भारतीय काव्यशास्त्र की सम्पन्नता विश्वविश्रत है। इसकी जैसी प्राचीन, सुदीर्घ और समृद्ध परम्परा संसार की अन्य भाषाओं के साहित्य में अनुपलब्ध है। आज से शताब्दियों पूर्व भारत के साहित्य-मनीषियों ने अतलस्पर्शी मेवा एवं क्रान्त दर्शी दृष्टि द्वारा सस्कृत काव्य-कोष को ऐसे बद्वितीय रत्न प्रदान किए जो अन्यत्र अप्राप्य हैं। इनमें से एक अलंकार-विवेचन है जो भारतीय साहित्य प्रमाताओं की मौलिक उद्भावना का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
काव्य मीमांसाकार राजशेखर ने लिखा है कि अलकार उपकारक होने से अलंकारशास्त्र सप्तम् अङ्ग वेदाङ्ग है-उपकार करवादलंकारः सप्तममङ्गम् इति याया वरीयः । अपने इस कथन को और स्पष्ट करते हुए राजशेखर ने बतलाया है कि अलंकारशास्त्र उस विचार पुञ्ज की संज्ञा है जो पञ्जदश विद्या-स्थान काव्य-तत्व का शासन करता है-सकल विद्यास्थानकायतन पञ्जदशं काव्यं विद्यास्थानम् । अर्थात् अलंकारशास्त्र काव्य की उन विविध आलोचनाओं का नाम है जिनके द्वारा काव्य के गुण-दोषों का ज्ञान होता है। इस विवेचन से स्पष्ट ज्ञात होता है कि भारतीय काव्यशास्त्र की प्रारम्भिक भवस्था में अलंकारशास्त्र शब्द का प्रयोग साहित्यालोचन के व्यापक अर्थ में काव्यशास्त्र, साहित्यशास्त्र, मालोचनाशास्त्र, समीक्षाशास्त्र आदि के लिए होता था. किन्तु काव्यालोचन के ये अभिधान अलंकार-शास्त्र की तुलना में मध्ययुगीन और अवान्तरकालीन है। अलंकारशास्त्र शब्द के प्रयोग की प्राचीनता और लोकप्रियता का प्रमाण है प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थों के नाम । भामह के ग्रन्थ का नाम है काव्यालंकार और उद्भट के ग्रन्थ का अभिधान है काव्यालंकार-सार-संग्रह। इसी प्रकार वामन तथा रुद्रट के ग्रन्थों के नाम भी काव्यालंकार हैं। इन समस्त ग्रन्थों में काव्य के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों का विवेचन किया गया है, केवल अलंकारों का नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रारम्भ में काव्य के समस्त शोभाधायक एवं सौंदर्यविधायक तत्वों को अलंकारशास्त्र के अन्त-गेत लिया गया और इनमें अलंकारों को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया गया। इससे काव्य में अलंकारों की महत्ता सिद्ध होती है और आज भी काव्य में अलंकार-प्रयोग का महत्व कम नहीं हुआ है।
काव्यालोचन के विविध अभिधानों में 'क्रियाकल्प' सर्वाधिक प्राचीन है। क्रियाकल्प का पूरा नाम है 'काव्यक्रियाकल्प' अर्थात् काव्यक्रिया की विधि या काव्य-शास्त्र । वात्स्यायन ने क्रियाकल्प का उल्लेख कामशास्त्र में चौंसठ कलाओं के अन्तर्गत किया है। वाल्मीकि रामायण में भी इस शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। वाल्मीकि ने राम की सभा में उपस्थित लवकुश गायन के श्रोता विद्वानों का उल्लेख किया है जिनमें क्रियाकल्प विद्वान भी उपस्थित थे क्रियाकल्पविदश्चैव तथा काव्य-विदो जनान् । मध्य युग में काव्यशास्त्र के लिए साहित्यशास्त्र शब्द का प्रयोग होने लगा। राजशेखर ने सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग शास्त्र के लिए किया। राज शेखर ने इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है- शब्दार्थ योर्यया वत्ससहभावेन विद्या साहित्य विद्या। रूय्यक के 'साहित्यमीमांसा' और विश्वनाथ के 'साहित्य-दर्पण' ने इस अभिधान को लोकप्रिय बनाया। पण्डितराज जगन्नाथ के ग्रन्थ 'रस-गङ्गाधर' के नाम से ज्ञात होता है कि उन्होंने काव्यशास्त्र के व्यापक अर्थ में रस शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु यह मत प्रचलित नहीं हो सका ।
कालान्तर में काव्यालकारशास्त्र अभिधान दो वर्गों में विभक्त हो गया-काव्यशास्त्र और अलंकारशास्त्र । काव्यशास्त्र साहित्य लोचन के लिए प्रयुक्त होने लगा और बलकारशास्त्र नाम का प्रयोग आलोचनाशास्त्र की एक विधा विशेष के लिए किया जाने लगा। इस प्रकार अलकारशास्त्र के अर्थ विस्तार का अर्थ सक चन हो गया और अलंकार शब्द का यही संकुचित अर्थ आधुनिक काल में प्रचलित एव मान्य है।
प्रस्तुत पुस्तक दीर्घ कालावधि में भिन्न-भिन्न समय में लिख गए अलंकार सम्बन्धी मेरे निबन्धों का संग्रह है। प्रकाशन के पूर्व इनमें मैंने यत्र-तत्र कतिपय संशोधन-परिवद्धन किए हैं। प्रतिपाद्य विषय को व्यवस्था प्रदान करने के लि। यद्यपि मैने इन निबन्धों में एक पूर्वा पर क्रम निर्धारित करने का प्रयत्न किया है। तथापि सम्भव है पाठकों को पुस्तक में किञ्चित क्रमबद्धता की कमी का अनुभव हो, अनियत लेखन की तो यह स्वाभाविक परिणति है, किन्तु पुस्तक में आद्यन्त कहीं भी विषय-विवेचन की एकरूपता को क्षति नहीं पहुंची है। इन निवन्धों के लेखन में मुझे जिन कृतिकारों की कृतियों से सहायता प्राप्त हुई है उनके प्रति मेरी विनम्र कृतज्ञता अपित है।
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