पुस्तक परिचय
पं० मदन मोहन मालवीय जी के सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक विचारों का आधार उनका दार्शनिक चिन्तन है। इस पुस्तक में मालवीय जी के दार्शनिक विचारों के सभी पक्षों का वर्णन किया गया है। यह पुस्तक चिन्तकों, ज्ञानार्थी, शोधार्थी, विद्यार्थी सभी के लिए उपयोगी है। इस पुस्तक में संग्रहित सभी चित्र उनके जीवन दर्शन को व्यक्त करते हैं। सभी चित्र भारत कला भवन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से लिए गए हैं। मनुष्य प्रकृति की अपरिमित सहायता से सन्तुष्ट न रहकर अपनी बुद्धि, वाणी, विश्वास एवं हाथों से अपने भाग्य निर्माण में प्रवृत्त होता है। वह संकल्पपूर्वक अपने विकास के साधन खोजता है। मानव प्रथमतः विषय भोगों की ओर उन्मुख होता है। फिर सहज विराग होने से दार्शनिक एवं डॉसिक चिन्तन में उसे आनन्द प्राप्त होने लगता है। काव्य, दर्शन एवं धर्मविज्ञान की उत्पति ऐसे ही महान जिज्ञासुओं में अधिक होती है
भूमिका
21-24 परमेश्वर को प्रणाम करें, सब प्राणियों के उपकार के लिए, बुराई करने वालों को दाबने और दण्ड देने के लिए धर्म स्थापना के लिए, धर्म के अनुसार संगठन, मिलाप कर गाँव गाँव में सभा करनी चाहिए। गाँव-गाँव में कथा बिठानी चाहिए। गाँव-गाँव में पाठशाला खोलना चाहिए। गाँव-गाँव में अखाड़ा खोलना चाहिए और पर्व-पर्व पर मिलकर बड़ा उत्सव मनाना चाहिए। सनातनधर्म, काशी वर्ष 1. मि. माद्रपद कृष्ण 5 गुरुवार, सं. 1996वि. 10.08.1933 अंक, पृ.४ उपरोक्त उदाहरण पूज्य पण्डित मदन मोहन मालवीय के विचारों का सार व्यक्त करता है।....... मालवीय नाम की उत्पत्ति- बुन्देलखण्ड में झाँसी से थोड़ी दूर एक 'मालवा गाँव बसा था। इनके पूर्वज यही रहते थे। अपने नाम के साथ गाँव के नाम का भी प्रयोग करने की प्रथा तत्कालीन समय में थी। इसी प्रथानुसार जब इनके पूर्वज प्रयाग आए तो अपने नाम के आगे 'व्यास' न लगाकर 'मालवीय लगाने लगे। जिसे मदन मोहन जी के पितामह पं० प्रेमधर मालवीय जी से अधिक ख्याति प्राप्त हुई आज उज्जैन के चारों ओर का भूभाग ही मालव प्रदेश कहा जाता है। परन्तु पुरातन काल में गुजरात से लेकर बुंदेलखण्ड तक विस्तृत नर्मदा के उत्तर की भूमि, जिसमें चम्बल, बेतवा आदि नदियों का उद्गम है, वह मालव भूमि मानी जाती थी। 'माल' शब्द का दूसरा नाम मालव' है। यादव कोष' में भी मालंमालव देशेच मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि माल, मालव और मालवा एक ही भाव के शब्द हैं। प्राचीन समय में चम्बल प्रवाहित प्रदेश को अर्थात् पश्चिम मालवा को अवन्ति कहा जाता था और बेतवा प्रवाहित पूर्व भाग को 'आकार, नर्मदा प्रवाहित दक्षिण भाग को 'अनूप' कहा जाता था। उज्जैन अर्थात् अवन्ती की विदिशा आकार थी। मेघदूत में आकार का नाम 'दशार्ण' लिखा है। कालिदास के अनन्तर १३वीं, १४वीं शताब्दियों के परिवर्तन में आजकल का मालवदेश प्रधानतया ग्वालियर, होल्कर, रतलाम, भोपाल तथा धार राज्य में विभाजित हो गया है। उज्जैन की भाषा प्रधानतः 'मालवी' है।
लेखक परिचय
नाम : डॉ. ज्योत्सना श्रीवास्तव पिता का नाम : स्व. श्री लाल बहादुर माता का नाम : श्रीमती सीमा देवी श्रीवास्तव चाचा का नाम : स्व. प्रोफेसर कृष्ण बहादुर पूर्व विभागाध्यक्ष एवं संकाय प्रमुख, विधि संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। एम.ए., पी.एच.डी., डी.लिट्। प्रकाशन : ३५ से ऊपर शोध-पत्र। पुस्तक : प्राचीन भारतीय तंत्रयुक्तियाँ भारतीय योग परम्परा। पं. मदन मोहन मालवीय का दार्शनिक चिन्तन
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