पुस्तक परिचय
महाभारत मंच ज्ञान का भंडार है। अद्यतन बनाए रखने की प्रक्रिया में इसमें समय-समय पर नई-नई सामग्री जुड़ती गई और ग्रंथ विशाल हो गया। विषय विशेष पर शोध करने वाले को इसमें पुष्कल सामग्री मिल जाती है किन्तु इस सामग्री का विकासक्रम में संयोजन आसान नहीं है। तथापि यत्-संभव हेतु प्रयास होते रहने चाहिए। प्रस्तुत पुस्तक ऐसा ही एक प्रयास है। इसमें समाज-सुधार, अहिंसा एवं शान्ति सम्बन्धी चिन्तन के अध्ययन हेतु महाभारत को आधार बनाया गया है। ये तीनों सम्बद्ध एवं परस्पर सहायक है। पुस्तक आठ अध्यायों में विभक्त है, जिनमें इन बिन्दुओं पर विवेचन किया गया है-सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक बदलाव व सामाजिक सुधार के प्रयत्न, स्त्री विमर्श, अहिंसा, मांसाहार से निवृत्ति, यज्ञ, राज्य प्रशासन और अहिंसा तथा शान्ति। इनके विवेचन में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें उभरकर आती है। सामाजिक व्यवस्था के बारे में प्रायः इसकी देवी उत्पत्ति की चर्चा की जाती है, किन्तु महाभारत में ऐसा भी संदर्भ है जिसमें महेश्वर वर्णव्यवस्था को नैसर्गिक बतलाते हैं। स्पष्ट है कि समाज की आवश्यकता के अनुरुप यह सामाजिक व्यवस्था स्वयं उद्भूत हुई और कालान्तर में अनेक कारणों से इसकी दैवी उत्पत्ति कही जाने लगी। समाज के दोषों की आलोचना सामाजिक सुधार की धुरी है। प्राचीन बौद्ध साहित्य के साक्ष्य से प्रकट होता है कि समाज को चलाते रहने के लिए स्त्री की पारस्परिक भूमिका को तो दुहराया गया है किन्तु महाभारत के चिन्तक को स्त्री पर पड़ने वाले भार का दर्द भी है। कुछ चिन्तक उत्तराधिकार के प्रसंग में स्त्री को कुछ अधिक देने के पक्ष में दिखते हैं। यद्यपि वैदिक परम्परा में अनेक यज्ञों में हिंसा का विधान है, किन्तु वैदिक परम्परा में एक धारा अहिंसा की भी थी। बौद्ध और जैन साहित्य में ऐसे संदर्भ है जिनमें कहा गया है कि पहले यज्ञ अहिंसात्मक थे। बाद में भी अहिंसा ने हिंसात्मक यज्ञों को प्रभावित किया। प्रशासन का क्षेत्र भी अहिंसा से अप्रभावित न रहा। क्या मृत्युदंड चलाये रखना चाहिए महाभारत ने इस मुद्दे को भी उठाया। महाभारत अहिंसा का प्रबल समर्थक है। प्रसिद्ध वाक्य अहिंसा परमो धर्मः महाभारत का ही है। शान्ति के विषय में महाभारत का दृष्टिकोण बड़ा स्पष्ट एवं व्यापक है। युद्ध को यथासंभव टालने की बात कही गई है। युद्ध आरम्भ हो जाने पर भी युद्ध को रोकने के प्रयत्न की प्रशंसा है। यदि युद्ध होता ही है तो युद्ध में क्रूरता के निवारण के लिए बहुत से नैतिक नियम दिये गये हैं। पुस्तक में और भी ऐसी सूचनायें है जो पहले अधिक ज्ञात नहीं थी। सब मिलाकर पुस्तक आलोच्य विषय पर अच्छा प्रकाश डालती है और पढ़ने में रुचिकर है।
लेखक परिचय
प्रो. महेश्वरी प्रसाद भारती मिया के प्रतिष्ठित विद्वान् हैं। इनका जन्म प. गोविन्द प्रसाद भी एवं श्रीमती रमाबाई के मध्यम पुत्र के रूप में बांदा (उ.प्र.) में हुआ। वहीं इनकी आरंभिक शिक्षा हुई। उच्च्च शिक्षा के लिए ये वाराणसी चले आये और काशी की पंडित परम्परा का यथेष्ट लाभ उठाया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए १९५९ में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विषय में प्रथम श्रेणी से एम.ए. किया तथा प्रथम स्थान होने से स्वर्ण पदक प्राप्त किया। डॉक्टरेट की उपाधि जर्मनी के गोयटिंगेन विश्वविद्यालय से प्राप्त की। प्रो. महेश्वरी प्रसाद ने अपने अध्यापक जीवन का प्रारम्भकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय से किया। जबलपुर विश्वविद्यालय में भी कुछ समय लेक्चरर रहे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अवकाश पर रहते हुए कुछ वर्ष अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद (अब अयोध्या) की प्रोफेसर के रूप में सेवा की और वहाँ इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष, कला संकाय के डीन तथा मानद पुस्तकालयाध्यक्ष रहे। लेकिन लगाव के कारण अध्यापक जीवन का अधिकांश समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सेवा में बिताया और २००१ में वहीं से सेवानिवृत्त हुए। तदनन्तर वाराणसी के पार्श्वनाथ शोध संस्थान के डायरेक्टर बने और वहाँ जैन परम्परा के निकट सम्पर्क में आये। अपने लम्बे कार्यकाल में अनेक शिक्षण संस्थाओं और प्रतिष्ठित संस्थानों की कमेटियों के सदस्य रहे। १९८९ में आल इंडिया ओरियंटल कान्फ्रेरेंस के विशाखापट्टनम् अधिवेशन में पुरातत्त्व खंड के प्रेसीडेट रहे। बाहर के अनेक देशों जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, इटली, स्विटजरलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रूस गये तथा वहाँ के भारती विद्या के विद्वानों के सम्पर्क में आये। प्रो. महेश्वरी प्रसाद शोध से बराबर जुड़े रहे। इस प्रसंग में दो वर्ष भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (नई दिल्ली) के नेशनल प्रोफेसर रहे। कुछ समय पश्चात् भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने इन्हें नेशनल फेलोशिप प्रदान की। नेशनल फेलो के रूप में इन्होंने जो शोध-कार्य किया उसका परिणाम है प्रस्तुत पुस्तक महाभारत में समाजसुधार, अहिंसा एवं शान्ति विषयक चिन्तन।
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