कविता केवल शब्दों का चयन ही नहीं, नाट्य का भी सर्जन है। यह एकान्त में चिन्तन के लिए ही नहीं परन्तु ऊँचे से पढ़ने के लिए भी है। कविता के भीतर नाटक छिपा होना चाहिए। नाट्य का प्रमुख अंग वाचिक आवश्यक है, कवि द्वारा अभिनय रस को उभारने के लिए ।
आनन्दवर्धन कृत विश्व-विख्यात ग्रन्थ ध्वन्यालोक यह बताता है कि काव्य की शक्ति सहृदय तक अपनी ध्वनि पहुँचाने में है, केवल अलङ्कार और चातुर्य में नहीं। काव्य सार्वजन्य भाव को प्रतिबिम्बित करे, जो देश और काल से जुड़ा हुआ है।
हरिवंशराय बच्चन ने इस बात को पहचानकर ही मधुशाला की रचना की और यही इस ग्रन्थ की लोकप्रियता को विवक्त करता है। "नाट्यते अभिनयत्वेन रूप्यते इति नाट्यम्, मधुशाला का नाटकीय ढंग से पढ़ना ज़रूरी है ताकि श्रोता रस के प्रवाह में बह जाए।
परन्तु वह ८५ वर्ष पूर्व का संसार जिसमें बच्चन जी ने अपने ग्रन्थ की रचना की अब नहीं रहा। आजकल का युग महामारी का है और इस भय से लेपित है कि निकट भविष्य में संगणन कारुयन्त्र हमारे व्यवसायों को लुप्त न कर लें। क्या आजकल के दौर के लिए भी समीचीन कविता की जा सकती है?
इस प्रश्न का समाधान करने हेतु हमारे मिल डॉ० बलराम सिंह उतरे हैं। बलराम जी इस कार्य के लिए वाग्विद् हैं। उनका जीवन दो संसारों के बीच एक पुल के समान है भारत में वह एक पारम्परिक कुल में रहते हैं और अमेरिका में विज्ञान में अग्रणी राज्य मासाच्युसेट्स में। स्वयं वैज्ञानिक होते हुए वह भारत में समाज-सेवा, शिक्षा, और संस्कृति के विषयों से जुड़े हुए हैं।
बलराम सिंह जी की नई मधुशाला आजकल के जीवन के द्वन्द्व और विरोधाभास को सरल भाषा में वाणी देती है। इसका स्वागत हो।
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