भूमिका
यह पुस्तक लोक साहित्य को समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखने और समझने का एक विनप्त प्रयास है। लोक साहित्य के विविध पक्षों पर आधारित लेख इस पुस्तक में संकलित हैं। जीवन और समाज को देखने की कई दृष्टियों रही हैं। लोक ने जिस दृष्टि से समाज को देखा है उसे लोक दृष्टि कहते हैं। इसी दृष्टि से लोक साहित्य का समाजशास्त्र निर्मित हुआ है। यह समाजशास्त्र लोक साहित्य के विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है चाहे वह कहावतें हों, लोककथाएँ हों, लोकगीत हों अथवा लोकगाथाएँ हों। लोक साहित्य के इन विविध रूपों में लोक ने न केवल अपनी रचनात्मक क्षमता का प्रमाण दिया है बल्कि कई गंभीर और विमर्श परक प्रश्न भी खड़े किए हैं। लोक साहित्य का सबसे बड़ा गुण है प्रश्नाकुलता और संवाद धर्मिता। लोक को जो कुछ भी अनुचित और अमानवीय लगता है उसे वह स्वीकार नहीं करता है चाहे वह शास्त्र द्वारा अनुमोदित ही क्यों न हो, इसका संदर्भ इस पुस्तक में मौजूद है। भारतीय समाज की निर्मिति के जो नियामक तत्त्व रहे हैं उन सब पर लोक ने बड़ी ही गंभीरता से विचार-विमर्श किया है। यह अकारण नहीं है कि समाजशास्त्रियों ने, नृविज्ञानियों ने संस्कृति और समाज के अध्ययन के लिए उसके लोक साहित्य को मौलिक स्रोत बताया है और कहा है कि यदि हम किसी भी समाज का वास्तविक और मौलिक अध्ययन करना चाहते हैं तो उस समाज का लोक साहित्य हमारे लिए आधार स्रोत बन सकता है हालाँकि भारतीय विद्वानों की दृष्टि लोक साहित्य के संकलन और संरक्षण पर बहुत देर से पड़ी तब तक पाश्चात्य देशों में लोक साहित्य पर संकलन ही नहीं समीक्षाएँ और आलोचनाएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। यह विचित्र संयोग है कि भारत में लोक साहित्य के संकलन का श्रेय अंग्रेज अधिकारियों को ही जाता है क्योंकि यह कार्य सर्वप्रथम उनके द्वारा ही संपन्न हुआ। चाहे वे विलियम जोन्स हों, क्रूक हों, रिचर्ड कार्नेक टेम्पल हों, ग्रियर्सन हों, इन सबने अपने-अपने कार्य क्षेत्रों के गीत, कहावतों, कथाओं, गाथाओं का संकलन और संपादन किया। इसके उपरांत भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों की दृष्टि लोक साहित्य पर पड़ी और उन्होंने इसके संकलन का कार्य अपने हाथों में लिया। पंडित रामनरेश त्रिपाठी का कार्य लोक साहित्य की दृष्टि से प्रारंभिक और ऐतिहासिक कार्य है जिन्होंने भारत की विभिन्न बोलियों के बीस हजार से अधिक लोकगीतों का संकलन कर भारतीय लोक साहित्य के कोष को न केवल समृद्ध किया बल्कि लोक साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव रखनेवाले विद्वानों को आईना भी दिखा दिया। त्रिपाठी जी ने साधनों के अभाव में अकेले जो कार्य किया है, बाद में वह कई सरकारी संस्थाएँ मिलकर भी न कर सकीं। इसके बाद भारत के अलग अलग क्षेत्रों के विद्वानों की दृष्टि इधर पड़ी और उन्होंने इस क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया चाहे वे गुजरात के झवेरचंद मेघाणी हों, बंगाल के दिनेश चंद्र सेन हों अथवा पंजाब के देवेंद्र सत्यार्थी हों और चाहे भोजपुरी के विद्वान् कृष्णदेव उपाध्याय हों। आज आवश्यकता है उन समस्त संकलित सामग्रियों के समाजशास्त्रीय विवेचन और विश्लेषण करने की जिससे लोक साहित्य का महत्त्व पूरी तरह से उजागर हो सके और साथ ही लोक साहित्य के प्रति पूर्वाग्रह से कतिपय विद्वानों को मुक्त किया जा सके। मैंने लोक साहित्य के विविध रूपों में अभिव्यक्त समाजशास्त्र के सूत्रों को पकड़ने की कोशिश की है मसलन कहावतों को ही देखें तो इसमें भारतीय समाज का यथार्थ मौजूद है। कृषि की यह कहावत कि उत्तम खेती, मध्यम बानि, अधम चाकरी भीख निदान । यह कहावत यह स्पष्ट कर देती है कि खेती किसानी ही भारतीय समाज का मुख्य आधार रही है और नौकरी को भीख माँगने के बराबर कहा गया है। यह धारणा प्रेमचंद के 'गोदान' तक दिखाई पड़ती है जिसमें होरी कहता है कि खेती में मरजाद बनी रहती है। किंतु आज स्थिति एकदम भिन्न है, आज नौकरी मुख्य हो चली है और कृषक सड़कों पर बैठकर आंदोलन करने को विवश हैं। रोज कई हजार किसान कर्ज से तंग आकर खेती-किसानी छोड़ रहे हैं किंतु कृषि का कोई विकल्प है भी नहीं क्योंकि अनाज खेती में ही पैदा होता है, मशीन में नहीं और किसान ही अन्नदाता है लिहाजा यह कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले थी। आज जैविक कृषि के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, हमारी कहावतों का एक बड़ा हिस्सा जैविक कृषि से जुड़ा हुआ है, उस दौर में रासायनिक खेती थी ही नहीं, अतः सभी सूत्र जैविक कृषि के लिए ही दिए गए हैं जिसमें घाघ, भड्डरी जैसे लोक कवियों की कहावतों में खेती किसानी के गूढ़ सूत्र भरे पड़े हैं, उन कहावतों पर आज पुनर्विचार की आवश्यकता है, वे हमारे कृषकों के लिए आज भी बहुत उपयोगी हैं। लोक साहित्य का वैशिष्ट्य इस रूप में भी देखा जा सकता है
लेखक परिचय
डॉ. सत्य प्रिय पाण्डेय जन्म: 25 फरवरी, 1980, सुलतानपुर (उ.प्र.) । शिक्षा: एम.ए., एम.फिल, पी-एच.डी., दिल्ली विश्वविद्यालय । प्रकाशित पुस्तकें : प्रथम स्वाधीनता आंदोलन और लोकगीतों की संवेदना, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली; लोकगीत पाठ एवं विमर्श, स्वराज प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली; उत्तर भारत के युद्धगीत और ब्रिटिश साम्राज्यवाद, हिंदुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज । अन्य लोक साहित्य और लोकगीतों में विशेष रुचि; लोक साहित्य के विविध पक्षों पर कई शोध आलेख प्रकाशित; विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन; पटना से प्रकाशित 'साहित्य यात्रा' पत्रिका में संपादन सहयोग । संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, श्यामलाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ।
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