भूमिका
अगर 1965 जब श्री बालकृष्ण राव द्वारा संपादित, इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका 'माध्यम' में मेरी कहानी 'नए-पुराने माँ-बाप' छपी थी, जिसकी स्वीकृति का पत्र एक चौड़े सफेद कार्ड पर, श्री बालकृष्ण राव द्वारा हस्ताक्षरित मुझे मिला था और जिसने मुझे वह खुशी दी थी, जैसी में आगे कभी किसी रचना / पुस्तक के प्रकाशित होने पर नहीं महसूस कर पाया हालाँकि आह्लादित कई बार हुआ मगर तब... जैसे खुशी से आसमान फट पड़ रहा हो 1965 को कहानी लिखने की मेरी शुरुआत का वर्ष मान लिया जाए... हालाँकि कहानी लिखना 14 वर्ष की उम्र में ही शुरू हो गया था, जैसे ही मन में प्रेम अंकुरित हुआ और दो-तीन कहानियाँ मेरी प्रेमिका के लिए लिखी गई थीं... सिर्फ उसके लिए ... तो कहानियाँ लिखते-लिखते करीब-करीब 60 वर्ष तो होने को आए, पहले के मनुष्य की औसत आयु, माने पूरा जीवन ही। और ऐसा याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने बाध्य होकर कहानी लिखी हो। एक अपवाद कह सकते हैं। जब मैं 'अक्षरा' का संपादक हुआ तो मैंने संकल्प लिया था कि अपनी कोई रचना उस पत्रिका में नहीं छापूँगा, संपादकीय भी दो पेजों से ज्यादा का नहीं होगा, लेकिन जब पत्रिका के प्रेम विशेषांक के लिए मैंने लेखकों के सामने चैलेंज फेंका कि प्रेम कहानी लिखकर दिखाएँ, तो मुझे लगा कि वह चैलेंज मेरे लिए भी होगा और मेरी कहानी 'लहर' भी 'अक्षरा' के प्रेम विशेषांक में छपी। बाध्य होकर कहानी लिखना वैसे बुरी चीज नहीं है। श्रद्धेय भगवतीचरण वर्मा ने पूरे एक साल 'सारिका' (तब मासिक) के हर अंक के लिए एक ताजा कहानी लिखने की चुनौती स्वीकार और पूरी की थी। माने एक साल में ही एक पूरा कहानी संग्रह (मेरे इस कहानी संग्रह में 2019 से 2024 की कहानियाँ हैं, माने छह वर्ष!); बात गलत सही की नहीं, लेखक के स्वभाव और लेखक की परिस्थिति विशेष की है। मैंने 'नए-पुराने माँ-बाप'कहानी संग्रह से प्रस्तुत संग्रह तक किसी संग्रह में पुरानी कहानियों को शामिल नहीं किया (चर्चित कहानियाँ प्रतिनिधि कहानियाँ आदि श्रृंखलागत कहानी संग्रहों को अलग कर दें तो कहानी लिखते-लिखते 60 वर्ष हो गए और कहानियाँ आती जा रही हैं। काँ से जितना पानी निकालो उतना आता जाता है मेरे संदर्भ में शायद वह बात भी नहीं है। कहाँ से आती चली जा रही हैं ये कहानियाँ? विशुद्ध कल्पना-प्रसूत मेरी रचना-प्रक्रिया कभी नहीं रही। मेरी हर रचना किसी-न-किसी जीवित व्यक्ति से जड़ती है... कभी-कभी एक व्यक्ति से तीन-चार-पाँच कहानियाँ निकलीं ... वहाँ भी उसके किसी दर्द या कम-से-कम उसकी किसी कशमकश से। उत्स यही रहा, कहानी में तत्कालीन यथार्थ या उसका कोई नया 'शेड' आ गया... तो वह बात गौण रही। कथ्य मेरे अपने दुःख-दर्द का या उस व्यक्ति का रहा जिसके मैं बहत करीब था। शिल्प, शिल्प-गत प्रयोग उतना ही जिससे कथ्य कैसे पूरा-का-पूरा प्रभावी ढंग से संप्रेषित हो जाए... मैंने बहुत पहले कभी लिखा था और आज भी उस पर कायम हूँ कि मेरी किसी रचना को अगर एक भी सहृदय पाठक मिल गया तो भी उसका रचना-संसार में आ जाना सफल है। मेरा यह मंतव्य लगभग मेरा स्वभाव बन गया है ... हो सकता है इसके तार मेरी शुरुआत से जुड़े हों, जहाँ मैंने कहानियाँ सिर्फ एक व्यक्ति-अपनी प्रेमिका के लिए लिखी थीं। तो कहानियाँ व्यक्तियों से आ रही हैं, जो मेरे आत्मीय हो जाते हैं, मैं उनके सुख-दुःख का हिस्सेदार हो जाता हूँ। जब तक यह संभव होता रहेगा, कहानियाँ आती रहेंगी। एक शब्द में अगर इसे कहा जाए... तो वही आता है-संवेदना, लेकिन इस शब्द के भी बहुत आगे की ... बहुत गहरी ...। दूसरों के साथ, दूसरी चीजें हो सकती हैं ... मैं उसका आदर करता हूँ... लेकिन मेरे साथ यह है। मैं बहुत जल्दी व्यक्तियों से जुड़ जाता हूँ, आत्मीय हो जाता हूँ... इस ख्याल से कतई नहीं कि उनसे कहानियाँ निकलेंगी... स्वभाव से प्रेमी हूँ, इसलिए। उनसे प्रेम को जीता हूँ, कहानियाँ वगैरह इत्तिफाक है। समकालीन यथार्थ, बदलते यथार्थ को दिखाने के लिए या समकालीन किसी महत्वपूर्ण विषय पर कहानी लिखना ... या मेरी जैसी प्रक्रिया से गुजरकर कहानी को आने देना ... इस पर बहस तब भी चल रही थी जब मैंने लिखना शुरू किया, आज भी चलती है और आगे भी चलती रहेगी। मुझे जरूरत तो नहीं, लेकिन मेरी बात से मिलते-जुलते स्वर भी जहाँ-तहाँ से उठते रहते हैं। मख़मूर का एक शेर है : "मखमूर गजल वो जो अल्लाह लिखा दे हर एक इबारत को आयत नहीं कहते।"
लेखक परिचय
गोविन्द मिश्र समकालीन कथा-साहित्य में एक ऐसी उपस्थिति हैं जिनकी वरीयताओं में लेखन सर्वोपरि है, जिनकी चिंताएँ समकालीन समाज से उठकर 'पृथ्वी पर मनुष्य' के रहने के संदर्भ तक जाती हैं और जिनका लेखन-फलक 'लाल पीली जमीन' के खुरदरे यथार्थ, 'तुम्हारी रोशनी में' की कोमलता और काव्यात्मकता, 'धीरसमीरे' की भारतीय परंपरा की खोज, 'हुजूर दरबार' और 'पाँच आँगनोंवाला घर' के इतिहास और अतीत के संदर्भ में आज के प्रश्नों की पड़ताल इन्हें एक साथ समेटे हुए है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-यह अपना चेहरा, उतरती हुई धूप, लाल पीली जमीन, हुजूर दरबार, तुम्हारी रोशनी में, धीरसमीरे, पाँच आँगनोंवाला घर, फूल... इमारतें और बंदर, कोहरे में कैद रंग, धूल पौधों पर, अरण्यतंत्र, शाम की झिलमिल, खिलाफत, हवा में चिराग (उपन्यास), पगला बाबा, आसमान... कितना नीला, हवाबाज, मुझे बाहर निकालो, नये सिरे से, मंदिर गाँव किनारे आदि (कहानी-संग्रह); कहानी समग्र (संपूर्ण कहानियों, तीन खंडों में); धुंध-भरी सुखीं, दरख्तों के पार... शाम, झूलती जड़ें, परतों के बीच, इतिहास और प्रकृति... दोनों (यात्रा-वृत्त); रंगों की गंध (समग्र यात्रा-वृत्त दो खंडों में); साहित्य का संदर्भ, कथा भूमि, संवाद अनायास, समय और सर्जना, साहित्य साहित्यकार और प्रेम, सान्निध्य-साहित्यकार (निबंध); ओ प्रकृति माँ! (कविता); मास्टर मनसुखराम, कवि के घर में चोर, आदमी का जानवर (बाल-साहित्य); चुनी हुई रचनाएँ (तीन खंडों में); गोविन्द मिश्र रचनावली: संपादक नन्दकिशोर आचार्य (बारह खंडों में)। उन्हें प्राप्त कई पुरस्कारों/सम्मानों में 'पाँच आँगनोंवाला घर' के लिए 1998 का 'व्यास सम्मान', 2008 में 'साहित्य अकादेमी', 2011 में 'भारत-भारती सम्मान', 2013 का 'सरस्वती सम्मान' विशेष उल्लेखनीय हैं।
पुस्तक परिचय
"जब कोई कहता है 'कमरे का भी व्यक्तित्व होता है' यह आप ही लिख सकते थे या इस संग्रह की कहानी 'पुनर्जीवन' में मिसेज दुबे के मकान से लेखक का संवेदनात्मक जुड़ाव ...तो सोचता हूँ मेरी संवेदनात्मकता मनुष्यों के भी आगे जड़ वस्तुओं तक फैल गई है। पहले कई-कई वाक्य, कभी-कभी तो पैरा-दर-पैरा लगते थे उस जीवन दर्शन को कहने में जहाँ तक कोई कहानी पहुँची थी... अब उसे कहने के लिए शब्द दौड़े चले आते हैं। कहानी छोटे आकार में खुद को कह जाती है, जिसके लिए पहले कितने पृष्ठ लगते थे।" (भूमिका से) जिसके पन्द्रह कहानी संग्रह आ चुके हों... जब वह लेखक यह कहता है, तो सामान्यीकरण का खतरा उठाते हुए भी एक बात रेखांकित की जा सकती है कि कैसे वरिष्ठ लेखक अपनी लेखन यात्रा में उत्तरोत्तर सरल और शब्दों को लेकर मितव्ययी होते चले जाते हैं। गोविन्द मिश्र की नई कहानियों का यह संग्रह इस तथ्य का प्रमाण है। छोटे आकार की इन कहानियों में आधुनिक परिवेश से सहज ही उपजता नया जीवन-दर्शन-जिसे लेखक को कहीं कहना भी पड़े तो वह सिर्फ इशारा देकर निकल जाए... यह कलात्मकता भी दृष्टव्य है।
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