भूमिका
कहानियाँ सुनाना सारी दुनिया में एक परंपरागत कला की तरह है। आमतौर पर माँ, दादी और नानी को कहानियाँ कहने की प्रेरणा बच्चे देते हैं। लेकिन राजस्थान में बड़े-बूढ़े भी इस शौक का आनंद लेते हैं, खास तौर पर उन लंबी सर्द रातों में, जब वे दहकती अंगीठी या अलाव के चारों ओर मिलकर बैठे होते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी के कठोर यथार्थों के उलझावों से थके उनके मन-मस्तिष्क उस समय कुछ देर के लिए आराम करना चाहते हैं, जब वे अपनी गंभीरता और जिम्मेदारी से अलग हटकर बच्चों की तरह महसूस करने का मौका पाते हैं। तब उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता, और यही वजह है कि वे भी बच्चों की तरह चमत्कारपूर्ण कथाएँ सुनना पसंद करते हैं। कथा सुनानेवाला असंभव बातों की कल्पना करता है और सुननेवाले इस उम्मीद में रहते हैं कि वे असंभव बातें सचमुच घटित होंगी। वैसे दोनों ही पक्षों के बीच यह समझ मौजूद रहती है कि उन कहानियों का घटनाक्रम ऐसी दुनिया में घट रहा है, जहाँ वे मनचाहे ढंग से जो कुछ चाहें, करवा सकते हैं। कहानियाँ कहनेवाले और उन्हें सुननेवाले- सभी की एक ही इच्छा रहती है कि वे केवल सीधी-शुद्ध कहानी सुनें- बस! वे उसके पीछे कोई तर्क या कोई कारण नहीं ढूँढ़ना चाहते। पुराने जमाने की कथाएँ एकदम हल्की-फुल्की और अनायास बुनी हुई होती थीं। उनका जन्म दूसरों का मनोरंजन करने का हार्दिक इच्छा से होता था। वे किसी तरह की आवश्यकता के दवाब, जैसे प्रकाशकों का दवाब, की उपज नहीं थीं। वे केवल एक आग्रह मानती थीं, और वह था शिक्षा या सीख का। उन कहानियों का अगर कोई लक्ष्य होता था, तो वह था, लोगों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाना। अपने इस उद्देश्य में वे कहानियाँ पूरी तरह सफल होती थीं। प्राचीन नाटक और किंवदंतियों, परी कथाएँ तथा रूपक कहानियाँ-सभी हमें प्रच्छन्न रूप से शिक्षा देती हैं, क्योंकि खुद सिखानेवाले भी, बिना जाने-बूझे अनजान में ही, इस दिशा में प्रवृत्त हुए थे। यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि वे अपनी साधारण सामग्री के बलबूते पर ही अपने उद्देश्य में सफल हो सके। उन्होंने केवल अपने युग के श्रोताओं पर ही प्रभाव नहीं जमाया, बल्कि हमारे परिष्कृत जमाने में भी उनका जादू बराबर रहता आया है। सवाल यही है कि वे इसमें कैसे सफल हुए? मेरे खयाल में इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वे कहानियाँ ऊपरी तौर पर भले ही अत्यंत अवास्तविक या काल्पनिक होती थीं, लेकिन उनके मूल में एक शाश्वत सत्य रहता था। राजस्थानी कथाओं का ताना-बाना अक्सर कुछ विशेष प्रकार के चरित्रों के इर्द-गिर्द बुना जाता है। कहानी में एक ब्राह्मण होता है, अत्यंत विद्वान् और बुद्धिमान्, लेकिन जिसमें अधिक सांसारिक चतुराई नहीं होती। राजपूत ऐसा शूरवीर योद्धा होता है, जो वचन पूरा करने या अच्छे काम के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। वह हमेशा ही सीधा, सटीक और सच्चा मार्ग अपनाता है, भले ही उस पर चलते उसे नुकसान उठाना पड़ जाए। व्यापारी वर्ग को बनिए के रूप में दिखाया जाता है- अत्यंत चतुर, हाजिरजवाब और पैसों के मामले में बहुत ही सजग सतर्क रहनेवाला। किसान का प्रतिनिधित्व करता है जाट, जो एक सामान्य जन होता है, लेकिन उसकी समझ-बूझ बहुत गहरी होती है। मियाँ, मुसलमान उस समय के शासक वर्ग का प्रतीक है। शायद सत्तारूढ़ वर्ग का मजाक उड़ाने की गरज से ही मियाँ को आम तौर पर एक ऐसे ठग के रूप में दिखाया जाता है, जो अपनी चालाकी के हथकंडे दिखाता तो है
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