक्षित छुड़वाने का कृत्य भी हुआ। कारगिल पर आक्रमण एक व्यूह रचना का अंग था- सैनिकों का वहाँ पहुँचना, मुजाहिदीनों का चयन कर उन्हें विशेष प्रशिक्षण, नियंत्रण रेखा पर हेलीपेड का बनना, बंकरों का निर्माण होना, राशन, हथियार, गोला बारूद का भण्डारण तथा मश्को घाटी, द्रास, कक्सार, बतालिक सेक्टर में पाकिस्तानी सैनिकों से सम्पर्क हेतु केबुल संचार नेटवर्क की व्यवस्था के बाद ही हुआ। उपर्युक्त कार्यवाहियों का हमें पता ही नहीं चला, फिर एक पक्षीय युद्धविराम की घोषणा और पाकिस्तानी सैनिकों को सुरक्षित वापस लौटने का अवसर दिया जाना सम्भवतः अमरीकी दबाव में ही हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी नोबल शान्ति पुरस्कार की आकांक्षा में मुशर्रफ से आगरा शिखर सम्मेलन, लाहौर बस यात्रा कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ को गले लगाकर शान्ति और सद्भाव की बहाली के लिए पाकिस्तान पर विश्वास करते रहे। ज़रूरत है 22.2.1994 को संसद द्वारा पारित प्रस्ताव को क्रियान्वित करने की। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त कर वहाँ के निवासियों को भी राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में मिला कर गौरवान्वित होने का अवसर दिया जाए ताकि भारतीय नागरिक समस्त भारत की तरह जम्मू-कश्मीर में निश्चिन्त होकर निवास कर सकें, जमीन, जायदाद खरीद सकें, व्यापार, कर सकें, उद्योग चला सकें, सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें तभी वस्तुतः कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग सिद्ध हो सकेगा।
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