जून महीने के 16-17-2013 दिनाङ्क को उत्तराञ्चल की केदारघाटी में जो प्राकृतिक आपदा आयी, उसने समग्र विश्व की आँखों में आँसू ला दिया। शायद ही कोई ऐसा बचा हो जिसका हृदय न रोया हो। भगवान् भूतभावन आशुतोष की ज्योतिर्लिङ्गस्वरूप केदारनाथ की पूजा अर्चना करनेवाले भक्तों की भीड़ इस महीने में चरम सीमा पर होती है। हिमालय का यह क्षेत्र प्राकृतिक सुन्दरता का अद्वितीय उदाहरण है। हिमालय का अनुपम सौन्दर्य मन्दाकिनी की कलकलधारा का कर्णप्रिय सङ्गीत, भगवान् शङ्कर की अर्चना का अनुपम सौभाग्य। जीवन में एक बार इसके दर्शन की इच्छा मानवजातिमात्र को होती है। इसी इच्छा की पूर्ति के लिये लाखों भक्त इस घाटी में खींचे चले आते हैं। पर प्रकृति कभी इतनी क्रूर भी हो सकती है इसकी कल्पना शायद किसी ने न की होगी। इस प्रलय ने समग्र घाटी को तबाह कर दिया। सौभाग्यसम्पन्ना धरा विधवा की तरह सौभाग्यहीना हो गयी। कितनी ही आँखें आज भी अपने सम्बन्धियों के आने की राह देख रही है। कितने ही गाँव जन विहीन हो गये। रामबाड़ा जैसा स्थल इतिहास का विषय बन गया। इस प्रलय में काल के कराल गाल में समाये लोगों की आत्मा की शान्ति के लिये कवि द्वारा यह लघु काव्य श्रद्धाञ्जलि के रूप में समर्पित है।
आज इस समय वस्तुतः सोचना पड़ता है कि क्या प्रकृति इतनी क्रूर हो गयी ? क्या भगवान् आशुतोष इतने निर्दयी हो गये ? या हमने प्रकृति को इतना कठोर कदम उठाने के लिये विवश कर दिया ? दिनरात अन्धाधुन्ध पर्वतों का छेदन भेदन, वनों का विनाश, नदियों की धाराओं का बाँधा जाना, ये सभी जो प्रकृति के विरुद्ध कार्य हो रहे हैं, इसका उत्तरदायी कौन है? क्या भौतिक सुख की कामना में हमने प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का विनाश नहीं किया है? यदि हाँ तो क्यों ? जो प्रकृति हमारे जीवन का आधार है उसी का विनाश कर हम किस सुख की कल्पना कर रहे हैं, यह सोचने का विषय है। इस लघुकाव्य के नाम 'केदारघाटी विधवा बभूव' पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि उस हरीभरी, पक्षियों के कलरव और मन्दाकिनी की स्वलहरी से विगुञ्जित, शिवभक्तों के उल्लासपूर्ण भाव से भरी हुई सौभाग्यसम्पन्ना घाटी की प्रलय के बाद सौभाग्यहीनता को देखकर यही नाम सत्यता को स्पष्ट करता है। यह काव्य किसी व्यक्तिविशेष की हँसी नहीं उड़ाता है, किसी व्यक्तिविशेष की ओर अंगुलि नहीं उठाता है अपितु यह काव्य इस प्रलय का स्वरूप और कारणों को दर्शाने का प्रयास मात्र है।
भगवान् शङ्कर से यही विनती है कि इन कालकवलित लोगों की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। साथ ही साथ सामान्य जनता से यह अनुरोध है कि हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करे ताकि हमारा जीवन इस प्रकृति की गोद में अनुपम अलौकिक सुख का अनुभव करता रहे।
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