श्यामसुंदर दुबे नवगीतकार, कथाकार, ललित निबंधकार, समीक्षक और लोकविद डा. श्यामसुंदर दुबे का जन्म 12 दिसंबर 1944 को हटा (दमोह) में हुआ था। इन्होंने सागर विश्वविद्यालय में एम. ए., पी-एच. डी. तक की शिक्षा प्राप्त की। लगभग चालीस वर्ष तक वे उच्च शिक्षा, विभाग मध्यप्रदेश शासन में प्रोफेसर प्राचार्य पदों पर कार्यरत रहे। बाद में वे डायरेक्टर मुक्तिबोध सृजनपीठ, सागर विश्वविद्यालय में पदस्थ रहे। डा. दुबे की सभी विधाओं में अभी तक साठ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। मुख्य रूप से 'दाखिल खारिज' 'सोनफूला' 'पहाड़ का पाताल' (उपन्यास), 'जड़ों की ओर' (कहानी संग्रह), कालू मृगया, विषाद वाँसुरी की टेर, 'कोई खिड़की इसी दीवार से', 'आलोक अनवरत' 'जहाँ देवता सोते हैं' 'कालः क्रीडति' (ललित निबन्ध), 'धरती के अनंत चक्करों में', 'पृथ्वी का प्रथम स्नान' (कविता संग्रह), 'रीते खेत में बिजूका' 'ऋतुएँ जो आदमी के भीतर हैं', 'सुख दुःख की कमीज' (नवगीत संकलन), 'संस्कृति समाज और संवेदना', 'साहित्य का सामाजिक पक्ष', 'महाकवि सूरदास की लोकदृष्टि' (समीक्षा), 'लोकः पहचान परम्परा एवं प्रवाह', 'लोक का साहित्य साहित्य का लोक' 'लोक में जल' 'लोक कवि ईसुरी' (लोक), हमारा राजा हँसता क्यों नहीं, 'नेह के नेग' (स्फुट निबन्ध) अभी हाल ही में प्रकाशित एवं चर्चित आत्मकथा 'अटकते भटकते' एवं ललित निबन्ध संकलन 'सन्नाटे का शोर' आदि। डा. दुबे अनेक सम्मानों और पुरस्कारों से विभूषित हैं। केन्द्रीय हिंदी संस्थान का 'सुब्रह्मण्यम भारती', मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ईसुरी पुरस्कार उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का 'साहित्य भूषण', तथा डा. शम्भुनाथ सिंह रिसर्च फाउन्डेशन का नवगीत पुरस्कार म. प्र. शासन के संस्कृति विभाग का राष्ट्रीय कबीर सम्मान आदि। डा. दुबे के रचनाकर्म पर अब तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी-एच. डी., स्तरीय पंद्रह से अधिक शोधकार्य संपन्न हो चुके हैं। इनके लेखन इन पर अभी तक बारह से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनकी रचनाएँ उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हैं। ये अनेक समितियों में पदाधिकारी एवं सदस्य हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन दुनिया में सक्रिय हैं।
गायब होते लोक को सहजने के लिए इधर अनेक तरह से रचनाधमी सक्रिय है। लोक-परंपराएँ लोक-समाज और लोक कलाओं के संरक्षण हेतु अनेक संस्थाएँ और अनेक प्रतिभाशालीजन सक्रिय है। प्रदर्शन, प्रकाशन और अभिकल्पन जैसे प्रयास सतत संभव हो रहे हैं। फिर भी लोक संवेदना के स्फुरण की तलाश कठिन होती जा रही है। लोक चेतना अपनी गतिशीलता में पुनर्नवा होती रहती है। उसके भीतर चलने वाले प्रयोग उसे हर संभव नया बनाते रहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि लोक परिवेश को सुरक्षित रखा जाए। उसकी जीवंतता उसके अपने पर्यावरण में ही निहित है। यदि लोक को जानना-पहचानना और उसे आत्मसात कर उससे संवाद करना है तो लोक के साथ रहवास भी जरूरी है। लोक पर लिखने वालों में ऐसे विरल रचनाकार हैं जो लोक में रमे बसे हैं। डा. श्यामसुंदर दुबे ऐसे रचनाकारों में से एक हैं जो लोक जीवन में ही अपनी गुजर-बसर करते रहे हैं। यही वजह है कि जो भी उन्होंने लोक पर लिखा वह केवल लोक-स्मृति भर नहीं है। वह जीता जागता लोक है।
इस पुस्तक में आप लोक के अनेक आयामों को उनकी समूची रंगतों में अनुभव करेंगे। यहाँ न तो लोक का सर्वेक्षण है जो केवल स्थितियों को ही स्पष्ट करता है, और न यहाँ लोक के संदर्भों का विवरण मात्र है, बल्कि यहाँ लोक अपनी संपूर्ण आसक्तियों के साथ विद्यमान है। अपनी समूची स्मृति यात्रा में आये परिवर्तनों को व्यक्त करता लोक इस कृति में, अपनी अंतर्संवेद्यता में न केवल कला-जगत की पारस्परिकता को प्रकट कर रहा है, बल्कि वह क्षेत्रीयता में निहित वैश्विक चेतना का भी दिग्दर्शक है। लेखक डॉ. दुबे की यह कृति लोक की विलुप्त प्राय सामाजिक अवधारणाओं और उनकी साम्प्रतिक व्यवहार दृष्टियों का विवेचन भी अपने कलेवर में समेटे है। इस रूप में लोक को समग्रता में समझने का यह अद्वितीय प्रयास है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13724)
Tantra (तन्त्र) (1005)
Vedas (वेद) (728)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2081)
Chaukhamba | चौखंबा (3180)
Jyotish (ज्योतिष) (1561)
Yoga (योग) (1168)
Ramayana (रामायण) (1334)
Gita Press (गीता प्रेस) (723)
Sahitya (साहित्य) (24773)
History (इतिहास) (9044)
Philosophy (दर्शन) (3634)
Santvani (सन्त वाणी) (2629)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist